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कविता : अन्दर का अँधेरा

रोहित कौशिक, हापुड, उत्तर प्रदेश

बहुत हुआ,
फ्लैश,
झिलमिल,
स्मॉग लाइट से ,
जगमग जग,
आओ!
मिटाएँ अँधेरा अन्दर का।

लो एक मार्जक,
खुरदरा,
खुरचो!
वहाँ,
जहाँ होने थे,
रंग – सरल,
न बिखरे शब्द ,
भले विरल।

वे शब्द जो,
जताते हैं,
अभिजात और जाति,
उनको मिटना ही पड़ेगा,
ज्यों लौ के संग – संग बाती।

जहाँ व्योमपुष्प कल्पना के,
भेद पहले होंगे,
वहाँ पद्म जैसे,
जात – प्रेरक,
चित्र होंगे रंगे,

गेंदा, जूही या,
गुलाब, गुड़हल,
सुमन – समान होंगे,
सब पुष्प पुष्ट ,
पक्षपाती दृष्टि ढँक ही लेंगे।

वक्र होते चन्द्र को भी,
भित्ति देंगे हर्ष से,
होगी प्रभाकर आकृति भी,
समृद्ध – रंग गहरे।

हाँ!
बन उठेगा ,
पावन – उपवन ,
भीतर तिमिर मिटाकर,
सभी रंग – लाघव,
खिल उठेंगे,
मानव का संग पाकर।। 

——- 

(नोट : रोहित #अपनीडिजिटलडायरी के साथ काफी पहले से जुड़े हैं। उत्तर प्रदेश में संस्कृत शिक्षक हैं। लेख, कविता, निबन्ध आदि लिखने में स्वाभाविक रुचि है। उनकी यह कविता व्हाट्स एप के जरिए डायरी तक पहुँची है।) 

—— 

रोहित की पिछली कविताएँ 

3 – कविता : बोल्ड और इटैलिक से परे..
2 – कविता : मैं कवि नहीं, याचक हूँ
1 – प्रकृति की सीमा को, बाँध सका है कौन?

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