टीम डायरी
मशीनी बुद्धि (एआई वगैरा) खतरनाक है। इसकी शुरुआत से ही ऐसी चेतावनियाँ जारी हो रही हैं। अब इन चेतावनियों की सच्चाई भी सामने आने लगी है। गुजरात के सूरत का मामला है। वहाँ अभी दो दिन पहले ही 18-20 साल की दो लड़कियों ने आत्महत्या की है। वह भी मशीनी बुद्धि आधारित मंच चैटजीपीटी की मदद से।
सूरत पुलिस के मुताबिक दोनों लड़कियों की अच्छी दोस्ती थी। शहर के ही एक महाविद्यालय में साथ पढ़ती थीं। वे दोनों शुक्रवार, छह मार्च की सुबह घर से निकलीं, लेकिन देर शाम तक लौटी नहीं। तब उनके घरवालों को चिंता हुई और उन्होंने पुलिस से संपर्क किया। पुलिस की तलाश में कुछ ही देर बाद एक लड़की की स्कूटी किसी मंदिर के बाहर मिली। पुलिस ने मंदिर के कैमरों की पड़ताल की तो दोनों लड़कियाँ मंदिर परिसर में बने शौचालय की ओर जाती दिखाई दीं। वहाँ पहुँचकर देखा गया, तो दोनों मृत अवस्था में मिलीं।
पुलिस ने आगे उनके फोन की छान-बीन की तो पता चला कि उन लड़कियों ने चैटजीपीटी से आत्महत्या के ऐसे तरीके पूछे थे कि जिनमें कम तकलीफ हो। मशीनी बुद्धि आधारित इस मंच ने उन्हें बड़ी सहजता से वे तमाम तरीके बताए भी। इन्हीं में से एक उन लड़कियों ने चुना। बेहोश करने वाली दवा की जरूरत से ज्यादा खुराक लेकर अपनी जान दे देने का तरीका। उन्होंने इंजेक्शन के जरिए वह दवा ली और हमेशा के लिए सो गईं।
अब सवाल उठता है कि इस घटना में गलती किसकी है? क्या चैटजीपीटी जैसे मंचों की? नहीं, बिल्कुल नहीं। वे तो मशीनी बुद्धि आधारित मंच हैं। उनकी मशीन में जितनी जानकारियाँ भरी जाती हैं, वे उसी के आधार पर प्रतिक्रिया देते हैं। असल में गलती हमारी है। हम नैसर्गिक बुद्धि वाले इंसानों की, जो धीरे-धीरे अपनी सोच-समझ को अपने ही बनाए मशीनी बुद्धि आधारित मंचों के हवाले करते जा रहे हैं। मानो कि वे हमें बनाने वाले हों, हमारे मार्गदर्शक हों, हमारे मालिक हों और हम उनकी कठपुतली भर। अलबत्ता, अभी शायद कुछ लोगों को यह बात अतिरेक लगती हो, पर यकीन मानिए, अगर हम वक्त रहते सँभले नहीं तो अगले कुछ वर्षों में यही होने वाला है। हम कठपुतलियों की तरह हो जाएँगे, और मशीनी बुद्धि वाले तमाम मंच, उपकरण, आदि हमारे मालिक।
