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रातभर नदी के बहते पानी में पाँव डालकर बैठे रहना…फिर याद आता उसे अपना कमरा

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से, 31/3/2021

उजालों में अँधेरे देखने का आदी था वो। जब दुनिया जागती, उसे लगता कि अब सूरज ढला है। रातभर नदी के बहते पानी में पाँव डालकर बैठे रहना…फिर याद आता उसे अपना कमरा। वह नीली दीवार, गाढ़े नीले रंग में पुती हुई, जो तीसरे माले पर बनी थी। कमरे के ठीक पीछे अपनी नीलाई की रोशनी में पूरी ताकत के साथ ज़िन्दा थी। 

नदी का पानी धरती के इस भू-भाग पर अविचल बह रहा है। निर्बाध और उद्दाम वेग से। वह अदभुत है। पानी में घुटने के नीचे से पाँव के पंजे तेज बहाव में दो-चार मीटर बह जाते। तब लगता कि शरीर का ऊपरी हिस्सा स्थूल और स्थिर न होता तो पानी के साथ पता नही कहाँ से कहाँ पहुँच जाता।

अन्तर्मन की गहराईयों में जब भी ध्यान लगाकर बैठता, तो उसे सब अर्थहीन सा लगता और फिर उसे अपने भीतर एक अनहद नाद सुनाई देता। अपने को सही समझने और बाकी सबको ख़ारिज करने में जीवन का लगभग सारा हिस्सा चला गया। अब इस नदी के बहते स्वच्छ कल-कल जल को देख रहा है, जो कीच के संग जंगली लकड़ियों के बड़े डूँड से लेकर नाजूक-नरम पत्तियाँ और असंख्य जीव लेकर बहता है। फिर भी उसकी पावन पारदर्शिता, पवित्रता और निर्मलता कम नहीं होती। हम जीवन में भी ऐसे ही झंझावतों से गुजरते हैं। असंख्य स्मृतियाँ, लोग, सुख-दुख के तिलिस्म और चराचर जगत के दृष्टान्त लेकर। पर हर जगह, हर किसी से चिपके रहते हैं। निर्मोही नहीं हो पाते। शायद इसलिए कि हम इन सबसे सुख या दुख का गहरा नाता जोड़ लेते हैं। निस्पृह नहीं हो पाते कभी।

यह पानी उस कमरे की गाढ़ी दीवार को क्यों नही रौंद देता जो चट्टान की तरह अडिग खड़ी है? यह सिर्फ़ प्रश्न नहीं, एक कोलाहल है। ये बेचैन करता है मुझे और मैं तय करता हूँ कि अपने अवशेषों में जीवाश्म बनकर जीना चाहता हूँ अब। लगता है कि जब अर्थ, उद्देश्य और विभीषिकाएँ खत्म हो गई हैं, जीवन से वसन्त की विदाई हो रही है, तो पतझड़ का आगमन प्रफुल्लित करता है। इधर धूप फिर सुनहरी से तीखी होने लगी है। गाढ़ी नीली दीवार से पचास कदम दूर एक जर्जर सा गुलमोहर रोज़ क्षितिज निहारता है। सुबह-शाम दर्जनों चिड़ियाएँ चहकती रहती हैं। पर पत्ते झरने से शाखें सूखी और सूनी हो गई हैं उसकी भी। 

इस नदी के प्रवाह को उस गुलमोहर की जड़ों में प्रवाहित कर धारा को मोड़ना चाहता हूँ। पर अब न चिड़ियाओं का रंग याद आ रहा है और न उनके नाम। अपने होने की निरर्थकता के मायने भी अब स्पष्ट होने लगे हैं। एकाकीपन इतना एकाकी हो जाएगा कि खुद पूरा खाली हो जाऊँगा, यह अकल्पनीय तो नही था, मगर उन्नीसवें सावन के निर्णय का प्रतिसाद एक ठीक-ठाक से मकाम पर इस तरह से विलोपित करना आरम्भ करेगा, यह नहीं सोचा था। सम्भवतः कल्पनातीत रहा होगा।

और इस सबमें प्यार – नीले गाढ़े रंग को कभी फिर से देखना – खून से ज़्यादा सुर्ख़ और ख़तरनाक लगता है। पर शेष हूँ अभी, और तब तक नीलाई में डूबा रहूँगा।

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(संदीप जी स्वतंत्र लेखक हैं। यह लेख उनकी ‘एकांत की अकुलाहट’ श्रृंखला की चौथी कड़ी है। #अपनीडिजिटलडायरी की टीम को प्रोत्साहन देने के लिए उन्होंने इस श्रृंखला के सभी लेख अपनी स्वेच्छा से, सहर्ष उपलब्ध कराए हैं। वह भी बिना कोई पारिश्रमिक लिए। इस मायने में उनके निजी अनुभवों/विचारों की यह पठनीय श्रृंखला #अपनीडिजिटलडायरी की टीम के लिए पहली कमाई की तरह है। अपने पाठकों और सहभागियों को लगातार स्वस्थ, रोचक, प्रेरक, सरोकार से भरी पठनीय सामग्री उपलब्ध कराने का लक्ष्य लेकर सतत् प्रयास कर रही ‘डायरी’ टीम इसके लिए संदीप जी की आभारी है।) 

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