टीम डायरी
उत्तर प्रदेश की घटना है। इसी रविवार, 15 जून की। हरदोई क़स्बे की है। सीएनजी (सम्पीड़ित या कम्प्रेस्ड प्राकृतिक गैस) से संचालित एक निजी वाहन रास्ते में गैस डलवाने के लिए एक ईंधन स्टेशन पर रुकता है। वहाँ का कर्मचारी नियमों का पालन करते हुए वाहन सवार लोगों से आग्रह करता है कि वे अपनी कार से उतर जाएँ। सुरक्षा के लिहाज़ से वाहनों में गैस भरते समय ऐसा करना ज़रूरी होता है।
लेकिन इसी बात पर वाहन सवार लोग उस कर्मचारी से बहस करने लग जाते हैं। बहस बढ़ती है और गर्मी-गर्मी में कार सवारों में शामिल एक लड़की अपने वाहन से लाइसेंसी रिवॉल्वर उठा लाती है। उसे ईंधन स्टेशन के कर्मचारी के सीने पर तानकर कहती है, “इतनी गोलियाँ मारूंगी कि तेरे घर वाले भी पहचान नहीं पाएँगे।” वह तो गनीमत रही कि बीच-बचाव करने वालों ने मामला शान्त कर दिया। लड़की का नाम है अरीबा खान। पुलिस ने उसके ख़िलाफ़ मामला दर्ज़ कर लिया है। उसकी रिवॉल्वर भी ज़ब्त कर ली है।
एक अन्य मामला, बेंगलुरू का। बीते शुक्रवार, 13 जून का है। वहाँ एक लड़की दफ़्तर जाने के लिए रैपीडो टैक्सी (स्कूटर) बुलवाती है। एक लड़का उसे लेने आता है। उसके साथ वह घर से निकलते ही बेहूदगी से बात करने लगती है। लड़के को अंग्रेजी अच्छी तरह नहीं आती, इसलिए वह उस पर तंज कसती है। इसी बीच, लड़का उसे छोटे रास्ते से उसके दफ़्तर के क़रीब तक ले जाता है। वहाँ से महज़ 100-150 मीटर पहले सड़क पर कोई व्यवधान है। इसलिए वह लड़की को वहाँ से पैदल दफ़्तर तक चले जाने के लिए कहता है।
इसी बात लड़की भड़क जाती है। वह उस रैपिडो ड्राइवर को और ज़लील करती है। उसे दो बार झापड़ भी मार देती है। आख़िर में लड़के का सब्र भी ज़वाब दे जाता है। वह भी लड़की को झापड़ मारकर गिरा देता है। साथ ही कन्नड़ भाषा में उससे कहता है, “जाओ अपने देश (गृह प्रदेश के लिए) जाओ।” इस घटना को मीडिया पहले भाषा सम्बन्धी विवाद का रंग देता है, लेकिन जैसे ही पता चलता है कि ग़लती अस्ल में लड़की की है, तो मामला ठंडा पड़ जाता है। बेंगलुरू में ही ऐसा एक और मामला सामने आया था। तब एक ऑटो चालक को बिहार की एक लड़की ने चप्पल से पीट दिया था। हालाँकि बाद में उसे थाने में ऑटो वाले के पैर छूकर माफ़ी माँगनी पड़ी थी।
लड़कियों या महिलाओं द्वारा इस तरह के हिंसक और आक्रामक व्यवहार (सुरक्षा के नहीं बल्कि अपनी ठसक में की जाने वाली हिंसा या आक्रामकता) के मामले आजकल आम हो गए हैं। घरों के भीतर हो या बाहर। रिश्ते-नातों में हो या अन्य लोगों के साथ। हर कहीं, इस तरह के मामले सामने आ रहे हैँ। इन्दौर में सोनम और राजा रघुवंशी का मामला पूरे देश में सुर्ख़ियों में बना हुआ है। इन दोनों की शादी हुई थी। लेकिन शादी के चन्द दिनाें के भीतर ही सोनम ने अपने प्रेमी के लिए नवविवाहित पति की हत्या करा दी। वह भी मेघालय ले जाकर।
उत्तर प्रदेश के मेरठ में भी मुस्कान रस्तोगी ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति सौरभ की न सिर्फ़ हत्या की। बल्कि, उसकी लाश को टुकड़ों में काटकर ड्रम में भर दिया था। इसी तरह, बेंगलुरू में नौकरी करने वाले अतुल सुभाष की आत्महत्या का मामला भी पूरे देश में चर्चित रहा था। उनकी पत्नी निकिता सिंघानिया ने उन्हें इतना प्रताड़ित किया था कि वे आत्महत्या के लिए मज़बूर हो गए। ऐसी और भी घटनाएँ हो चुकी है।
इन घटनाओं के मद्देनज़र प्रश्न उठने लगा है कि महिलाओं में पनप रहे इस हिंसक, आक्रामक व्यवहार की वज़ह क्या है? क्या कहीं देश में महिला सशक्तिकरण जैसे अभियान तो ग़लत दिशा में नहीं मुड़ चुके हैं? ऐसे प्रश्नों का तार्किक आधार है, उदाहरण हैं। जैसे कि मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में मार्च के महीने में एक कार्यकम आयोजित हुआ था। महिला सशक्तिकरण और लैंगिक समानता जैसे मुद्दों पर कार्यक्रम था। उसका नारा था, ‘लड़की तू लड़ाका है, लड़ लेगी।’ यहाँ कोई कह सकता है कि भाई, इस नारे में क्या बुराई है?
ठीक है, तो दूसरी मिसाल लीजिए। इसी मार्च के महीने में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी-शरद पवार (एनसीपी-एसपी) की एक महिला पदाधिकारी रोहिणी खड़से ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को एक पत्र लिखा। उसमें उन्होंने माँग की कि महिलाओं को कम से ‘एक व्यक्ति की हत्या करने की छूट मिलनी चाहिए’। ताकि वे अपने पर अत्याचार करने वाले या बलात्कार करने वाले या ऐसी हरक़त करने वाले को तुरन्त सबक सिखा सकें।
सुनने में रोहिणी की बात एक लिहाज़ से सही लग सकती है। लेकिन क्या ऐसा नहीं लगता कि इसी तरह के उक़सावे वाली बातें और अभियान, आदि महिलाओं को आक्रामकता और हिंसा की तरफ़ धकेल रहे हैं? वह भी तब जबकि वे आजकल आर्थिक रूप से भी पूरी तरह स्वतंत्र हैं, आत्मनिर्भर हैं? शैक्षिक स्तर पर भी वे किसी से पीछे नहीं हैं? परिवार तथा समाज में भी उन्हें अब अधिक मान्यता, अधिक स्वनिर्भरता हासिल है? तो क्या उन्हें ऐसे में अधिक ज़िम्मेदारी भरा व्यवहार करने की ओर प्रेरित तथा प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए? या फिर किसी की हत्या के लिए उकसाना चाहिए या किसी को आत्महत्या को मज़बूर करने के लिए समर्थन देना चाहिए?
अपनी सुरक्षा के लिए लड़ना तो बहुत अच्छी बात है। वह तो होना भी चाहिए। मगर अपने अधिकारों, अपनी आज़ादी का दुरुपयोग? यह कैसे सही है? ऐसा दुरुपयोग अगर पुरुषों के लिहाज़ से अनुचित माना जाता है, जो है भी, तो महिलाओं के लिहाज़ से भी अनुचित ही हुआ न? समाज शास्त्रियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं को इस विषय पर गम्भीरता से सोचना चाहिए। नहीं तो, महिलाओं की आक्रामकता के मामले जो अभी गिनी-चुनी संख्या में सामने आ रहे हैं, वे बड़ी तादाद में दिखाई देने लगेंगे। और उनके दुष्परिणाम परिवारों तथा समाज में दिखेंगे।
