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कविता : मैं मरते ही ‘शब्द’ हो जाऊँगा, और गाँव की हर किताब के पन्नों पर मिलूँगा…!

दीपक गौतम, सतना मध्य प्रदेश

मुझे जहान की गर्द में मत ढूँढना प्यारे।
मैं जब नहीं रहूँगा, तो गाँव की उसी
‘सुनहरी-भस्म’ के साथ उड़ता मिलूँगा,
जिसे तुम धूल कहते हो।

मैं चाय के प्याले में  घुला मिलूँगा,
जिन्दगी की मिठास बनकर।
गाँव की मिट्टी में ठहरा दिखूँगा, बिखरा रहूँगा,
उस माटी की सौंधी खुशबू बनकर।

तुम ये बात अमल में रखना,
मुझे और कहीं खोजने की कोशिश मत करना।
मुझसे मिलना हो तो बस,
नजर तराश कर आना।  
शहर के फरेबी इश्क का लबादा वहीं फेंककर आना,
आत्मा से दुनियावी जिस्म का चोला उतारकर आना।

गर फिर भी मुझ तक पहुँचने में थोड़ी देर लगे,
तो ठहर जाना और यकीन रखना।
गाँव की पगडण्डियों पर निगाहें टिकाए रखना,
दो घड़ी बीती नहीं, कि मैं देहात के देवत्त्व से फिर जी उठूँगा।
तुम्हें गाँव की हर चौक-चौपाल पर मिलूँगा। 

मैं गाँव के हर ख्वाबों-ख्यालों में मिलूँगा,
गर सपने न आएँ या टूट जाएँ, तो भी कोई बात नहीं।
मैं गाँव पर लिखी किताबों में मिलूँगा।
पढ़ लेना और भरोसा करना मुझ पर,
मैं मरते ही अमर ‘शब्द’ हो जाऊँगा।
और गाँव की हर किताब के पन्नों पर मिलूँगा,
यकीनन मिलूँगा।। 

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(दीपक मध्यप्रदेश के सतना जिले के छोटे से गाँव जसो में जन्मे हैं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग से 2007-09 में ‘मास्टर ऑफ जर्नलिज्म’ (एमजे) में स्नातकोत्तर किया। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में लगभग डेढ़ दशक तक राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, राज एक्सप्रेस और लोकमत जैसे संस्थानों में कार्यरत रहे। साथ में लगभग डेढ़ साल मध्यप्रदेश माध्यम के लिए रचनात्मक लेखन भी किया। इन दिनों स्वतंत्र लेखन करते हैं। बीते 15 सालों से शहर-दर-शहर भटकने के बाद फिलवक्त गाँव को जी रहे हैं। बस, वहीं से अपनी अनुभूतियों को शब्दों के सहारे उकेर देते हैं। कभी लेख तो कभी कविता की सूरत में। अपने लिखे हुए को #अपनीडिजिटलडायरी के साथ साझा भी करते हैं, ताकि वे #डायरी के पाठकों तक पहुँचें। ये कविता भी उन्हीं प्रयासों का हिस्सा है।)

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