टीम डायरी
अभी 20 जुलाई, रविवार को एक समाचार आया। इसमें बताया गया कि डिजिटल या कहें कि यूपीआई (एकीकृत भुगतान इन्टरपेस) से पैसों के लेन-देन के मामले में भारत पूरी दुनिया में पहले नम्बर पर पहुँच गया है। देश में जून के महीने में 18.39 अरब लेन-देन यूपीआई से हुए। इनमें 24 लाख करोड़ रुपए एक से दूसरे हाथ में पहुँचे। इस तरह भारत दुनियाभर में डिजिटल लेन-देन के क्षेत्र में अग्रणी बन गया।
पिछले साल जून के महीने में ही 13.88 अरब लेन-देन यूपीआई से हुए थे। यानि इस जून में पिछले साल के इसी महीने के मुकाबले 32 प्रतिशत की बढ़त हो गई। आज देश के 49.1 करोड़ लोग यूपीआई से लेन-देन करते हैं। साथ ही 6.5 करोड़ छोटे-बड़े व्यापारी भी यूपीआई को प्राथमिकता देते हैं। यद्यपि, कर प्रणाली से जुड़े अधिकारी देश की शानदार सफलता को पीछे धकेलने का कारण बन सकते हैं।
यह कोई आशंका नहीं, बल्कि सच्चाई है। कर्नाटक के हावेरी से खबर है। वहाँ सरकारी स्कूल के मैदान में शंकरगौड़ा नामक कारोबारी सब्जी का ठेला लगाते हैं। उन्हें हाल ही में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) विभाग ने 29 लाख रुपए का कर चुकाने का नोटिस थमा दिया है। उसमें बताया गया है, “आपने चार साल में 1.63 करोड़ रुपए का व्यवसाय किया है। इसलिए आप पर 29 लाख रुपए जीएसटी बनता है।”
अब शंकरगौड़ा परेशान हैं। वे बताते हैं, “मेरी छोटी सी दुकान है। मैं किसानों से सब्जी खरीदकर लाता हूँ और बेचता हूँ। मैंने तो ग्राहकों की सुविधा के यूपीआई से भुगतान लेना शुरू किया था क्योंकि आज-कल ज्यादातर लोग उसी से पैसे देते हैं। लेकिन मुझे क्या पता था कि मुझसे इतना अधिक कर चुकाने की माँग कर ली जाएगी। जबकि मैं सालाना आयकर रिटर्न भरता हूँ। मेरे पास उसका पूरा रिकॉर्ड भी मौजूद है।”
जीएसटी का नोटिस मिलने के बाद शंकरगौड़ा ने यूपीआई से भुगतान लेना बन्द कर दिया है। हालाँकि, वे ऐसा करने वाले अकेले नहीं हैं। कर्नाटक में ही राजधानी बेंगलुरू में इन्हीं कारणों से कई ठेले-रेहड़ी वालों ने यूपीआई से भुगतान लेना बन्द कर दिया है। उन्होंने तो अपनी दुकानों पर सूचना भी चस्पा कर दी है कि वे ‘सिर्फ नगद भुगतान लेंगे’। वैसे, उनकी इस कार्रवाई का कई लोग विरोध करने लगे हैं।
बेंगलुरू के दुकानदारों ने जब यूपीआई से लेन-देन बन्द करने की पहल की, तो सोशल मीडिया पर इसे लेकर बहस छिड़ गई। कई जागरूक नागरिक तर्क दे रहे हैं कि जब “देश के तमाम लाेग कर चुका रहे हैं तो इन दुकानदारों को इसमें क्या दिक्कत है? उन्हें क्यों नहीं कर चुकाना चाहिए?”
सवाल जाइज हैं, लेकिन यह भी देखना होगा कि छोटा दुकानदार भले कारोबारी लेन-देन कितना भी करता हो, मगर क्या वह आरामतलब जीवन जी रहा है? क्या वह लेन-देन के दिख रहे आँकड़ों के अनुसार करोड़पतियों की तरह जीवन की तमाम सुख-सुविधाओं का उपभोग कर रहा है? या हाड़तोड़ मेहनत कर रोज कुआँ खोदने और पानी निकालने वाली स्थितियों से जूझ रहा है? ऐसा आकलन जरूरी है।
आज जब भारत में सभी तरह के लेन-देन तेजी से डिजिटल हाे रहे हैं, यूपीएआई से किए जा रहे हैं, तो सबके कारोबार-आमदनी, आदि की जानकारियाँ सरकार के पास पारदर्शिता से पहुँच रही हैं। ऐसे में सरकार का भी कर्त्तव्य बनता है कि वह व्यवस्था में अधिक पारदर्शिता लाए। कुछ ऐसी व्यवस्था बनाए कि लोग ‘करों के आतंक’ से घबराएँ नहीं, बल्कि अपनी इच्छा से कर चुकाने को राजी हों।
