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मृच्छकटिकम्-4 : धरोहर व्यक्ति के हाथों में रखी जाती है न कि घर में

‘चारुदत्त’ को ‘मैत्रेय’ बताता है, “शकार बलात् वसंतसेना का पीछा करते हुए यहाँ आया था। और वह न्यायालय में वाद दायर करने की बात कहते…

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मृच्छकटिकम्-3 : स्त्री के हृदय में प्रेम नहीं तो उसे नहीं पाया जा सकता

पूजा पूरी करने के बाद ‘चारुदत्त’ फिर से मातृदेवियो को बलि देने जाने के लिए ‘मैत्रेय’ को आदेश देता है। लेकिन ‘मैत्रेय’ के मना कर…

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मृच्छकटिकम्-2 : व्यक्ति के गुण अनुराग के कारण होते हैं, बलात् आप किसी का प्रेम नहीं पा सकते

‘मैत्रेय’ का प्रश्न ‘चारुदत्त’ के सामने यथावत् है, ‘मरण और निर्धनता में तुम्हें क्या अच्छा लगेगा?’ गहरी श्वांस लेकर ‘चारुदत्त’ उत्तर देता है, “निर्धनता और…

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