शिवाजी महाराज : “उखाड़ दो टाल इनके और बन्द करो इन्हें किले में!”

बाबा साहब पुरन्दरे द्वारा लिखित और ‘महाराज’ शीर्षक से हिन्दी में प्रकाशित पुस्तक से

कारतलब खान से उगाही के तौर पर महाराज ने बहुत बड़ी रकम वसूल ली। सुरक्षा के लिए नेताजी को वहीं पर छोड़ तान्हाजी, पिलाजी आदि सरदारों के साथ महाराज दक्षिण कोंकण की मुहिम पर निकले (सन् 1661 फरवरी का प्रारम्भ)। उंबरखिंड दर्रे से महाराज सीधे दाभोल आए। उन्होंने दाल्भ्येश्वर के दर्शन किए। इस तरफ के कई आदिलशाही थानेदार मारे दहशत के थाने छोड़कर भाग निकले थे। पालवनी के शाही जागीरदार जसवन्तराव दलवी रफूचक्कर हो गए थे। वह श्रृंगारपुर के सूर्यराव सुर्वे की शरण में आ गए थे। इन्हीं जसवन्तराव और सूर्यराव ने पन्हालगढ़ की मोर्चेबन्दी के समय विशालगढ़ जाने से महाराज को रोक रखा था। जबकि बाजी प्रभु घोडखिंड दर्रे में जान हथेली पर लिए लड़ रहे थे। महाराज दाभोल से चिपलूण-श्रीपरशराम गए। महाराज ने परशरामजी की पूजा स्वयं की। गोविन्दभट जोशी ने संकल्प कराया। मंत्रपाठ भी किया (सन् 1661 फरवरी मध्य)।

चिपलूण के बाद महाराज संगमेश्वर गए। वहाँ से पूरब की तरफ सात कोस की दूरी पर श्रृंगारपुर है। वहाँ के सूर्यराव सुर्वे को महाराज ने वकील के जरिए बुलवा भेजा। कहा, “आप स्वराज्य में शामिल हो जाइए।” इसके लिए ऊपरी तौर पर सुर्वे ने हामी भर दी। तब तान्हाजी को संगमेश्वर छावनी में तैनात कर, बाकी फौज के साथ महाराज देवरूख गए। वहाँ से राजापुर के लिए रवाना हुए। राजापुर में अंगरेजों की टाल थी। ठिकाना। इन्हीं अंगरेजों ने करार को तोड़कर सिद्दी जौहर को बम-बारूद से मदद की थी। पन्हाला पर तोपें दागी थीं। महाराज यह सब याद रखकर राजापुर आए थे। वहाँ हेनरी रिविंग्टन, गीफर्ड वगैरा अगरेज स्वयं ही महाराज से मिलने आए। उन्हें देखते ही महाराज उबल पड़े। बोले, “इन सभी टोपीवालों को गिरफ्तार करो। इनके टाल कुदाली से उखाड़ कर रख दो। हुक्म की तामीली ताबडतोड़ होनी चाहिए” (मार्च मध्य, सन् 1661)। महाराज के हुक्म की तामीली हुई। सभी अंगरेज कैद हुए।

उधर, सुर्वे ने भी वचन तोड़ दिया। संगमेश्वर में तान्हाजी की छावनी पर एक रात हमला कर दिया। घमासान लड़ाई हुई। आखिर में सुर्वे को मैदान छोड़कर भागना पड़ा। इस समय महाराज राजापुर में थे। सुर्वे की दगाबाजी की खबर मिलते ही वे तुरन्त संगमेश्वर आए। इस सबके बावजूद, महाराज ने श्रृंगारपुर वकील भेजकर फिर सुर्वे को समझाया, ‘अब भी वक्त है। पालवनी मुकाम पर हमसे मिलिए। हमारी सेवा में दाखिल हो जाइए।’ लेकिन सुर्वे को अक्ल न आई। हितैषी वचन ठुकराकर वह शत्रु के तलवे चाटता रहा। तब महाराज फौज के साथ पालवनी की तरफ मुखातिब हुए।

महाराज ने पालवनी पर हमला किया। वहाँ का शाही जागीरदार पहले ही सुर्वे की शरण में भाग गया था। सो महाराज का प्रतिकार हुआ ही नहीं। उन्होंने जागीर को अपने आख्तियार में कर लिया। वहाँ महाराज ने सुर्वे का बहुत इंतजार किया। लेकिन उसे स्वराज्य से सख्त नफरत थी। गुलामगिरी में तीव्र रुचि। सो, वह तो आया ही नहीं। हालाँकि सभी तरह के अपराधों को माफ कर महाराज सूर्यराव को अपनाना चाहते थे। लेकिन दुर्भाग्य से उसे सुलतानी अँधेरा ही ज्यादा पसन्द था। आखिर महाराज आगबबूला हो गए। 

महाराज 15 हजार की फौज के साथ श्रृंगारपुर आए। पहाड़ों की ओट में, घने जंगल का दुशाला ओढ़ श्रृंगारपुर आराम से बैठा हुआ था। इसी घाटी में शास्त्री नदी और गालव नाम की और एक छोटी नदी बहती है। श्रृंगारपुर की आग्रेय दिशा में तीन ही कोस पर एक बुलन्द किला था। नाम था प्रचितगढ़। रहस्य-रोमांच से भरे इस दुरूह प्रदेश में महाराज ने चुपके से प्रवेश किया। शिवाजी राजे हमला करने वाले हैं, यह खबर मिलते ही सूर्यराव सकते में आ गया। फिर हड़बड़ी में घर-बार छोड़कर भाग निकला। लेकिन भागता कहाँ? बीजापुर ही की तरफ। वहाँ तो उनके देवदेवेश्वर बादशाह अली आदिलशाह रहते थे।

इधर गाँव में घुसते ही महाराज ने देखा कि सुर्वे की विशाल हवेली खुली पड़ी है। लगा कि सुर्वे वहीं कहीं छिपा होगा। जल्द ही हाथ आ जाएगा। सो, महाराज ने हवेली का चप्पा-चप्पा छान मारा। लेकिन सूर्यराव कहीं न मिला। मिलता भी कैसे? वह तो कभी का भाग निकला था। बहुत ढूँढने पर भी सूर्यराव नहीं मिला, तब महाराज का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। वे एक बड़े दालान में आ पहुँचे। सामने ही शानदार मसनद दिखाई दी। महाराज ने किसी जानकार से पूछा, “यह किसकी मसनद है?” जवाब मिला, “सूर्यराव की ही है।” सुनते ही महाराज ने जमकर लात मारी। ठोकर से मसनद उलट गई। मसनद का वही हश्र होना था। गुलाम की लाचार खिदमत से मिली हुई बक्षीस ही तो थी वह गद्दी। श्रृंगारपुर महाराज के आख्तियार में आ गया (दिनांक 26 अप्रैल 1661)। इसी समय पास का प्रचितगढ़ भी मावलों ने जीत लिया। इसके बाद महाराज राजगढ़ की तरफ लौटे। 
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(नोट : यह श्रृंखला #अपनीडिजिटलडायरी पर डायरी के विशिष्ट सरोकारों के तहत प्रकाशित की जा रही है। छत्रपति शिवाजी के जीवन पर ‘जाणता राजा’ जैसा मशहूर नाटक लिखने और निर्देशित करने वाले महाराष्ट्र के विख्यात नाटककार, इतिहासकार बाबा साहब पुरन्दरे ने एक किताब भी लिखी है। हिन्दी में ‘महाराज’ के नाम से प्रकाशित इस क़िताब में छत्रपति शिवाजी के जीवन-चरित्र को उकेरतीं छोटी-छोटी कहानियाँ हैं। ये कहानियाँ उसी पुस्तक से ली गईं हैं। इन्हें श्रृंखला के रूप में प्रकाशित करने का उद्देश्य सिर्फ़ इतना है कि पुरन्दरे जी ने जीवनभर शिवाजी महाराज के जीवन-चरित्र को सामने लाने का जो अथक प्रयास किया, उसकी कुछ जानकारी #अपनीडिजिटलडायरी के पाठकों तक भी पहुँचे। इस सामग्री पर #अपनीडिजिटलडायरी किसी तरह के कॉपीराइट का दावा नहीं करती। इससे सम्बन्धित सभी अधिकार बाबा साहब पुरन्दरे और उनके द्वारा प्राधिकृत लोगों के पास सुरक्षित हैं।) 
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शिवाजी ‘महाराज’ श्रृंखला की पिछली 20 कड़ियाँ 
26- शिवाजी महाराज : कौन था जो ‘सिर सलामत तो पगड़ी पचास’ कहते हुए भागा था?
25- शिवाजी महाराज : शिवाजी ‘महाराज’ : एक ‘इस्लामाबाद’ महाराष्ट्र में भी, जानते हैं कहाँ?
24- शिवाजी महाराज : अपने बलिदान से एक दर्रे को पावन कर गए बाजीप्रभु देशपांडे
23- शिवाजी महाराज :.. और सिद्दी जौहर का घेरा तोड़ शिवाजी विशालगढ़ की तरफ निकल भागे
22- शिवाजी महाराज : शिवाजी ने सिद्दी जौहर से ‘बिना शर्त शरणागति’ क्यों माँगी?
21- शिवाजी महाराज : जब 60 साल की जिजाऊ साहब खुद मोर्चे पर निकलने काे तैयार हो गईं
20-  शिवाजी महाराज : खान का कटा हुआ सिर देखकर आऊसाहब का कलेजा ठंडा हुआ
19- शिवाजी महाराज : लड़ाइयाँ ऐसे ही निष्ठावान् सरदारों, सिपाहियों के बलबूते पर जीती जाती हैं
18- शिवाजी महाराज : शिवाजी राजे ने जब अफजल खान के खून से होली खेली!
17- शिवाजी महाराज : शाही तख्त के सामने बीड़ा रखा था, दरबार चित्र की भाँति निस्तब्ध था
16- शिवाजी ‘महाराज’ : राजे को तलवार बहुत पसन्द आई, आगे इसी को उन्होंने नाम दिया ‘भवानी’
15- शिवाजी महाराज : कमजोर को कोई नहीं पूछता, सो उठो! शक्ति की उपासना करो
14- शिवाजी महाराज : बोलो “क्या चाहिए तुम्हें? तुम्हारा सुहाग या स्वराज्य?
13- शिवाजी ‘महाराज’ : “दगाबाज लोग दगा करने से पहले बहुत ज्यादा मुहब्बत जताते हैं”
12- शिवाजी ‘महाराज’ : सह्याद्रि के कन्धों पर बसे किले ललकार रहे थे, “उठो बगावत करो” और…
11- शिवाजी ‘महाराज’ : दुष्टों को सजा देने के लिए शिवाजी राजे अपनी सामर्थ्य बढ़ा रहे थे
10- शिवाजी ‘महाराज’ : आदिलशाही फौज ने पुणे को रौंद डाला था, पर अब भाग्य ने करवट ली थी
9- शिवाजी ‘महाराज’ : “करे खाने को मोहताज… कहे तुका, भगवन्! अब तो नींद से जागो”
8- शिवाजी ‘महाराज’ : शिवबा ने सूरज, सूरज ने शिवबा को देखा…पता नहीं कौन चकाचौंध हुआ
7- शिवाजी ‘महाराज’ : रात के अंधियारे में शिवाजी का जन्म…. क्रान्ति हमेशा अँधेरे से अंकुरित होती है

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Neelesh Dwivedi

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