अभिलाष खांडेकर, भोपाल, मध्य प्रदेश
मध्य प्रदेश और राजस्थान में हुई 22 मासूम बच्चों की मौतों ने एक बार फिर यह उजागर किया है कि भारत में गरीब परिवार कितने असुरक्षित हैं और भ्रष्ट अधिकारियों व राजनेताओं के नेतृत्त्व में हमारी स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली किस हद तक सड़ चुकी है। नियामक तंत्र का अभाव, दवाओं की गुणवत्ता की निगरानी न होना, ईमानदार पेशेवरों की कमी, आधिकारिक प्रणाली में लापरवाही, और निश्चित रूप से हर स्तर पर भ्रष्टाचार – इन सबने मिलकर बच्चों की जान ली है।
कोविड-19 महामारी के दौरान भारत को अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जिसने स्वास्थ्य क्षेत्र की गम्भीर कमियों को उजागर किया। कोविड ने कई विकसित और विकासशील देशों को समान रूप से प्रभावित किया, लेकिन चूँकि भारत पर जनसंख्या का भारी बोझ था और मूलभूत उपचार के लिए आवश्यक बुनियादी ढाँचे का अभाव था, इसलिए यहाँ इसकी गम्भीरता कहीं अधिक महसूस की गई।
यद्यपि आज पाँच साल बाद भी स्वास्थ्य क्षेत्र में चुनौतियाँ बरकरार हैं, जिनमें प्रशिक्षित डॉक्टरों की कमी से लेकर खराब तरीके से संचालित प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों, लालची निजी अस्पतालों की श्रृंखला और सभी प्रकार के घोटाले शामिल हैं। मध्य प्रदेश में नागपुर के पास छिंदवाड़ा में अत्यधिक दूषित कफ सिरप (कोल्ड्रिफ) के कारण बच्चों की चौंकाने वाली मौतें भारत में कहीं भी हो सकती थीं, लेकिन निश्चित रूप से उन्हें टाला जा सकता था।
मध्य प्रदेश, जो पहले से ही व्यापमं (व्यावसायिक परीक्षा मण्डल) की अनियमितताओं और उसके बाद भयावह नर्सिंग कॉलेज घोटाले के अमिट धब्बों से जूझ रहा है, ‘बीमारू’ की जकड़ से बाहर निकलने का दावा कर रहा है। हालाँकि यह ‘तमगा’ मध्य प्रदेश के पिछड़ेपन की गहरी झलक भी देता है। स्कूली शिक्षा का स्तर, ग्रामीण/शहरी सड़कों की स्थिति, आदिवासी क्षेत्रों की स्थिति, बच्चों के प्रति अपराध और स्वास्थ्य विभाग की पूरी तरह भ्रष्ट व्यवस्था से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि मध्य प्रदेश एक गम्भीर रूप से ‘बीमारू’ राज्य अब भी बना हुआ है।
छिंदवाड़ा में एक शोकाकुल माता-पिता ने सोचा कि इन दिल दहला देने वाली मौतों के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार लोगों के घरों पर बुलडोजर क्यों नहीं चला दिए जाते? लेकिन भाजपा शासन ऐसा है कि डॉक्टर मोहन यादव के कारण केवल कुछ ही तबादले प्रभावित हुए हैं। ‘पसन्दीदा’ नौकरशाह स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख बने हुए हैं। जिनके खिलाफ भोपाल के डॉक्टर खुलेआम शिकायत कर रहे हैं, उन पर संदिग्ध साख वाले आपूर्तिकर्ताओं को खुलेआम फायदा पहुँचाने का आरोप है। मध्य प्रदेश में स्थानीय चिकित्सा उपकरण और दवा आपूर्तिकर्ताओं की मदद के लिए निविदा शर्तों में बदलाव किया जा रहा है। हाल ही में सीडीएससीओ (केन्द्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन) द्वारा मध्य प्रदेश में बिक रहीं 76 प्रकार की दवाओं को घटिया पाया गया है।
यह जानलेवा सिरप तमिलनाडु की एक खराब रखरखाव वाली फैक्ट्री में बनाया जा रहा था, और इसका वितरण पूरे भारत में हो रहा था। लेकिन किसी ने भी इसके घटकों की जाँच करने की जहमत नहीं उठाई। मुझे दूसरे राज्यों की तो कोई जानकारी नहीं है, लेकिन इतना जरूर जानता हूँ कि पिछले कई सालों से मध्य प्रदेश का स्वास्थ्य विभाग दागी अधिकारियों के हाथ में रहा है, जिनकी संपत्ति बेतहाशा बढ़ी, जबकि मध्य प्रदेश का ‘स्वास्थ्य’ बिगड़ता गया। इस विभाग में ऊपर से नीचे तक-अपर मुख्य सचिव/प्रमुख सचिव या आयुक्त (स्वास्थ्य सेवाएँ) से लेकर जिला प्रमुख, मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमएचओ) या औषधि नियंत्रक और निरीक्षकों तक की नियुक्तियाँ पैसा उगलने वाली मानी जाती हैं। हर स्तर पर मिलने वाली रिश्वत ऊपर तक जाती है।
ऐसे में, दो स्थितियाँ उभरी हैं। पहली- ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएँ चरमरा गई हैं और शहरों में आलीशान निजी अस्पतालों की भरमार हो गई है। ग्रामीण इलाकों में गरीब और अशिक्षित लोग अकुशल व्यवस्था से जूझ रहे हैं। जबकि शहरों में आलीशान अस्पताल मरीजों को लूट रहे हैं। दूसरी- आयुष्मान योजना, कई अन्य योजनाओं की तरह, जिनकी घोषणा बड़े जोर-शोर से की गई थी (स्मार्ट सिटी को याद कीजिए), उन्हें लागू करने वाले अधिकारियों के कारण एक आपदा साबित हुई है।
कठोर सच्चाई यह है कि पूरे देश में ही किसी भी ऐसी व्यवस्था का अभाव है, जो ‘मतदाता’ को किफायती दरों पर सर्वोत्तम चिकित्सा सुविधाओं की गारंटी दे सके। आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने भी स्वास्थ्य सेवाओं के आम आदमी की पहुँच से बाहर हो जाने की बात कही है। लेकिन दुख की बात है कि उन्होंने इस क्षेत्र में व्याप्त व्यापक भ्रष्टाचार के बारे में कुछ भी नहीं कहा, जिसने आम आदमी को प्रभावित किया है। छिंदवाड़ा की घटना ने उस त्रासद स्थिति को रेखांकित किया है, जिसमें भारत के तथाकथित ‘अमृत काल’ में आम भारतीय परिवार जीने को मजबूर हैं।
क्या किसी को जवाबदेह नहीं होना चाहिए, जब इतने सारे मासूम बिना किसी गलती के मर रहे हों? क्या होता अगर किसी बड़े राजनेता या शीर्ष नौकरशाह को भी ऐसी त्रासदी का सामना करना पड़ता? हाल ही में, एक केंद्रीय मंत्री को सोशल मीडिया पर सुदूर राजस्थान में मुफ्त घर-घर स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने वाली ग्रामीण मोबाइल चिकित्सा इकाइयों का शुभारम्भ करते देखा गया। यह स्पष्ट संकेत है कि अभी तक ज्यादातर जगहों पर चिकित्सा सेवाएँ नहीं पहुँच पाई हैं। मोबाइल चिकित्सा इकाई योजना की देखरेख राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) करता है, जो कई जगहों पर निजी आपूर्तिकर्ताओं और दागी अधिकारियों के चंगुल में है।
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(नोट : अभिलाष जी मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। दैनिक भास्कर जैसे देश के शीर्ष अखबारों में सम्पादक रह चुके हैं। उनका यह लेख मेल के जरिए #अपनीडिजिटलडायरी तक पहुँचा है और उनकी सहमति से ही प्रकाशित किया गया है।)
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