गुरुदेव कहते हैं, ‘एकला चलो रे’ और मैं एकला चलता रहा, चलता रहा…

पानी नीला था, पानी नदी में था। नदी धरती पर थी, धरती पर पेड़ थे। पर पेड़ हरे-भरे थे। धरती के ऊपर एक आसमान था।…

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एक कहानी ; उम्मीद के दीए की…

  वक़्त मुश्किल है। एक अदृश्य दुश्मन (कोरोना) है, जिसने मानवता के ख़िलाफ़ जंग छेड़ रखी है। हमारे घरों में घुसकर हमारे अपनों को वह…

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यह वैश्विक महामारी कोरोना हमें किस ‘दर्शन’ से साक्षात् करा रही है?

अभी  22 अप्रैल को ‘पृथ्वी दिवस’ था। यह पहला अवसर है, जब पूरी दुनिया के ‘मानव’ एक ही समय में एक जैसी महामारी से पीड़ित है।…

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“हम बताते हैं”… एक अघोषित नकारात्मक वाक्य में छुपी सकारात्मकता

बात तो पुरानी है, लेकिन आजकल फिर से यही वाक्य सुनने को मिल रहा है तो याद आ गई। और मैं डायरी के पन्ने पर…

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महामारी की मारः किसकी ज़िम्मेदारी, कौन तय करे?

कल दीपक शर्मा जी की 23 तारीख की डायरी पढ़ी। निश्चित रूप से वाराणसी की घटना समेत पूरे देश की समस्या दुखद है। किन्तु इसके…

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स्मृतियों के धागे से वक़्त को पकड़ता हूँ, ताकि पिंजर से आत्मा के निकलने का नाद गूँजे

यह भी शुरुआत ही है। लगता है कि सब कुछ ख़त्म हो गया है। जीवन कुल चार मकानों के इर्द-गिर्द समेट कर रख लिया है…

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हे राम! अब यूँ करो-ना, नहीं सहा जाता तेरे राज्य में

डायरी के इस पन्ने पर पड़ी तारीख अपने आप में सारी कहानी कहती है। यह ऐसी तारीख है, जब देश में कोरोना के मामले पहली बार…

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आज मैं मुआफ़ी माँगने पलटकर पीछे आया हूँ, मुझे मुआफ़ कर दो

कहानियाँ रास्तों में बिखरी पड़ी थीं। कविताएँ पेड़ों पर लदी रहती थीं। धूल के हर कण में चलते-फिरते चरित्र नज़र आते थे। उसे लगता कि…

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मेट्रोनामाः इस क्रूरतम समय में एक सुन्दरतम घटना

रोज़ाना की तुलना में आज मेट्रो सूनी है। इतना सूनापन डराता है। हालाँकि आज दिल्ली में कर्फ्यू है। लेकिन ज़िन्दगी तो चल ही रही है। कुछ…

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‘द बिग बुल’ के बहाने, हेमन्त शाहों को पहचानें, जो हमारे सपनों का मोल-भाव कर रहे हैं

‘द बिग बुल’ अभिषेक बच्चन की फिल्म है। उन्होंने इसमें अपनी अभिनय क्षमता को खरा सोना साबित करने के लिए जी-तोड़ मेहनत की है। हालाँकि फिल्म…

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