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सनातन वैदिक धर्म में श्रौत परम्परा अपरिहार्य क्यों है?

समीर शिवाजीराव पाटिल, भोपाल मध्य प्रदेश

प्राय: आस्तिक लोग वेदों की सर्वोच्चता को स्वीकार करते हैं, लेकिन इस स्वीकृति के क्या मायने होते हैं, यह जानने-समझने का उपाय किसी के पास नहीं दिखता। हम सबने दिव्य लीला जगत में लीन रहने वाले सन्तों की पर्याप्त रसपूर्ण कथाएँ सुनी हैं। उनके प्रेम और समर्पण से पगी रागानुगा भक्ति से गहरे तक प्रभावित भी हुए हैं। हम ज्ञानी परमहंस महात्माओं की कैवल्य अनुभूति और माया सम्बन्धी विवेचन से चमत्कृत होते हैं और समाधि की उच्चावस्था प्राप्त योगियों की शक्तियाँ हमें अभिभूत कर जाती हैं। समग्रता और विविध उपलब्धियों वाले वैदिक मूल्य-आचार के बनिस्बत ऐसी अनुभूतियाँ कितनी वांछनीय और पालनीय है, यह आज सनातनधर्मियों के लिए जीने-मरने का प्रश्न है। हमारा मानना है कि यज्ञ केन्द्रित श्रौत यज्ञ की प्रतिस्थापना में ही सनातनधर्मियों का अभ्युदय और नि:श्रेयस है।

यह जानने के लिए पहले अयोध्या के श्रौत विद्या के महान् आचार्य ब्रह्मचारी विन्ध्येश्वरी प्रसाद शुक्ल जी के जीवन का संक्षिप्त परिचय उपयुक्त होगा। इसके बाद श्रौत यज्ञ परम्परा सम्बन्धी प्रतिपाद्य विषय का विवेचन करेंगे।

उत्तर भारत में श्रौत परम्परा के शीर्षस्थ विद्वान अयोध्या के ब्रह्मचारी विन्ध्येश्वरी प्रसाद शुक्ल जी महाराज का सम्पूर्ण जीवन श्रौत परम्परा के संरक्षण और शिक्षण के लिए समर्पित रहा। लगभग सौ से अधिक की आयु वेद भगवान की सेवा में लगाकर ब्रह्मचारी जी ने संवत् 2079 के आश्विन शुक्ल सप्तमी (2 अक्टूबर 2023 ईसवी) को अयोध्या में देह विसर्जित की। वर्णाश्रम धर्म, शास्त्र आज्ञाओं और शौचाचारादि नियमों का देवदुर्लभ निष्ठा से पालन करने वाले इस ऋषितुल्य महात्मा के आगे वैदिक अग्निहोत्री विद्वान, आस्तिक सम्प्रदायों के सभी महामंडलेश्वर, महन्त, जगद्गुरु दण्डी संन्यासी श्रद्वा से झुके रहते थे। श्रौत यज्ञ परम्परा की सेवा ही उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य था। ब्रह्मचारी जी कर्मकांड के साथ ही मीमांसा, निरुक्त, व्याकरण, ज्योतिष और अन्यान्य शास्त्रों के जीवन्त विश्वकोष ही थे। आप जातिस्मर थे और तीन पूर्व जन्मों से श्रौत परम्परा की सतत् सेवा की स्मृति आपके समक्ष उपस्थित थी, ऐसा बताते है। अद्वितीय त्याग-तितिक्षामय पवित्र जीवन जीने वाले इन महात्मा के जीवन की सबसे लक्षणीय बात थी वैदिक कर्मकांड की उपासना और सेवा। मानो मुक्ति या भुक्ति का उनके लिए कोई आकर्षण ही नहीं था।

वर्तमान देश-काल को एक लम्बे सांकर्य काल का उत्तरार्ध कह सकते हैं। आज हम निर्वाण-अद्वैत सिद्धान्त या निकुंजादि की रसमय लीलाओं के प्रेमानन्द से ही तादात्मय बना पाते हैं। हम उस जीवन की महत्ता को अनुभव करने की क्षमता खो चुके हैं जो दधीचि के समान निष्काम भाव से सर्वस्व त्याग कर श्रौत परम्परा की रक्षा के लिए न्यौछावर है। जबकि जिस श्रौत यज्ञ के संरक्षण और संवर्धन के माध्यम से परमपूज्य ब्रह्मचारी जी महाराज जिस धर्म की रक्षा करते रहे, वही सनातन धर्म का यथार्थ स्वरूप है।

सनातन धर्म के पुनरोद्धार के लिए जिस प्रकार के आदर्श की आवश्यकता है, ब्राह्मण वर्ण के लिए परमपूज्य ब्रह्मचारी जी महाराज का जीवन उसका दृष्टान्त है। उनका जीवन यह भी सिद्ध करता है कि वह जीवनचर्या कैसी होती है जो ब्राह्मण वर्ण को शीर्षस्थ स्थान देती है और वर्णाश्रम धर्म के पुनरोद्धार का दायित्व भी। ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः (ऋग्वेद 10.90.12) में जिस व्यवस्था क्रम का संकेत है, ब्रह्मचारी जी का जीवन आज हमारे लिए उसका मूल प्रारूप ही है। इसी के आधार पर क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों के लिए वर्णधर्मानुरूप आदर्श जीवन बना सकते है। अस्तु अब हम अपने मूल विषय यज्ञ की श्रेष्ठता और अपरिहार्यता पर विचार करेंगे।

श्रेष्ठतम और अपरिहार्य कर्म है यज्ञ

पुरुष सूक्त हमारी पूजा उपासना में विशिष्ट स्थान रखता है। ध्यान, अभिषेक ही नहीं, प्राय: हर पूजा पाठ की मंत्र पुष्पांजलि के समय या पुरुष सूक्त पाठ में हम मंत्र पढ़ते हैं – यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः। तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। ते ह नाकं महिमानः सचन्ते। यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥ ऋग्वेद -10/90/16 लेकिन क्या कभी कोई इसके सही अर्थ या तात्पर्य का विचार भी करते हैं? ऋग्वेद के इस मंत्र का अर्थ है – देवताओं ने (पूर्वोक्त रूप से) यज्ञ के द्वारा यज्ञस्वरूप परमपुरुष का यजन (आराधन) किया। इस यज्ञ से उत्पन्न हुए धर्म के आचरण से देवता महान् महिमावाले होकर उस लोक का सेवन करते हैं, जहाँ प्राचीन साध्य देवता निवास करते हैं।

सनातन उपासना विधि के प्रधान मंत्र और स्तुतियाँ वास्तव में यज्ञ की महिमा का गान है। सृष्टि यज्ञ है। यज्ञ ही प्रथम कर्म भी है। सर्वप्रथम देवों ने यज्ञ कर्म से यज्ञस्वरूप परमात्मा का यजन किया था, इससे श्रेष्ठ और अधिक अनुकरणीय कर्म कोई दूसरा नहीं। सनातन धर्म का सार समस्त सृष्टि की दिव्यता है। इसे लगभग सभी आस्तिक मत-सम्प्रदाय स्वीकार करते हैं। इसी भावना से ओतप्रोत होकर मनुज को शुक्ल यजुर्वेद ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् (ईशावस्योपनिषद् -1) जगत की ईश्वर से परिपूर्णता का और (इसलिए) उसमें त्यागपूर्वक भोग की आज्ञा देता है। सनातन धर्म जिस सनातनीयता का उपलक्षण है, वह तत्वज्ञान पूर्णता और व्यावहारिक रूप में वेद-विहित श्रौत परम्परा में ही अवस्थित है।

प्रकारान्तर से इस भाव को महर्षि वाल्मीकि मानवोचित गुण कृतज्ञता के माध्यम से स्पष्ट करते हुए कहते हैं – कृते च प्रति कर्तव्यम् एष धर्म सनातन:। – (वाल्मीकि रामायण, ५|१|११४) अर्थात् जो उपकार करे, उसका प्रत्युपकार ही सनातन धर्म है।

हमारा जीवन भूत (जीव), मनुष्य, देव, ऋषि, पितृ, के ऋण से बना है। इस ऋण की पूर्ति सनातन धर्म की आधारभूत सोच है। वैदिक चिन्तन में यह ऋणानुबन्ध व्यक्ति को कुल, वर्ण, ग्राम और राष्ट्र के प्रति कर्त्तव्य भावना से जोड़ता है। मानव की दिव्यता की खोज देवत्व के मानवीकरण और अवतार के रूप में सहज में प्रकट होती है।

श्रौत यज्ञ प्रयोग, विधि और उद्देश्य के ज्ञान के अभाव में वर्णाश्रम धर्म रूढ़िवादी सोच और कर्मकांड बेतुके अर्थहीन क्रिया-कलाप एवं दर्शन-ज्ञान बौद्धिक कल्पनाएँ लगती है। सत्य यह है कि यज्ञ में ही धर्म की व्यवहारिकता और प्रयोगिकता दृष्टिगत होती है। 

शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष, छन्द और निरूक्त इन छह वेदांग की प्रासंगिकता और उपादेयता यज्ञकर्म में सिद्ध होती है। यज्ञ ही वेदांग की आत्मा है। यज्ञ के अभाव में वे कोरे निष्प्राण शास्त्र रह जाते हैं। यज्ञ के अभाव में ये क्षुद्र भौतिक उपयोगितावाद में फँस जाते है, जैसे आज ज्योतिष फलित में, छन्द काव्य में, व्याकरण भाषा के शास्त्र के रूप में लोक में रूढ़ हो गया है। यज्ञ कर्म के अभाव में पर्व, उपासना स्थूल भोगों का विषय और उत्सव बनकर रह जाते हैं।

हम स्मृति-नीति शास्त्रों में जिन मूल्यों का चिन्तन पाते हैं, वे इन्ही वैदिक आचार के आलोक में विस्तारित हुए है। प्रजा कौन है? राजा और सम्राट कौन होता है? प्रजारूप मनुष्य, जीव-जन्तु, वनस्पति, जंगल, पर्वत, भूमि, नदी, तालाब, समुद्र आदि के प्रति उसके क्या कर्तव्य हैं? प्रजा के राजा के प्रति क्या कर्त्तव्य है? धर्म के अनुरूप राष्ट्र की नीति कैसी होनी चाहिए? धर्म, समाज के अहितकारी, आततायी या विरोधियों के प्रति क्या दंड देय है? सब एक सुव्यवस्थित चक्र का भाग है, जिसमें जिसमें व्यक्ति, परिवार, कुल, वर्ण, गाँव और राष्ट्र जुड़ते हैं। जिन मूलभूत आचार-विचार से अनुशासित और परिचालित होते हैं, वह एकमात्र वेदों में ही है। स्मृति शास्त्र उसके देश-काल-परिस्थिति के अनुरूप निकाले गए मार्ग हैं। इनमें भी राजनीति, दंडनीति, अर्थनीति या युद्ध नीति के विचार हो या राज्याभिषेक जैसे कर्मकांड, मूलत: वैदिक मूल्यों पर ही चलते रहे हैं। व्यष्टि से समष्टि का तक और पिंड से ब्रह्मांड तक के समग्र विनिमयात्मक सम्बन्ध मात्र वेद में ही उपलब्ध है। वैदिक परम्परा में कर्म का विस्तार और प्राधान्य सहज और नैसर्गिक है।

एक समझने की महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यज्ञ राष्ट्र में सनातन धर्म नीति के अनुरूप पदार्थ और सम्पत्ति का संचरण करता है। यज्ञों में ब्राह्मण के मेधा बल, क्षत्रिय का क्षात्र बल, वैश्य का धन बल, शुद्र के श्रम बल का संयोजन होता है। इसका उदाहरण हमें वैदिक से मध्यकाल के अन्त तक असंख्य आख्यानों में मिलता है, जहाँ नृप और गृहपति आदि यज्ञ कर सम्पूर्ण धन सम्पदा का दान कर देते थे। यज्ञ का व्रत लेने वाला यजमान हर याचक को दान देने के लिए बाध्य होता था। इस स्वयंस्फूर्त नैतिकता से भाग साझा करते हैं। यही नीति है- कर्म करे, त्यागपूर्वक उपभोग करे, उसके बाद भी जो अधिशेष बच जाए, धर्म कर्म के माध्यम से फिर से सृष्टि में संचार कर दिया जाए।

यज्ञ उस त्याग वृत्ति का संवर्धन है जो सृष्टि का मूल स्वभाव है। इसे समझने के लिए हम उदाहरण के रूप में हम मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जीवन को देख सकते हैं। उनके श्रेष्ठ मानवीय गुण, भावनाएँ, वृत्तियाँ आदि रामकथा के माध्यम से हमारे मानस और लोक जीवन का अंग बन गए हैं। वे तो अनुषांगिक है। प्रधान बात यह है कि श्रेष्ठतम शीलादि गुणों के निधान श्रीराम के जीवन में कहीं लेशमात्र भी स्वच्छन्दता दृष्टिगोचर नहीं होती। श्रीराम का सम्पूर्ण जीवन श्रौत यज्ञों के माध्यम से नित्य नैमित्तिक, काम्यादि कर्मों के निष्ठापूर्वक पालन का आदर्श है। उनके जीवन में कोई निजी या व्यक्तिगत विषय दिखता ही नहीं। वनवास गमन, बाली वध, विभीषण शरणागति, आदि। उनके प्रत्येक निर्णय और तदनुसार कर्म एक उदात्ततर धर्म बोध से परिचालित हैं। यही सनातन आदर्श है। रामो विग्रहवान् धर्म: – श्रीराम धर्म के विग्रह हैं और धर्म आधारित कर्म की प्रधानता सनातन संस्कृति का मूल है।

इसे विषयान्तर न समझा जाए, आजकल आम लोगों में सनातन धर्म की एकता को लेकर आशंकाएँ, चिन्तन को लेकर संंशयों की भरमार है। लोकतंत्र में राजनीति भी जनता के ऐसे भय-आशंकाओं से प्रभावित हो रही है। इसीलिए हमारा विनम्र निवेदन है कि इस यज्ञ आधारित वैदिक दृष्टि के बिना सनातन एकता के सन्देश के कोई मायने नहीं। ऐसी सनातन की एकता का कोई प्रारूप और कोई लक्ष्य ही नहीं। जब हम कहते है कि हमारे व्यवहार और जीवन में वैदिक सनातन धर्म आज लुप्त हो रहा है, तब हमारा तात्पर्य क्या होता है? कुछ प्रधान लक्षणों से इसके संकेत मिलते हैंं। जैसे- भारतवर्ष में आहिताग्नि-अग्निहोत्री ब्राह्मणों की संख्या तीन सौ के लगभग है। वेदपाठी ब्राह्मणों की संख्या पांच अंक से ऊपर नहीं होगी। वेदों को जीवन में धारण करने वाले संध्या, अग्निहोत्र और श्रौत याग करने वाले ब्राह्मणों का दर्शन तो विरल ही है। वेदपाठी, श्रौत याग विधान के यथार्थ आचार्य महापुरुष के दर्शन दूर की बात है। उनके सम्बन्ध में जानने वाले, उनका स्मरण करने वाले भी दुर्लभ है। जबिक इनके अभाव से वैदिक तत्वज्ञान को समझना सम्भव नहीं है।

वर्णाश्रम धर्म के अनुरूप जीने वाले क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण के महाजन आज लुप्तप्राय: हैं। चार आश्रमों में जीवनयापन करने वालों की संख्या भी हजारों से अधिक शायद ही होगी। वर्तमान स्थिति में हम निर्वर्ण, निराश्रमी, अर्धपुरुषार्थी हैं। चार पुरुषार्थों में धर्म और मोक्ष तो प्रकट में लुप्तप्राय: हैं। सच यह है कि काम और मोक्ष और हमारे मूल वैचारिक प्रस्थान नाममात्र ही बचे है। उनको लेकर हमारी समझ विदेशी प्रभावों से अपमिश्रित और भ्रान्त हो गई है। वहीं काल के प्रभाव से सनातन वैदिक परम्परा प्रणीत मानव जीवन का लक्ष्य पुरुषार्थ चातुष्ट्य (धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष) और उसका पोषक वर्णाश्रम धर्म राज्य द्वारा तिरस्कृत और निन्दित है। नास्तिक और अवान्तर मतवादी या वेद को ही प्रधान मानने वाले नव्य सम्प्रदाय भी श्रौत परम्परा का ज्ञान न होने से और अधिक गहन अन्धकार में भटक रहे हैं। इन्हीं तमाम कारणों से श्रौत परम्परा अपरिहार्य हो जाती है।

अभी के लिए इतना ही, श्रौत यज्ञ पर कुछ और विस्तार से हम अब अगले भाग में देखेंगे। 

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(नोट : सनातन धर्म, संस्कृति और परम्परा पर समीर यह पहली श्रृंखला लेकर आए हैं। पाँच कड़ियों की यह श्रृंखला है। एक-एक कड़ी हर शनिवार को प्रकाशित होगी। #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना के समय से ही जुड़े सुधी-सदस्यों में से एक हैं समीर। भोपाल, मध्य प्रदेश में नौकरी करते हैं। उज्जैन के रहने वाले हैं। पढ़ने, लिखने में स्वाभाविक रुचि रखते हैं। वैचारिक लेखों के साथ कभी-कभी उतनी ही विचारशील कविताएँ, व्यंग्य आदि भी लिखते हैं। डायरी के पन्नों पर लगातार उपस्थिति दर्ज़ कराते हैं।) 

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इस श्रृंखला की पिछड़ी कड़ियाँ 

2 – सनातन धर्म क्या है?
1 – सम्पदायों के भीड़तंत्र में आख़िर सनातन कहाँ है? 

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