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कविता : मैं कवि नहीं, याचक हूँ

रोहित कौशिक, हापुड़ उत्तर प्रदेश

मेरे विचारों को,
समझकर बेचारा
किसी ने सुझाया,
कवियों से,
उधार शब्द लेना,
और कहा –
शायद ! तब,
तुम्हारी कविता का मर्म,
पहुँचेगा हम जैसे सहृदयों तक।

मुझे जँची यह बात –
तो मैं झटपट भागा,
महर्षि वाल्मीकि के द्वार,
मैंने जोड़े हाथ,
विनत हुआ,
शरीर का व्यापार,
दण्डवत किया प्रणिपात*।

मैंने बोला,
हे महर्षे!
दीजिए कुछ शब्द,
कविता कृते*,
लोक ऊबने लगा है,
मेरे उबाऊ,
शब्दों से।

वाल्मीकि मुस्कुराते बोले,
अरे! कविताप्रेमी बटुक!
क्यों करते हो,
मुझसे परिहास?
मेरी कविता थी केवल,
शोक – भाव का प्रकाश।
इससे अधिक जो,
लिखा मैंने,
उसकी थी,
दैवी प्रेरणा,
तत्काल,प्रत्यक्ष दर्शनीय,
सम्भव हुआ तब,
रची रामायण।

इस भाँति ,
वाल्मीकि कवि से ,
निराश मन,
मैं आगे बढ़ा,
सरहपा* की कुटी अगारे,
भिक्षुक बनकर,
था खड़ा।

रससिद्ध ,
भाँप थे गए,
सरहपा ,
बोले तुरन्त,
मेरी कविता ,
रहस्य – प्रतिभा,
कैसे कहूँ,
तुमसे प्रसंग?

मेरी बुद्ध – बुद्धि,
भक्ति रस में,
कविता की माला,
गूँथती गई,
कब कविता खिली?
कब सुमनप्रिय* हुई?
स्वार्थानुमान* है सभी।

अब वीरकाल,
भक्तिकाल तज और
रीतिकाल की कथा,
मैं आज ,
आधुनिकता के ,
कवि समय में ,
पग बढ़ा।

लगा माँगने ,
जय शंकर बोल,
प्रसाद जी से,
शब्द – विस्तार का प्रसाद,
वे बोले
मुझसे हैं गुरुतर*,
उत्तरोत्तर*,
निराला,
पंत कतार।

मेरे आँसू*,
परिमल* से हैं,
चिदम्बरा* से न्यून,
विरह गायिका वर्माजी में
दीपशिखा* – से हैं गुण।
वो बोले मुझसे,
बालक! रश्मिरथी* के संग,
दिनकर के पश्चात्,
बच्चन बाँचो!
मधुशाला* का मदरंग*।

गुप्तजी की भारत – भारती* ,
देंगी तुम्हें उत्साह,
जयद्रथ – वध* भी,
वीर रस घोल,
होगी अमरता – सहाय,
बस सबको पढ़कर ही,
गढ़ना!
कविता कुसुम माला,
क्यों न सुहृद सराहेंगे
तुम्हारी कविता – भला?

——

संकेत: =
1* बड़ों को नमस्कार की विधि, 2* के लिए, 3* हिन्दी के आदि कवि, 4* सज्जनों का प्रिय, 5* न्याय का एक परिभाषिक शब्द( स्व अनुमिति= ज्ञान के लिए), 6* श्रेष्ठ , 7* आगे – आगे, 8* प्रसाद जी की रचना , 9* निराला जी की रचना, 10* पतंजी रचना, 11*महादेवी वर्माजी की रचना, 12* दिनकरजी की रचना, 13* हरिवंश राय बच्चनजी की रचना, 14* मस्ती का रंग ,15* 16* गुप्तजी की रचना

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(नोट : रोहित #अपनीडिजिटलडायरी के साथ काफी पहले से जुड़े हैं। उत्तर प्रदेश में संस्कृत शिक्षक हैं। लेख, कविता, निबन्ध आदि लिखने में स्वाभाविक रुचि है। उनकी यह कविता व्हाट्स एप के जरिए डायरी तक पहुँची है।) 

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