शिवाजी ‘महाराज’ : राजगढ़ में बैठे महाराज उछल पड़े, “मेरे सिंहों ने कोंढाणा जीत लिया”

बाबा साहब पुरन्दरे द्वारा लिखित और ‘महाराज’ शीर्षक से हिन्दी में प्रकाशित पुस्तक से

माघ कृष्ण पक्ष नवमी। काली डरावनी आधी रात (दिनांक 4 फरवरी 1670)। आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। झुरमुटों में झींगुर बोल रहे थे। सिंहगढ़ की पश्चिम कगार के नीचे का भीषण दर्रा। वहीं करीब 500 छायाकृतियाँ अन्धेरे को कुतरती हुई आगे बढ़ रही थीं। इन छायाओं के मुखिया थे तान्हाजीराव और सूर्याजीराव। इस दर्रे से सट कर खड़ी थी डोनागिरी की कगार। यह सीधी चट्टान कालावन्तिन और हनमन्त बुर्ज के दरमियान तनकर खड़ी थी। इसके माथे पर परकोटे नहीं थे। किला बनानेवाले को इसकी जरूरत ही नहीं महसूस हुई। इस भीषण दरें से, इतनी भयावह कगार पर इसी रास्ते को चुना था तान्हाजी ने। सच तो यह है कि ऐसे समय, ऐसे स्थान पर आने की हिम्मत यमदूतों में भी नहीं थी। पर तान्हाजीराव 500 बारातियों को लेकर निकल रहे थे सिंहगढ़ का व्याह रचाने। मुहूर्त आधी रात का।

चीते की चाल से बाराती आगे बढ़ रहे थे। इर्द-गिर्द था काला घुप्प अन्धेरा और सामने आसमान को छूती डोनागिरी की कगार। और उसके ऊपर गहरा नीला आकाश। पाँव के नीचे दबते पत्तों की चरमराहट को दबाकर, मावल की सेना बहुत ही धीमे से चल रही थी। सभी मन ही मन भवानी माता से सफलता की मनौती माँग रहे थे। उठो, उठो, उठो जगदम्बे! डोनागिरी की कगार के ठीक नीचे मावले पहुँच गए। दो मावले पीठ पर रस्से लेकर खड़े ही थे। तय था कि सबसे पहले कगार पर वे चढ़ेंगे। तान्हाजीराव ने संकेत दिया। दरारों को हाथ से टटोलते हुए वे पहाड़ पर ऐसे चढ़ने लगे मानो कोई सीढ़ी चढ़ रहे हों। गुड़ की ढेली पर चींटे की तरह मावले पहाड़ पर तेजी से चढ़ रहे थे। और देखते-देखते वे ऊपर पहुँच गए। किले पर इस तरफ सन्नाटा था।

ऊपर पहुँचकर उन्होंने जल्दी से दरारों में रस्से को फँसाया। उसी के सहारे तान्हाजी ऊपर चढ़े। उनके पीछे-पीछे चढ़े सूर्याजी और मावले वीर। गढ़ पर पहरेदार हमेशा की तरह मुस्तैदी से पहरा दे रहे थे। गढ़ के सारे दरवाजे बन्द थे। धीरे-धीरे रात गहरा रही थी। झींगुर और गढ़ के पहरेदार ही जाग रहे थे।… और भी कोई जाग रहे थे तो कोंढाणा को गले लगाने को आतुर तान्हाजी के मावले। अब तक 300 मावले चुपचाप ऊपर चढ़ आए। बाकी भी जल्दी चढ़ रहे थे। इतने में गश्त लगाने वाले चौकन्ने हो गए।आहट हुई। चीख-पुकारों से किला अचकचाकर जाग उठा। बौखलाहट में चिल्लाने लगा, “कौन मराठे? कैसे आए? कहाँ से आए? कब आए?” अचरज और क्रोध से औरंगशाही बहादुर पागल हो गए। लपककर हथियार उठा लिए। मराठों पर टूट पड़े। किले की चारदीवारी खनखनाहट से गूँज उठी।

किलेदार उदयभान बारूद की तरह भड़क उठा। आज तक का कड़ा अनुशासन, कठिन सजगता, गश्त, पहरे, तोप, बन्दूकों के मोर्चे सभी कुछ मिट्टी में मिल गया था। खुद उदयभान भी ढाल-तलवार लेकर जंग में कूद पड़ा। अब 1,500 मुगली और 500 मराठा तलवारें खनखना रही थीं। ऐसा लग रहा था मानो दावानल को पीठ पर लेकर झंझा नाच रही हो। सिंहगढ़ खून में रंग रहा था। जंग के बीच, उदयभान और तान्हाजीराव की मुठभेड़ हुई। आग पर आग टूट पड़ी। मानो बिजली ही बिजली पर टूट पड़ी हो। या दो प्रचंड पर्वतों की चोटियाँ टक्कर ले रही हों। दोनों मँझे हुए योद्धा।

दोनों इस कदर चिढ़े हुए थे, एक-दूसरे से उलझ गए थे कि ब्रह्मदेव और यमदेव बीच-बचाव के लिए आते तो भी वे अपने हथियारों को न रोकते। अचानक उदयभान ने तान्हाजीराव की ढाल पर खतरनाक वार किया। राव की ढाल ही टूट गई। दुर्भाग्य। उदयभान का लहू ठाँठें मार रहा था। वह एक के बाद एक वार कर रहा था। तान्हाजीराव ने पहचाना कि मौत की घड़ी करीब है। वह भी पूरी ताकत के साथ उदयभान का मुकाबला करने लगे। लहू का कीचड़ हो गया। एकाएक दोनों ने ही मर्मान्तक घाव किए। दो प्राणान्तिक चीखें हवा में गूँजीं और दो बहादुर जवान जमीन पर गिर पड़े।

तान्हाजीराव को गिरते हुए भावलों ने देखा। उनकी हिम्मत पस्त हुई। हड़बड़ाकर वे भागने लगे। तभी सूर्याजीराव ने पीछे मुड़कर, कगार से नीचे झूलता रस्सा ही काट डाला। उनकी वीरता को उकसाकर उन्होंने उन्हें जंग में लौटने को मजबूर किया। अब मराठे मरने-मारने पर उतारू हो गए। उनके हौसले के सामने मुगली फौज हार गई। सिंहगढ़ मराठों की मुट्ठी में आ गया (4 फरवरी 1670)। कोंढाणा पर गेरुआ झंडा फहराने लगा। मावलों की खुशी का ओर-छोर नहीं रहा था। सूर्याजी को भी खुशी हुई। पर उनकी खुशी पर दुःख का साया था। उनका राम, उनका बड़ा भाई लड़ते-लड़ते मौत को प्यारा हो गया था। पर दुःख को जब्त कर सूर्याजी उठे। कोंढाणा पर आग जलाकर उन्होंने महाराज को जीत का इशारा दिया। उसे देख राजगढ़ में बैठे महाराज उछल पड़े, “मेरे सिंहों ने कोंढाणा जीत लिया।”
—–
(नोट : यह श्रृंखला #अपनीडिजिटलडायरी पर डायरी के विशिष्ट सरोकारों के तहत प्रकाशित की जा रही है। छत्रपति शिवाजी के जीवन पर ‘जाणता राजा’ जैसा मशहूर नाटक लिखने और निर्देशित करने वाले महाराष्ट्र के विख्यात नाटककार, इतिहासकार बाबा साहब पुरन्दरे ने एक किताब भी लिखी है। हिन्दी में ‘महाराज’ के नाम से प्रकाशित इस क़िताब में छत्रपति शिवाजी के जीवन-चरित्र को उकेरतीं छोटी-छोटी कहानियाँ हैं। ये कहानियाँ उसी पुस्तक से ली गईं हैं। इन्हें श्रृंखला के रूप में प्रकाशित करने का उद्देश्य सिर्फ़ इतना है कि पुरन्दरे जी ने जीवनभर शिवाजी महाराज के जीवन-चरित्र को सामने लाने का जो अथक प्रयास किया, उसकी कुछ जानकारी #अपनीडिजिटलडायरी के पाठकों तक भी पहुँचे। इस सामग्री पर #अपनीडिजिटलडायरी किसी तरह के कॉपीराइट का दावा नहीं करती। इससे सम्बन्धित सभी अधिकार बाबा साहब पुरन्दरे और उनके द्वारा प्राधिकृत लोगों के पास सुरक्षित हैं।) 
—– 
शिवाजी ‘महाराज’ श्रृंखला की पिछली 20 कड़ियाँ 
42- शिवाजी ‘महाराज’ : तान्हाजीराव मालुसरे बोल उठे, “महाराज, कोंढाणा किले को में जीत लूँगा”
41- शिवाजी ‘महाराज’ : औरंगजेब की जुल्म-जबर्दस्ती खबरें आ रही थीं, महाराज बैचैन थे
40- शिवाजी ‘महाराज’ : जंजीरा का ‘अजेय’ किला मुस्लिम शासकों के कब्जे में कैसे आया?
39- शिवाजी ‘महाराज’ : चकमा शिवाजी राजे ने दिया और उसका बदला बादशाह नेताजी से लिया
38- शिवाजी ‘महाराज’ : कड़े पहरों को लाँघकर महाराज बाहर निकले, शेर मुक्त हो गया
37- शिवाजी ‘महाराज’ : “आप मेरी गर्दन काट दें, पर मैं बादशाह के सामने अब नहीं आऊँगा”
36- शिवाजी ‘महाराज’ : शिवाजी की दहाड़ से जब औरंगजेब का दरबार दहल गया!
35- शिवाजी ‘महाराज’ : मराठे थके नहीं थे, तो फिर शिवाजी ने पुरन्दर की सन्धि क्यों की?
34- शिवाजी ‘महाराज’ : मरते दम तक लड़े मुरार बाजी और जाते-जाते मिसाल कायम कर गए
33- शिवाजी ‘महाराज’ : जब ‘शक्तिशाली’ पुरन्दरगढ़ पर चढ़ आए ‘अजेय’ मिर्जा राजा
32- शिवाजी ‘महाराज’ : सिन्धुदुर्ग यानी आदिलशाही और फिरंगियों को शिवाजी की सीधी चुनौती
31- शिवाजी महाराज : जब शिवाजी ने अपनी आऊसाहब को स्वर्ण से तौल दिया
30-शिवाजी महाराज : “माँसाहब, मत जाइए। आप मेरी खातिर यह निश्चय छोड़ दीजिए”
29- शिवाजी महाराज : आखिर क्यों शिवाजी की सेना ने तीन दिन तक सूरत में लूट मचाई?
28- शिवाजी महाराज : जब शाइस्ता खान की उँगलियाँ कटीं, पर जान बची और लाखों पाए
27- शिवाजी महाराज : “उखाड़ दो टाल इनके और बन्द करो इन्हें किले में!”
26- शिवाजी महाराज : कौन था जो ‘सिर सलामत तो पगड़ी पचास’ कहते हुए भागा था?
25- शिवाजी महाराज : शिवाजी ‘महाराज’ : एक ‘इस्लामाबाद’ महाराष्ट्र में भी, जानते हैं कहाँ?
24- शिवाजी महाराज : अपने बलिदान से एक दर्रे को पावन कर गए बाजीप्रभु देशपांडे
23- शिवाजी महाराज :.. और सिद्दी जौहर का घेरा तोड़ शिवाजी विशालगढ़ की तरफ निकल भागे

सोशल मीडिया पर शेयर करें
Neelesh Dwivedi

Share
Published by
Neelesh Dwivedi

Recent Posts

जनगणना हो रही है, जनसंख्या बढ़ रही है और आंध्र में आबादी बढ़ाने वालों को ‘इनाम’!

देश में जनगणना होने वाली है। मतलब जनसंख्या कितनी है और उसका स्वरूप कैसा है,… Read More

17 hours ago

एक यात्रा, दो मुस्लिम ड्राइवर और दोनों की सोच….सूरत-ए-हाल गौरतलब!

अभी एक तारीख को किसी जरूरी काम से भोपाल से पन्ना जाना हुआ। वहाँ ट्रेन… Read More

3 days ago

सेवा-तीर्थ में ‘भारतीय भाषाओं’ की सेवा नहीं हुई, आगे शायद ही हो!! वीडियो से समझिए!

भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय के नए परिसर का उद्घाटन 13 फरवरी 2026 को हुआ। इसे… Read More

6 days ago

भ्रष्ट-आचार अब एक शिष्ट-विचार, इसे खत्म करना मुश्किल, दो उदाहरणों से समझिए कैसे?

‘भ्रष्ट’ का अर्थ है- जब कोई अपने धर्म (कर्तव्य-पथ) से दूर हट जाए और ‘आचार’… Read More

7 days ago

ईस्ट इण्डिया कम्पनी फिर ‘दफन’, और ‘गुलाम-सोच’ लिखती है- “सूरज डूब गया”!

ऐसी सूचना है कि अंग्रेजों की ईस्ट इण्डिया कम्पनी फिर दिवालिया हो गई और उसका… Read More

1 week ago