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रंगपंचमी, सूखे रंग और कैनवास पर रंगोली!

संदीप नाईक, देवास मध्य प्रदेश से, 2/4/2021

मराठी संस्कृति वृहद और समृद्ध है। इसके कई अच्छे गुणों में संस्कार से लेकर खान-पान, पहनावा और घर परिवारों का रखरखाव भी महत्वपूर्ण है। इसके लिए कल्पना और अभिव्यक्ति की बहुत ठोस जरूरत होती है। महिलाओं ने इस ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया है। बल्कि इसे अक्षुण्ण बनाए रखा है।

महाराष्ट्र में महिलाएँ अपने घर के सामने रोज सुबह रंगोली बनाती हैं। झाड़ू-पोंछा करने के बाद आँगन से लेकर घर के देवालय के सामने तक। रंगोली हवा के झोंकों से कई बार उड़ भी जाती है। लेकिन महिलाओं की यह ज़िद है कि वे अपना काम जारी रखेंगी। भले कितने आँधी-तूफान आएँ। उनके बने-बनाए चित्र और कल्पनाओं को मिटा दें, पर वे नए सृजन का काम जारी रखेंगी। पीढी-दर-पीढी निरन्तर। यही वो परम्परा और संस्कृति है, जो उन्हें रोज सुबह उठकर नया सृजित करने की, रचने की प्रेरणा देती है। हर दिन नए जोश में घर-आँगन में अपने मन से नई आकृतियाँ बनाकर ही वे दिन की शुरुआत करती हैं।

यह सिर्फ जेंडर (लैंगिक) का मुद्दा नहीं है, बल्कि सदियों से चली आ रही उस ज़िद का मसला है, जो उन्हें ज़िन्दा रखती है। अपने मन की बात कहने का मौका देती है। ज़रूरत इस बात की है कि उनके इस रचे और बनाए संसार को देखा जाए।

कालान्तर में रंगोली की यह कला जगह-जगह फैली। आज देशभर में प्रतिष्ठित कला के रूप में स्थापित है। दक्षिण भारत में इसके विभिन्न प्रकार देखने को मिलते हैं क्योंकि वहाँ भी मन्दिरों के निर्माण और बड़े भवनों पर कलाओं का बड़ा प्रभाव है। दक्षिण में फूलों की रंगोली भी सामान्य बात है। वहाँ की रंगोली का शिल्प महाराष्ट्र से एकदम अलग है। इधर देशभर में सड़कों से लेकर बड़े मैदानों में रंगोली बनाने के प्रयास भी आए दिन देखने को मिलते हैं जो कि सुकुन देने वाले हैं। 

मध्य प्रदेश का देवास शहर कभी मराठा राज्य रहा है। जाहिर है, यहाँ की कलाएँ और संस्कृति मराठी सभ्यता से प्रभावित हैं। महाराष्ट्र और मालवा के संग की संस्कृति और परम्परा में रंगोली एक जरुरी चरण है। इसका विकास यहाँ भी हुआ। सम्भवत: महाराष्ट्र के बाद मालवा में विकसित और पोषित हुई। देवास में इस परम्परा के कई वाहक रहे। स्वर्गीय अफ़जल साहब से लेकर आज के युवाओं तक। लम्बी फेहरिस्त है। यह इस बात की तस्दीक करती है कि यह परम्परा न मात्र ज़िन्दा रहेगी, बल्कि आगे भी बढ़ेगी।

इस परम्परा के वाहकों में ही एक बड़ा नाम है, मनोज पवार का। मनोज एक सम्वेदनशील कलाकार ही नहीं, संस्कृतिकर्मी भी हैं। उनके सरोकार बड़े हैं। वे कैनवास (वितान) के साथ रंगोली के रंगों से उसी तरह खेलते हैं, जैसे कूची से। अपने हाथों से रंग बनाकर खाली जमीन पर जब उनके चित्र उभरकर आते हैं, तो देखने वाले को सहसा यक़ीन नहीं होता कि यह चन्द सूखे रंगों से बनी रंगोली है।

पिछले दस वर्षों से वे लगातार देवास शहर में अपनी कला का प्रदर्शन आयोजित करते आए हैं। वे भगत सिंह को आदर्श मानते हैं। इसीलिए अक़्सर कहा करते हैं, “आज जब बाज़ार, राजनीति और आर्थिक परतंत्रताओं में समाज जकड़ा हुआ है। कलाओं के प्रति उदासीन होता जा रहा है। तो जिस आज़ाद भारत का सपना भगत सिंह जैसे लोगों ने देखा था, वह बुझ रहा है। ऐसे में, शहर का भगत सिंह क्लब यदि कार्यक्रम कर रहा है, तो ये बड़ी बात है।  मैं उन्हें यदि साल में 10-15 दिन नहीं दे सकता तो क्या अर्थ है फिर?”

अपने इसी सरोकर की वज़ह से मनोज ने कोरोना प्रसार के दौर में भी अपनी कला का प्रदर्शन किया है। इसी कारण से वे इस बार मात्र चार रंगोली ही बना पाए। लेकिन ये चार भी अपने आप में इतनी अनूठी हैं कि इन्हें घंटों निहारा जा सकता है। एकटक। इन्हीं में एक रंगोली #अपनीडिजिटलडायरी पर तस्वीर की शक्ल में यहाँ दर्ज़ की जा रही है। आज रंगपंचमी के मौके पर रंग खेले बिना ही घर बैठे, सम्भवत: इतनी रंगीन-पंचमी की कल्पना भी न कर सके कोई।  

आयोजन के दौरान मनोज से मुलाकात हुई तो वे बताने लगे, “रंगोली बनाना दुष्कर काम है। इसके लिए रंगों की समझ के साथ रेखाओं पर नियन्त्रण जरुरी है। जब रंग ठोस रूप में हाथों से छूटकर जमीन पर बिखेरते हैं तो शरीर तो टूटता है लेकिन ज़मीन पर जो नया उग आता है, वह बेहद सुकूनदायी होता है।” देश-दुनिया में अनेक कला-शिविरों में शिरकत कर चुके मनोज की चिंता ये है अलबत्ता कि रंगोली जैसी मुश्किल कला को शहर के युवा अपना तो रहे हैं, पर प्रयोग करने से डरते हैं। नया नहीं सीख रहे हैं। जोखिम लेने से भी क़तराते हैं। इसीलिए ज़रूरत इस बात की है कि शहर में रंगोली की कला और अन्य आनुषंगिक कलाओं के जानकार आगे आएँ। अपनी-अपनी गुमटियों में सिमटे रहने के बज़ाय मिलकर बेहतरी के प्रयास करें ताकि शहर का नाम और ऊँचा हो सके।” 
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(संदीप जी स्वतंत्र लेखक हैं। उन्होंने आज रंगपंचमी के मौके पर विशेष रूप से यह लेख #अपनीडिजिटलडायरी को व्हाट्स एप सन्देश के रूप में भेजा है। वे बीते कुछ दिनों से डायरी के साथ नियमित लेखन से जुड़े हैं।)

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