पवन जैन ‘घुवारा’, टीकमगढ़, मध्य प्रदेश
‘हीरे’ का आशय सिर्फ हीरे से मत निकालिए, बल्कि उन बहुमूल्य खनिजों से इसका अर्थ जोड़िए जो हर कहीं उपलब्ध नहीं होते। हालाँकि बुन्देलखण्ड के लगभग हर जिले में ऐसे बेशकीमती खनिज प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। कुछ उदाहरण देखिए। यहाँ के पन्ना जिले के हीरे दुनियाभर में प्रसिद्ध रहे हैं। एक समय था, जब यह पत्थर केवल भारत में मिलता था, सिर्फ बुन्देलखण्ड में। ब्राजील और अफ्रीका में तो काफी बाद में हीरे की खोज हुई।
इतना ही नहीं, यहाँ के दमोह, छतरपुर और दतिया में चूना पत्थर खूब मिलता है। दक्षिणी ललितपुर में बेसाल्टिक चट्टानें तथा पन्ना और सागर में बलुआ पत्थर पाया जाता है। यहाँ के ग्रेनाइट को ‘बुन्देलखण्ड ग्रेनाइट’ कहा जाता है, जो प्राचीन काल से उपलब्ध रहा है। झाँसी, ललितपुर, महोबा, बाँदा, दतिया, छतरपुर, पन्ना और सागर में गुलाबी लाल और धूसर (ग्रे) रंग के ग्रेनाइट मिलते हैं। सागर, पन्ना के कुछ हिस्सों में बहुरंगी और काले ग्रेनाइट भी हैं।
छतरपुर जिले में ‘झाँसी रेड’ और ‘फॉर्च्यून रेड’ नाम की ग्रेनाइट की दो बेशकीमती किस्मे पाई जाती हैं। यहाँ पर सफेद, बफ, क्रीम, गुलाबी और लाल बलुआ पत्थर विंध्य की पहाड़ियों में विभिन्न परतों में पाई जाती हैं, मुख्यतः पन्ना, सागर जिलों में। इस बलुआ पत्थर का उपयोग विभिन्न प्रकार की कलाकृतियाँ बनाने के लिए किया जाता है। ललितपुर में बलुआ पत्थर की दो प्रमुख किस्मे पाईं जातीं हैं। उन्हें ‘ललितपुर ग्रे’ और ‘ललितपुर पीला’ कहा जाता है। बलुआ पत्थर की अन्य किस्में छतरपुर में भी पाई जाती हैं।
यहाँ पर पायरोफिलिट नामक एक नरम और हल्के पत्थर के निक्षेप हैं। यह मुख्यत झाँसी, ललितपुर, महोबा, टीकमगढ़ और छतरपुर जिलों में है। इसका उपयोग मुख्यतः सजावटी सामान बनाने के लिए किया जाता है। इसको दोस्पोर के साथ मिलाकर औद्योगिक उपयोग भी किया जाता है। यहाँ पर सड़कों और भवन निर्माण के काम आने वाला पर्याप्त मात्रा में चूना पत्थर पाया जाता है, मुख्यत सागर, दमोह और पन्ना जिलों में।
यहाँ के चित्रकूट जिले में पाई जाने वाली सिलिका रेत भारत में काँच निर्माण के लिए एक अच्छा स्रोत है। ललितपुर और छतरपुर में पाया जाने वाला रॉक फास्फेट का उपयोग उर्वरक उद्योग में किया जाता है। ललितपुर में निम्न श्रेणी के लौह अयस्क के भंडार भी हैं। दतिया, पन्ना और टीकमगढ़ में पाई जाने वाली मिट्टी का उपयोग चूना और सीमेन्ट उद्योग में किया जाता है। बाँदा और सागर जिले में डोलोमाइट पाया जाता है।
कहने का आशय है कि इस क्षेत्र की धरती का कण-कण बेशकीमती है। यहाँ की धरती रत्नगर्भा है। तमाम बेशकीमती खनिजों के यहाँ भण्डार हैं। इसके बावजूद यह क्षेत्र पिछड़ेपन, बेरोजगारी और पलायन की समस्या से जूझ रहा है। इन समस्याओं से छुटकारा पाने की गरज से ही बुन्देलखण्ड को अलग प्रदेश के रूप में पहचान दिलाने के प्रयास दशकों से चल रहे हैं। लेकिन अब तक किसी ‘सरकार’ के कान में जूँ नहीं रेंगी है। प्रश्न है कि धरती के भीतर से समृद्ध और धरती के ऊपर से बेहाल यह क्षेत्र कब तक अपनी अलग पहचान की बाट जोहेगा?
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(पवन जैन मूल रूप से बुन्देलखण्ड के टीकमगढ़ जिले के सक्रिय सामाजिक तथा राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। जनसामान्य से जुड़े मसलों पर वह लगातार आवाज बुलन्द करते हैं। उनकी पत्नी प्रियंका भी उन्हीं की तरह सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर सक्रिय रहती हैं। लेख के रूप में वे अपने विचार #अपनीडिजिटलडायरी को व्हाट्स एप के जरिए भेजते हैं।)
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