‘संस्कृत की संस्कृति’ : ‘परिवार दिवस’- क्या हम ‘परिवार’ की भारतीय अवधारणा समझते हैं?

अनुज राज पाठक, दिल्ली

नए दौर के चलन के मुताबिक, आज 15 मई, बुधवार को ‘परिवार दिवस’ मना लिया गया। हालाँकि कोई भी दिवस मनाना मेरे लिए बस इतना भर है कि एक क्षण का वैचारिक ठहराव। अर्थात् उस विषय में सोचना, जिससे हम उसे फिर से व्यवस्थित कर सकें। इस तरह मेरे लिए दिवस मनाना एक तरह से समीक्षा का अवसर है।

तो ‘परिवार दिवस’ पर परिवार के विषय में सोचते हैं। आज परिवार की सरकारी व्याख्या में इसका अर्थ- ‘मैं, मेरी पत्नी और मेरे बच्चे’ बस, इतना ही है। माता-पिता इसमें तब शामिल किए जाते हैं, जब वे हम पर आश्रित हों, अन्यथा नहीं। मैं मानता हूँ कि यह बड़ी सीमित व्याख्या है। निश्चित ही यह व्याख्या पाश्चात्य संस्कृति से प्रेरित है। 

वास्तव में परिवार की संकल्पना जैसे ही शुरू होती है, तो वहाँ विवाह के स्वरूप पर अवश्य बात होती है। विवाह होने से परिवार संस्था का प्रारम्भ हुआ, ये कहना अनुचित नहीं होगा। इस प्रकार परिवार में सबसे पहले ‘पति-पत्नी’ परिवार की पहली इकाई बनते हैं। इसके बाद सन्तान तथा अन्य सम्बन्ध परिवार में जुड़ते जाते हैं। उनमें सीधे-सीधे रक्त सम्बन्ध और दूर के रक्त सम्बन्धों से जुड़े लोग भी शामिल होते हैं। वास्तविक परिवार की संरचना ऐसी ही है। 

भारतीय सन्दर्भ में ‘परिवार’ एक संरक्षणात्मक इकाई है, जो अपने शाब्दिक अर्थ से भी प्रतीत होती है। इसका शाब्दिक अर्थ है – जहाँ चारो ओर से रक्षा, संरक्षा होती हो, वह परिवार। भारतीय समाज को अगर वैदिक काल से देखें तो परिवार की संकल्पना में परस्पर प्रेम सौहार्द और समृद्धि हेतु व्यवहार का मानदंड दिखाई देता है। परिवार का मुख्य आधार ही परस्पर प्रेम भाव है। परिवार के सदस्यों में परस्पर कैसा व्यवहार हो, इसका उपदेश अथर्ववेद में किया गया। इसमें ऋषि कहते हैं, “पुत्र पिता के संकल्पों को पूरा करने वाला हो। माता के समान अच्छे मन वाला अर्थात् माता के मन का कार्य करने वाला हो। पत्नी मधुरभाषिणी तथा पति को अच्छे वचन कहने वाली हो।”

अनुव्रत: पितु: पुत्रो माता भवतु संमना:। जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शान्तिवाम्।। (अथर्ववेद 3/30/2)

सोचकर देखिए, आज भी परिवार में अगर प्रेम, सद्भाव न हो तो उसमें कुछ शेष नहीं रहता फिर। इस तरह, परिवार की भारतीय अवधारणा में केवल पति-पत्नी ही नहीं हैं, और भी लोग हैं। अथर्ववेद में ही ऋषि कहते हैं, “पिता पुत्र आदि के सम्बन्ध ही मधुर न हों, भाई-भाई और बहन भी परस्पर एक सम्मति एक विचार रखने वाले हों।”

मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्, मा स्वसारमुत स्वसा। सम्यञ्चः सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया।। (अथर्ववेद 3.30.3))

ऋग्वेद में पति-पत्नी के लिए ‘दम्पती’ शब्द का प्रयोग हुआ है। इसका एक अर्थ है – स्त्री-पुरुष का जोड़ा, जबकि दूसरा अर्थ है- गृह स्वामी। इस प्रकार पति-पत्नी दोनों को एक संयुक्त इकाई के रूप में स्वीकार करते हुए घर का मालिक माना गया है। इतना ही नहीं, विवाह के समय स्त्री को सास-श्वसुर, ननद आदि के हृदय की सम्राज्ञी होने का आशीर्वाद दिया जाता है। यह भी परिवार की मजबूत अवधारणा का प्रतीक है। 

सम्राज्ञी श्वशुरे भव, सम्राज्ञी श्वश्रवां भव। ननान्दरि सम्राज्ञो भव, सम्राज्ञी अधिदेवृषु।। (ऋग्वेद 10/85/46)।

इस तरह, दो लोगों से शुरू हुई ‘परिवार’ वैदिक संकल्पना धीरे-धीरे बढ़ते हुए समस्त संसार के जीवों को अपने में समाहित कर लेती है। सभी प्राणियों को परिवार मानने की अवधारणा विकसित करती है। ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की घोषणा करती है। सभी के सह-अस्तित्त्व को महत्त्व देती है। शायद इसी संकल्पना के कारण ‘पर्यावरण’ और ‘परिवार’, ये दो अलग शब्द होने के बावजूद एक सी अवधारणा को व्यक्त करते हुए दिखाई देते हैं। 

लिहाजा, ‘परिवार दिवस’ जैसे अवसरों पर अगर हम भारतीय परिवार की इसी अवधारणा के अनुसार पारिवारिक इकाई की संकल्पना को जीवन्त कर सकें, तो निश्चित ही व्यक्ति अपना मजबूत रक्षा-तंत्र विकसित कर सकता है। ऐसा, जो सभी प्राणियों के अस्तित्त्व को सहजता से स्वीकार करता है। उसे जरूरी मानता है। ऐसा कर पाने में ही इस तरह के अवसरों की, आयोजनों सही मायने में सार्थकता है। अन्यथा ये महज औपचारिकता भर हैं। 

#SanskritKiSanskriti
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(नोट : अनुज दिल्ली में संस्कृत शिक्षक हैं। #अपनीडिजिटलडायरी के संस्थापकों में शामिल हैं। अच्छा लिखते हैं। इससे पहले डायरी पर ही ‘भारतीय दर्शन’ और ‘मृच्छकटिकम्’ जैसी श्रृंखलाओं के जरिए अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। समय-समय पर दूसरे विषयों पर समृद्ध लेख लिखते रहते हैं।)

(अनुज से संस्कृत सीखने के लिए भी उनके नंबर +91 92504 63713 पर संपर्क किया जा सकता है)
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इस श्रृंखला की पिछली 10 कड़ियाँ 

24 – ‘संस्कृत की संस्कृति’ : व्यक्ति अपने प्रयास से वर्ण-परिवर्तन करता रहा है, इसके उदाहरण हैं
23 – ‘संस्कृत की संस्कृति’ : ऋषि कौन, वेद क्या और मंत्र क्या?
22 – ‘संस्कृत की संस्कृति’ : बहस क्या है… वाद या वितण्डा? जानने के लिए पढ़िए
21- ‘संस्कृत की संस्कृति’ : “अनर्थका: हि मंत्रा:” यानि मंत्र अनर्थक हैं, ये किसने कहा और क्यों?
20 – ‘संस्कृत की संस्कृति’ : उदाहरण रूप वैदिक शब्दों की रूढ़ संज्ञा को क्या कहते हैं?
19 – ‘संस्कृत की संस्कृति’ : सुनना बड़ा महत्त्वपूर्ण है, सुनेंगे नहीं तो बोलेंगे कैसे?
18 – ‘संस्कृत की संस्कृति’ : मैं ऐसे व्यक्ति की पत्नी कैसे हो सकती हूँ?
17 – ‘संस्कृत की संस्कृति’ : संस्कृत व्याकरण में ‘गणपाठ’ क्या है? 
16 – ‘संस्कृत की संस्कृति’ : बच्चे का नाम कैसा हो- सुन्दर और सार्थक या नया और निरर्थक?
15 – ‘संस्कृत की संस्कृति’ : शब्द नित्य है, ऐसा सिद्धान्त मान्य कैसे हुआ?

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