शिवाजी महाराज : शिवाजी राजे ने जब अफजल खान के खून से होली खेली!

बाबा साहब पुरन्दरे द्वारा लिखित और ‘महाराज’ शीर्षक से हिन्दी में प्रकाशित पुस्तक से

शिवाजी राजे ने अफजल खान से लोहा लेने की ठान ली। इसी अफजल खान ने बेड़ियाँ डालकर उनके पिता की बारात निकाली थी। इसी ने उनके बड़े भाई को कनकगिरी पर धोखा दिया था। और अब वही भोसले और स्वराज्य को कुचल डालने के लिए महिषासुर की तरह दहाड़ता, दौड़ता चला आ रहा था। राजे ने तय किया कि सह्याद्रि में उसी का कचूमर निकालना है। इसके लिए राजे ने कूटनीति का सहारा लिया। महाबलेश्वर की जटाओं तथा रड़तोंडी के होठों में बसे प्रतापगढ़ किले के पास दाँव खेलना था। घने जंगलों और ऊँची चोटियों के घेरे में खड़ा प्रतापगढ़, शेर की माँद से कम खतरनाक न था।

राजे प्रतापगढ़ रवाना होने वाले थे। जिजाऊ साहब से आशीष लेकर अखाड़े में निश्चित रूप से कूद पड़ना था। सईबाई रानी साहिबा मृत्युशय्या पर थीं। राजे जानते थे कि वह जिन्दगी के आखिरी सफर पर चल पड़ी हैं। फिर भी दिल पर पत्थर रखकर उन्हें राजनीति के अखाड़े की तरफ मुड़ना पड़ रहा था। व्रतस्थों का जीवन बड़ा कठिन होता है। और जिसमें मुश्किल नहीं, उसे व्रत भी कैसा कहा जा सकता है? राजे ने जिजाऊ साहब की पगधूलि ली। आऊसाहब ने मन को कड़ा करके राजे को रुख्सत किया। आशीष दिया, “शिवबा, जीत तुम्हारी होगी। यश का बीड़ा जीतकर वापस आओ। बुद्धि से काम लो। सम्भाजी का उधार चुकाकर आओ।” साफ शब्दों में वह शिवाजी को कह रही थीं कि अफजल खान से बदला ले लो।

शिवाजी राजे प्रतापगढ़ की ओर चले (दिनांक 11 जुलाई, 1659)। धुआँधार बारिश। प्रतापगढ़ राजगढ़ की नैऋत्य में 10 कोस पर था। खान ने वाई में डेरा डाला था। खान की सैनिक शक्ति प्रचंड थी। प्रतापगढ़ वाई से भी 10 कोस ही दूर था। लेकिन दोनों के बीच में खड़ा था, महाबलेश्वर का प्रचंड पर्वत। राजे प्रतापगढ़ पहुँच गए। शीघ्र ही मावलों की फौज एवं सरदारों के साथ कान्होजी जेधे भी प्रतापगढ़ आए। राजे दाँव-पेंच का ढाँचा बना रहे थे। बारिश की वजह से दोनों तरफ की सैनिक हलचल बन्द थी। छावनियों में योजनाएँ बन रहीं थीं। फिर जब भाद्रपद खत्म होने को था, बारिशें कम हो रही थीं, अचानक राजे को मर्मान्तक आघात सहना पड़ा। सईबाई रानी साहिबा मौत को प्यारी हो गई (दिनांक 9 सितंबर, 1659)। प्रिय पत्नी की मृत्यु की पीड़ा को शिवाजी चुपचाप सह गए। जनसामान्य को सुखी करने का उन्होंने प्रण लिया था। सो, अब उन्हें चिन्ता थी स्वराज्य पर आए संकट की।

बारिशें खत्म हो गईं। वाई में खान अपनी ताकत बढ़ा रहा था। अन्तिम हेतु एक ही था, शिवाजी का सफाया। उसने अपने वकील कृष्णाजी भास्कर कुलकर्णी को प्रतापगढ़ रवाना किया। वकील के जरिए राजे को सन्देश और सरकारी पत्र की थैली भेजी। कलहवाया था, “बगावत से हथियाए सारे किले और मुल्क हमारे हवाले करो। हमसे हाथ मिलाओगे तो बादशाह अब भी तुम्हें माफ करेगा। हमसे उलझोगे तो अंजाम बहुत बुरा होगा।” प्रतापगढ़ के दर्रे में बैठे शिवाजी को खान खुले मैदान में लाना चाहता था। लेकिन राजे चौकन्ने थे। उन्होंने चालाकी से जबाव दिया, “मैं वाकई बहुत डरा हुआ हूँ। शरण में आना चाहता हूँ। लेकिन वाई आकर मिलने का मुझमें साहस नहीं है। अच्छा हो, अगर खान साहब प्रतापगढ़ के नीचे आ जाएँ। वहाँ उनसे मिलने जरूर जाऊँगा।” शिवाजी की बात खान ने मान ली। दल-बल के साथ वह प्रतापगढ़ की तलहटी में, कोयना नदी के परिसर में आया। मिलने का दिन मुकर्रर हुआ, मार्गशीर्ष शुद्ध (शुक्ल पक्ष) सप्तमी।

राजे को पक्की खबरें मिली थीं कि खान निश्चित रूप से उन्हें दगा देने वाला है। इसलिए राजे बहुत सतर्क थे। खान की फौज को पहाड़ों में, जंगलों में छिपे मावलों ने घेर रखा था। शिरवल, सासवड़, और सुपे थानों पर मुलाकात के ही दिन हमला करने की योजना थी। मुलाकात से एक दिन पहले आधी रात को किले पर इकट्ठा हुए जिगरी दोस्तों एवं स्वजनों के साथ राजे ने सलाह-मशवरा किया। सबको उनकी जगहें और काम भली-भाँति समझा दिए। उन्होंने सबको आदेश दिया, “मेरे साथ दगा होने की हालत में नेताजी पालकर के सेनापतित्त्व में लड़कर स्वराज्य की रक्षा करनी है। दुश्मन के दाँत खट्टे करने हैं।” वह चम्पाषष्ठी की रात थी।

सुबह हुई। राजे शिवशंकर की पूजा करने लगे। उस समय खान अपनी छावनी में बैठकर भविष्य के सुनहरे सपने देख रहा था। खान पालकी से मुलाकात के लिए रवाना हुआ। वहाँ राजे ने मुलाकात के लिए बढ़िया शामियाना लगवाया था। इसी समय खान की फौज के चारों तरफ की कन्दराओं में छिपे मावला सैनिक इशारे की राह देख रहे थे। नियत समय से पहले ही खान शामियाने में आ पहुँचा। अपनी जीत के बारे में उसे सन्देह नहीं था। इसीलिए वह गाफिल हो गया। शिवाजी की घबराहट के नाटक को खान सच समझ बैठा। और यहीं धोखा खा गया। कहते हैं कि सेनापति, विद्वान्, कलाकार और पहलवान को कभी घमंड नहीं करना चाहिए। इस बात को अफजल खान भूल गया। 

शिवाजी राजे ने बख्तर-जिरह के ऊपर मोटे कपड़े की कमीज पहन रखी थी। उसके ऊपर थी पारदर्शी मलमल की कमीज। सिर पर लोहे के टोप पर हमेशा की तरह साफा पहना हुआ था। साथ में बघनखा, बिछुआ कटार और तलवार आदि ले लिए। राजे भगवान के दर्शन कर खान से मिलने चले। प्रतापगढ़ का वातावरण गम्भीर था। किले पर समुचित प्रबन्ध किया गया था। खान से मुलाकात होते ही इशारे पर तोपें दागने की व्यवस्था राजे ने की हुई थी। हर बात में राजे ने योजनाबद्ध खबरदारी ले रखी थी।

राजे चल पड़े। सधे हुए कदम नीचे की तरफ बढ़ रहे थे। उनके साथ सम्भाजी कावजी कोंढालकर, जिवा महाला सकपाल, इब्राहिम येसाजी कंक वगैरा 10 विश्वसनीय आदमी थे। ये लोग मुलाकात की जगह से थोड़ी दूरी पर, बाण के फासले पर, रुकने वाले थे। मुलाकात के करारनामे में यह तय हुआ था। खान से मिलने के लिए राजे किले से नीचे उतरने को हुए और पूरा प्रतापगढ़ रुआँसा हो गया। कई मावला सैनिक राजे के इर्द-गिर्द इकट्ठा हुए। कहने लगे, “हमें भी साथ ले चलिए।” राजे उनका प्यार जानते थे। उतने ही प्यार से वह बोले, “मेरे साथ वही आएँगे, जिनका आना तय हुआ है। बाकी सब यहीं रहेंगे। किले की रक्षा करेंगे। तुम सब हमारे भाई की जगह हो। सम्भाजी राजे का ख्याल रखो। स्वराज्य नेताजी पालकर के हाथों में दिया है। उनकी सहायता करो। धीरज से काम लो।”

राजे गढ़ से नीचे उतरे। लेकिन बीच राह में ही रुक गए। खान शामियाने में आकर बैठा हुआ था। लेकिन सैयद बन्दा नाम के एक शूर जवान को वह शामियाने में ले आया था। जबकि तय हुआ था कि शामियाने में वकील के सिवा और किसी को नहीं लाना है। सैयद बन्दा के बारे में राजे जान गए। उन्होंने खान को सन्देश भेजा- “सैयद बन्दा को हटा लो। मुझे डर लगता है। खान साहब मेरे पिता की तरह हैं। लेकिन गुनहगार हूँ, इसलिए डरा भी हूँ।” राजे के वहम से खान और ज्यादा गाफिल हुआ। उसने सोचा कि बागी शिवाजी का सफाया होने में अब देर नहीं। कोयना के परिसर में जमा खान की सेना भी बिल्कुल बेखबर थी। मगर शिवाजी सजग। सैयद बन्दा के हटते ही वे शामियाने में पहुँच गए।

शिवाजी को देख ऊँचा-तगड़ा खान उठ खड़ा हुआ। अपनत्व और स्वागत की निःदर्शक मुस्कान क्षण मात्र उसके चेहरे पर झलकी। लेकिन शिवाजी जानते थे कि खान का अपनत्व झूठा है। उसकी मुस्कान जहर से बुझी है। ऐसी जहर बुझी मुस्कान का, झूठे अपनत्व का जवाब देना उन्हें खूब आता था। तभी खान थोड़ा आगे आया। यमदूतों के सीने भी धड़क उठे। अब क्या हो? घमंडी खान ने सुल्तानी मगरूरी से शिवाजी से कहा, “क्यों बहादुरी की शेखी बघारते हो? बेअदबी से गलत रास्ते पर बढ़ने की जुर्रत करते हो? तुम्हारी शामत आई है, जो बादशाह अली आदिलशाह, बादशाह कुतुबशाह और मुगल बादशाह की हुकूमत को ठोकर मार, उद्दण्डता से पेश आने लगे हो। पर बच्चू तेरे घमंड को चकनाचूर कर तुझे सबक सिखाने की खातिर ही मैं यहाँ आया हूँ। खैरियत चाहते हो तो ये सारे किले मेरे कब्जे में देकर, मेरे पनाह में आओ। फिर पहले मैं तुम्हें बादशाह अली आदिलशाह के सामने हाजिर करूँगा। उनके सामने तुम्हारा शीश झुकाऊँगा। उसके बाद, मेरे बच्चे, हुजूर से तुझे बहुत बड़ी जागीर दिलवाऊँगा। आ, पहले इस अफजल खान के गले तो लग जा।” 

आलिंगन के लिए खान ने दोनों बाँहें पसार दीं। खान अपने मजबूत हाथों के शिकंजे में शिवाजी राजे का, आऊसाहब के पुत्र सुख का और सह्याद्रि के सीने का दम घोंटना चाहता था। खान ने शिवाजी राजे को आलिंगन में जकड़ लिया। खान के सामने राजे बौने ही लग रहे थे। राजे का सिर खान की बगल तक आ गया। खान ने बाँहों को कसकर राजे की गर्दन अपनी बगल में दबा ली। और तुरन्त कटार निकालकर राजे की दाई बगल में घोंप दी। ऊपर से नीचे तक, एक फर्राटे के साथ राजे की कमीज फट गई। अन्दर बख्तर था, सो राजे बच गए। लेकिन अब इससे पहले कि खान कुछ समझ पाता, अगले ही क्षण  शिवाजी की तेज बिछुआ कटार उसके पेट में घुस गई। खान की आँतें ही बाहर निकल आई। प्राणान्तिक वेदना से चीख उठा वह। आह, दगा! दगा! लहू! दुश्मन ने मुझे कत्ल किया। इसे काटो, खत्म करो। आह…।
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(नोट : यह श्रृंखला #अपनीडिजिटलडायरी पर डायरी के विशिष्ट सरोकारों के तहत प्रकाशित की जा रही है। छत्रपति शिवाजी के जीवन पर ‘जाणता राजा’ जैसा मशहूर नाटक लिखने और निर्देशित करने वाले महाराष्ट्र के विख्यात नाटककार, इतिहासकार बाबा साहब पुरन्दरे ने एक किताब भी लिखी है। हिन्दी में ‘महाराज’ के नाम से प्रकाशित इस क़िताब में छत्रपति शिवाजी के जीवन-चरित्र को उकेरतीं छोटी-छोटी कहानियाँ हैं। ये कहानियाँ उसी पुस्तक से ली गईं हैं। इन्हें श्रृंखला के रूप में प्रकाशित करने का उद्देश्य सिर्फ़ इतना है कि पुरन्दरे जी ने जीवनभर शिवाजी महाराज के जीवन-चरित्र को सामने लाने का जो अथक प्रयास किया, उसकी कुछ जानकारी #अपनीडिजिटलडायरी के पाठकों तक भी पहुँचे। इस सामग्री पर #अपनीडिजिटलडायरी किसी तरह के कॉपीराइट का दावा नहीं करती। इससे सम्बन्धित सभी अधिकार बाबा साहब पुरन्दरे और उनके द्वारा प्राधिकृत लोगों के पास सुरक्षित हैं।) 
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शिवाजी ‘महाराज’ श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ 
17- शिवाजी महाराज : शाही तख्त के सामने बीड़ा रखा था, दरबार चित्र की भाँति निस्तब्ध था
16- शिवाजी ‘महाराज’ : राजे को तलवार बहुत पसन्द आई, आगे इसी को उन्होंने नाम दिया ‘भवानी’
15- शिवाजी महाराज : कमजोर को कोई नहीं पूछता, सो उठो! शक्ति की उपासना करो
14- शिवाजी महाराज : बोलो “क्या चाहिए तुम्हें? तुम्हारा सुहाग या स्वराज्य?
13- शिवाजी ‘महाराज’ : “दगाबाज लोग दगा करने से पहले बहुत ज्यादा मुहब्बत जताते हैं”
12- शिवाजी ‘महाराज’ : सह्याद्रि के कन्धों पर बसे किले ललकार रहे थे, “उठो बगावत करो” और…
11- शिवाजी ‘महाराज’ : दुष्टों को सजा देने के लिए शिवाजी राजे अपनी सामर्थ्य बढ़ा रहे थे
10- शिवाजी ‘महाराज’ : आदिलशाही फौज ने पुणे को रौंद डाला था, पर अब भाग्य ने करवट ली थी
9- शिवाजी ‘महाराज’ : “करे खाने को मोहताज… कहे तुका, भगवन्! अब तो नींद से जागो”
8- शिवाजी ‘महाराज’ : शिवबा ने सूरज, सूरज ने शिवबा को देखा…पता नहीं कौन चकाचौंध हुआ
7- शिवाजी ‘महाराज’ : रात के अंधियारे में शिवाजी का जन्म…. क्रान्ति हमेशा अँधेरे से अंकुरित होती है
6- शिवाजी ‘महाराज’ : मन की सनक और सुल्तान ने जिजाऊ साहब का मायका उजाड़ डाला
5- शिवाजी ‘महाराज’ : …जब एक हाथी के कारण रिश्तों में कभी न पटने वाली दरार आ गई
4- शिवाजी ‘महाराज’ : मराठाओं को ख्याल भी नहीं था कि उनकी बगावत से सल्तनतें ढह जाएँगी
3- शिवाजी ‘महाराज’ : महज पखवाड़े भर की लड़ाई और मराठों का सूरमा राजा, पठाणों का मातहत हुआ
2- शिवाजी ‘महाराज’ : आक्रान्ताओं से पहले….. दुग्धधवल चाँदनी में नहाती थी महाराष्ट्र की राज्यश्री!
1- शिवाजी ‘महाराज’ : किहाँ किहाँ का प्रथम मधुर स्वर….

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Neelesh Dwivedi

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