‘संस्कृत की संस्कृति’ : भाषा और व्याकरण का स्रोत क्या है?

अनुज राज पाठक, दिल्ली

मानव अपनी माता के गर्भ से ही भाषा से परिचित होना शुरू कर देता है। कोई ऐसा नहीं जो अपने विचारों को व्यक्त नहीं करता हो। हाँ विचार व्यक्त करने के लिए अलग-अलग भाषाओं का प्रयोग अवश्य किया जाता है। हमारी भाषाएँ भिन्न हो सकती हैं। और कई व्यक्ति तो विभिन्न भाषाओं में विशिष्टता भी रखते हैं।

यानि भाषा समझना, बोलना एक कौशल है, जो मानव की बुद्धिमत्ता का बोध भी कराता है। मन में उत्पन्न अपने विचारों, भावों को जिस किसी भी प्रकार से हम व्यक्त करते हैं, वह माध्यम भाषा है। यह भाषा क्या है? कैसे बनती है? अक्षर क्या हैं? भाषा में शब्द कैसे बनते हैं? वाक्यों का निर्माण कैसे होता है? भाषा के विविध नियम क्या हैं?

ऐसे कई प्रश्न हमारे मन में प्राय: आते रहे हैं। इन प्रश्नों के उत्तर कहाँ से मिलेंगे? यह अगर हम भारतीय भाषाओं के सम्बन्ध में कहें तो निश्चित ही इसके उत्तर संस्कृत भाषा के व्याकरण के आचार्यों के पास मिलेंगे। वेदों के अंगों में ‘व्याकरण’ नामक वेदांग में इस विषय पर आचार्यों ने बहुत अधिक विचार किया है।

यह व्याकरण क्या है? इसकी उत्पत्ति कैसे हुई? व्याकरण का मूल (जड़) क्या है? व्याकरण किसने लिखा? ऐसे तमाम प्रश्नों की भी एक शृंखला है। सो, हम अब आगे इन प्रश्नों के ही उत्तर क्रमश: जानने का प्रयास करेंगे।

जैसे- संस्कृत वांग्मय अपनी समस्त बातों के स्रोत के रूप में वेदों को मान्यता देता है। इसी कारण वेद से होने के कारण प्रत्येक चीज को ‘वैदिक’ कहा जाता है। और जो वेद के अनुकूल है, उसे सही तथा जो वेद के प्रतिकूल है, वह गलत मानी जाती है। इसी के अनुसार व्याकरण का स्रोत भी वेद है। व्याकरण के प्रमाणिक आचार्यों में भगवान पतंजलि ने अपने ‘महाभाष्य’ में व्याकरण के मूल स्रोत के रूप में कई वेद मंत्रों का उल्लेख किया है। फिर भी व्यकरणशास्त्र की उत्पत्ति कब हुई, यह कहना कठिन कार्य है। 

लेकिन हमें जो ग्रन्थ प्राप्त हैं, उनके आधार पर व्याकरण की प्राचीनता का अनुमान लग सकता है। जैसे- वेदों का समय अलग-अलग मान्यताओं के अनुसार श्रृष्टि के प्रारम्भ से लेकर अति प्राचीन काल तक जाता है। वहाँ व्याकरण के सूत्र उपलब्ध हैं। रामायण महाभारत में भी व्याकरण की चर्चा है। और उपलब्ध व्याकरण ग्रन्थों में सर्वमान्य भगवान पाणिनी की ‘अष्टाध्यायी’ सबसे व्यवस्थित ग्रन्थ है। यह अति प्राचीन और प्रमाणिक होने के साथ साथ बुद्धिमत्ता पूर्ण ग्रन्थ भी है।

इसके बाद अब आगे क्रम में हम व्याकरण के विविध आचार्यों का परिचय जानेंगे।
—— 
(नोट : अनुज दिल्ली में संस्कृत शिक्षक हैं। #अपनीडिजिटलडायरी के संस्थापकों में शामिल हैं। अच्छा लिखते हैं। इससे पहले डायरी पर ही ‘भारतीय दर्शन’ और ‘मृच्छकटिकम्’ जैसी श्रृंखलाओं के जरिए अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। समय-समय पर दूसरे विषयों पर समृद्ध लेख लिखते रहते हैं।) 
——-
इस श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ 

7- ‘संस्कृत की संस्कृति’ : मिलते-जुलते शब्दों का अर्थ महज उच्चारण भेद से कैसे बदलता है!
6- ‘संस्कृत की संस्कृति’ : ‘अच्छा पाठक’ और ‘अधम पाठक’ किसे कहा गया है और क्यों?
5- संस्कृत की संस्कृति : वर्ण यानी अक्षर आखिर पैदा कैसे होते हैं, कभी सोचा है? ज़वाब पढ़िए!
4- दूषित वाणी वक्ता का विनाश कर देती है….., समझिए कैसे!
3- ‘शिक्षा’ वेदांग की नाक होती है, और नाक न हो तो?
2- संस्कृत एक तकनीक है, एक पद्धति है, एक प्रक्रिया है…!
1. श्रावणी पूर्णिमा को ही ‘विश्व संस्कृत दिवस’ क्यों?

सोशल मीडिया पर शेयर करें
From Visitor

Share
Published by
From Visitor

Recent Posts

क्रिकेट में जुआ, हमने नहीं छुआ…क्योंकि हमारे माता-पिता ने हमारी परवरिश अच्छे से की!

क्रिकेट में जुआ-सट्‌टा कोई नई बात नहीं है। अब से 30 साल पहले भी यह… Read More

10 hours ago

जयन्ती : डॉक्टर हेडगेवार की कही हुई कौन सी बात आज सही साबित हो रही है?

अभी 30 मार्च को हिन्दी महीने की तिथि के हिसाब से वर्ष प्रतिपदा थी। अर्थात्… Read More

2 days ago

अख़बार के शीर्षक में ‘चैत्र’ नवरात्र को ‘शारदीय’ नवरात्र लिखा गया हो तो इसे क्या कहेंगे?

आज चैत्र नवरात्र का प्रथम दिवस। स्वतंत्रता पश्चात् ऐसे कई नवरात्र आए भगवती देवी की… Read More

3 days ago

मध्य प्रदेश पर ‘राज करने वालों’ ने राजधानी भोपाल के राजा का तालाब चुरा लिया!

अद्भुत क़िस्म के लोग होते हैं ‘राज करने वाले’ भी। ये दवा देने का दिखावा… Read More

6 days ago

क्या ज़मीन का एक टुकड़ा औलाद को माँ-बाप की जान लेने तक नीचे गिरा सकता है?

भारत अपनी संस्कृति, मिलनसारता और अपनत्त्व के लिए जाना जाता है। इसलिए क्योंकि शायद बचपन… Read More

6 days ago