सड़क के गड्ढों से जान गँवाने वालों की खबरें मीडिया में कभी बड़ी सुर्खी नहीं बनतीं।
अभी दो-तीन दिनों से एक घटना सुर्खियों में है। इसके मुताबिक, सड़क के गड्ढे की वजह से एक मृत महिला की साँसें लौट आईं। दरअसल, उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में रहने वालीं विनीता शुक्ला इसी 22 फरवरी को घर में काम करते वक्त अचानक बेहोश होकर गिर गईं। उनके घरवाले उन्हें तुरंत अस्पताल ले गए। वहाँ से उन्हें और बेहतर इलाज के लिए बरेली ले जाया गया। हालाँकि, उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ और उन्हें ‘ब्रेन-डेड’ घोषित कर दिया गया। मतलब वह व्यक्ति जिसका दिमाग काम करना बंद देता है, लेकिन साँसे पूरी बंद नहीं होतीं।
ऐसे मामलों में दो-तीन तरह की स्थितियाँ बनती हैं। एक- चिकित्सक जीवनरक्षक यंत्रों पर मरीज को कुछ दिन तक रखते हैं। दूसरी- मरीज को घर ले जाने के लिए कह दिया जाता है। ताकि घरवाले चाहें तो उसे अपने पास उसी स्थिति में रखे रह कर उसकी सेवा करते रहें, जब तक प्राकृतिक रूप से साँसें बंद न जाएँ। तीसरी- घरवालों की सहमति से अस्पताल में ही उसके जीवनरक्षक यंत्र हटाकर उसे कुछ देर बाद मृत घोषित कर दिया जाता है।
विनीता के मामले में पहली और तीसरी स्थिति बनी थी शायद। उनके घरवालों ने उनके जीवन की आस छोड़ दी थी और चिकित्सकों द्वारा उन्हें मृत घोषित कर दिए जाने के बाद वे उनकी देह को घर ले जा रहे थे, अंतिम संस्कार के लिए। पर वे लोग घर पहुँचते उससे पहले ही रास्ते में एंबुलेंस का पहिला सड़क के बीच आए एक गड्ढे में गया। एंबुलेंस को जोर का झटका लगा और विनीता की साँसें लौट आईं। उनकी आँखों में भी कुछ हलचल नजर आई। लिहाजा, आनन-फानन में एंबुलेंस को घर की दिशा के बजाय पीलीभीत के अस्पताल की ओर से मोड़ दिया गया। वहाँ चिकित्सकों ने उनकी कुछ जाँचें वगैरा कीं। जरूरी इलाज किया और नतीजे में उनकी जिंदगी लौट आई।
इस सुर्खी में यूँ तो कोई बुराई नहीं, अच्छी ही बात है कि किसी को जिन्दगी दोबारा मिल गई। मगर सवाल यह भी उठता है कि इस देश में हर साल सड़क के गड्ढों की वजह से हजारों लोग जान गँवा देते हैं। उनके साथ हुए हादसों पर कभी किसी मीडिया में व्यापक स्तर पर सुर्खी क्यों नहीं बनती? इस मुद्दे पर कोई बहस क्यों नहीं? अभियान क्यों नहीं चलाया जाता? बल्कि इसके उलट ऐसे मामलों में तो खानापूर्ति जैसे समाचार देकर ही काम चला लिया जाता है। उदाहरण के तौर पर अभी फरवरी महीने में केन्द्र सरकार ने लोकसभा में बताया कि 2020 से 2024 के बीच सड़कों पर गड्ढों की वजह से हुए हादसों में 9,438 लोग मारे गए। तब इस जानकारी के प्रति मीडिया की प्रतिक्रिया बहुत ठण्डी सी ही रही, क्यों? क्या इन जिंदगियों की कोई कीमत नहीं, क्योंकि ऐसे हादसे होते रहते हैं, सिर्फ इसलिए?
विचार कीजिए, कहीं तो गड़बड़ है। तभी तो इतनी मौतों के बाद भी समाचारों की दुनिया में सन्नाटा बना रहता है।
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