अख़बार की ख़बर
अनुज राज पाठक, दिल्ली
आज ‘पर्यावरण दिवस’ है। जैसे- हर साल होली, दीवाली, जैसे तीज-त्यौहार होते हैं न और उनमें कुछ रस्म-ओ-रिवाज़ के साथ जश्न होता है। वैसे ही, ‘पर्यावरण की पीड़ा’ का रस्मी रिवायतों के साथ जश्न मनाने वालों के लिए यह ख़ास दिन। ‘पर्यावरण दिवस’ या ‘पर्यावरण की पीड़ा के जश्न का त्यौहार’।
वैसे, किसी को यह सोचकर अचरज हो सकता है कि ‘पर्यावरण दिवस’ को ‘पर्यावरण की पीड़ा के जश्न का त्यौहार’ क्यों कहा गया? तो ज़वाब सीधा सा है। वह कुछ सवालों में छिपा हुआ है। कि क्या पर्यावरण संरक्ष्रण की बातें करने वालों ने अपने घरों-दफ़्तरों के आस-पास, चौक, चौबारों, चबूतरों, आदि का सीमेंटीकरण करने को हमेशा प्राथमिकता नहीं दी? क्या ऐसा करते हुए उन्होंने पेड़-पौधों की जड़ों में सीमेंट-कंक्रीट नहीं भरा? क्या उन्होंने एयरकंडीशनर जैसी कई मशीनें अपने घरों-दफ़्तरों में नहीं लगवाईं, जो बाहर पर्यावरण में बेसाख़्ता गर्मी बढ़ाने का काम कर रही हैं? क्या वे आरामतलब जीवनशैली के लिए ज़रूरी ऐसे ही अन्य कुकृत्यों में किसी न किसी रूप से शामिल नहीं हैं? और अगर इन तमाम सवालों का ज़वाब ‘हाँ’ है, तो फिर वे ‘पर्यावरण दिवस’ जैसे अवसरों को ‘पर्यावरण की पीड़ा के जश्न का त्यौहार न कहें तो क्या कहें फिर? कथनी-करनी का भेद तो प्रत्यक्ष ही है न यहाँ?
सो, अब इस सवालिया भूमिका की पृष्ठभूमि में नीचे दी गई तीन ख़बरों पर ग़ौर कीजिए। फुर्सत मिले तो विचार कीजिए। और फिर पर्यावरण की पीड़ा का रिवायती जश्न मनाइए!
पहली ख़बर – वनों की कटाई के प्रति उदासीन रहे, तो दिल्ली रेगिस्तान बन जाएगा
अभी 31 मई को ही दिल्ली उच्च न्यायालय के जस्टिस तुषार राव गेडेला की एकल पीठ ने अपने आदेश में कहा, “दिल्ली में अभी 30 मई को आधिकारिक तौर पर अधिकतम तापमान 52.3 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। यदि वर्तमान पीढ़ी ने वनों की कटाई के प्रति अपना उदासीन रवैया इसी तरह आगे भी जारी रखा, तो वह दिन दूर नहीं जब यह महानगर केवल एक बंजर रेगिस्तान बनकर रह जाएगा।”
दूसरी ख़बर – उत्तर प्रदेश सरकार 1.12 लाख पेड़ काट रही है, काँवड़ यात्रा के लिए
“उत्तर प्रदेश सरकार गाजियाबाद से मेरठ होते हुए मुजफ्फरनगर तक 110 किलोमीटर की सड़क बना रही है। दो लेन की सड़क गंगनहर पटरी से लगकर बन रही है। ताकि वहाँ से सावन के महीने में होने वाली काँवड़ यात्रा सुविधा से गुजर सके। इसके लिए 1.12 लाख पेड़ों की कटाई हो रही है।” दिलचस्प है कि यह ख़बर देने वाले अख़बार ने पहले वाक्य में ही लिखा है, ‘ख़ुशख़बरी आई, भले देर से सही।’
तीसरी ख़बर – भोपाल में अब 22 प्रतिशत बची हरियाली, 6 साल बाद 4 फ़ीसद बचेगी
मध्य प्रदेश के एक अख़बार ने बताया है, “साल 1975 तक भोपाल के भीतर 92 प्रतिशत हरियाली होती थी। इसीलिए भोपाल को हरा-भरा शहर कहते थे। इसके बाद आज से 20 साल पहले यानि 2004 तक भी शहर में क़रीब 66 फ़ीसदी हरियाली थी। लेकिन आज शहर की हरियाली का यह प्रतिशत सिमटकर 22 तक चुका गया है। और अगले 6 साल में, 2030 तक यह महज़ 4 फ़ीसदी रह जाने वाला है।’
अब मनाइए जश्न! ‘पर्यावरण की पीड़ा का जश्न’!! ‘पर्यावरण की पीड़ा’ के इस सबसे बड़े त्यौहार पर!!!
और हाँ, इस जश्न के बीच इस तरह की तमाम ख़बरों को अनदेखा ज़रूर करते चलिए। क्योंकि अगले साल भी तो यह त्यौहार आएगा ही। उस वक़्त हमारे पास जश्न मनाने का कोई न कोई ऐसा कारण तो होना ही चाहिए। वैसे भी, हम अब तक यही तो करते आ रहे हैं। क्योंकि ये तीन ख़बरें कोई इक़लौती तो हैं नहीं???
पर्यावरण दिवस की शुभकामनाएँ!!!!!
#environmentday #environmentday2024
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(नोट : अनुज दिल्ली में संस्कृत शिक्षक हैं। #अपनीडिजिटलडायरी के संस्थापकों में शामिल हैं। अच्छा लिखते हैं। इससे पहले डायरी पर ही ‘भारतीय दर्शन’ और ‘मृच्छकटिकम्’ जैसी श्रृंखलाओं के जरिए अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। समय-समय पर दूसरे विषयों पर समृद्ध लेख लिखते रहते हैं।)
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