आरएसएस के 100 वर्ष : नेहरू जी ने संघ को खत्म करने की घोषणा की थी!

अनुज राज पाठक, दिल्ली

हमेशा समय पर और अनुशासनबद्ध कार्य करने वाले महात्मा गाँधी जी 30 जनवरी 1948 को बिरला भवन में शाम को होने वाली अपनी नियमित प्रार्थना सभा में देर से पहुँचे थे। गाँधी जी कुछ परेशान और नाराज थे क्योंकि उनको सरदार पटेल से गरमागरम बहस करने के कारण पहुँचने में देर हुई थी। यह बहस नेहरू जी द्वारा तैयार किसी मसौदे पर थी, जिसकी प्रतियाँ गांधी जी और पटेल जी को ही पढ़ने को दी गई थीं।

हृदय से आहत गाँधी जी पर उसी शाम 5 बजकर 17 मिनट पर नाथूराम गोडसे ने गोलियाँ चला दीं। घटनास्थल पर ही गाँधी जी की साँसें थम गईं। देश ने एक लोकप्रिय नेता खो दिया। नेहरू जी से पिता सदृश व्यक्ति हमेशा के लिए दूर हो गया। जब गाँधी जी की हत्या हुई, तब नेहरू जी कार्यालय में कार्य कर रहे थे। सूचना मिलते ही वह कलकत्ता के बिड़ला भवन पहुँचे। वहाँ से राष्ट्र को सूचना देने हेतु आकाशवाणी पहुँचे और भावुक तथा वेदनापूर्ण सन्देश जनता को दिया। उसका पहला वाक्य था, “हमारे जीवन का प्रकाश बुझ गया।”

इस दुःखद हत्याकाण्ड के बाद भारतीय समाज में बहुत सी घटनाएँ एकदम घटित हो गई। इनमें थी, महाराष्ट्र में गाँधीवादी अहिंसक लोगों द्वारा निर्दोष चितपावन ब्राह्मणों का सामूहिक जनसंहार। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर भी गाँधी जी हत्या का आरोप लगा। सरकार ने संघ पर कार्रवाई की और एक से चार फरवरी तक संघ के लगभग 20,000 नेता तथा स्वयंसेवक गिरफ्तार किए गए। इसके बाद चार फरवरी 1948 को सरकार ने संघ को प्रतिबन्धित कर दिया स्वतंत्रता के पश्चात् संघ और यह पहला प्रतिबन्ध था। यह मात्र संयोग था कि गाँधी हत्या से कुछ समय पूर्व ही नेहरू जी ने अमृतसर में दिए भाषण में संघ को खत्म करने की घोषणा की थी। संयोग से गाँधी जी हत्या ने वह अवसर उपस्थित कर दिया। कांग्रेस शुरू से संघ को अपने लिए खतरा मानती रही।

ब्रिटिश सरकार भी संघ को कांग्रेस के बाद भारत का सबसे बड़ा संगठन मानती थी। सन् 1940 की सरकार की एक रिपोर्ट कहती है, “कांग्रेस एवं इससे सम्बद्ध स्वयंसेवी संस्थाओं के बाद संघ भारत का सबसे बड़ा तथा कुशल स्वयंसेवी संगठन है। संख्या एवं महत्त्व के आधार पर कांग्रेस के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्थान है।” ऐसे में कांग्रेस की संघ से प्रतिद्वन्दिता अनिवार्य ही थी, जो हमेशा बनी रही। वास्तव में संघ पर प्रतिबन्ध और स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी नहीं हुई थी, बल्कि दोनों का ‘शिकार’ हुआ था। इस बारे में श्री बी. बैनर्जी लिखते हैं, “महात्मा गाँधी की हत्या के पश्चात् चार फरवरी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबन्ध लगाया गया। फिर तत्काल पूरे देश में संघ के स्वयंसेवकों का ‘शिकार’ शुरू हुआ। श्ह ‘शिकार’ मेरा गढ़ा हुआ शब्द नहीं है, बल्कि अत्यन्त सम्मानित एक कांग्रेसी समाचार पत्र द्वारा काम में लाया गया शब्द है।”

कांग्रेस से सभी बड़े-छोटे नेता संघ को नष्ट करना चाहते थे। दिल्ली में 17 जुलाई 1948 को मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन के दौरान एक मत से संघ को सदा के लिए समाप्त करने पर विचार हुआ। एक तत्कालीन रिपोर्ट में यहाँ तक कहा गया, “केवल प्रतिबन्ध से काम नहीं चलेगा। हमें उससे भी कड़े कदम उठाना चाहिए।” आश्चर्य कि एक लोकप्रिय संगठन जो सामाजिक सेवा में लगा था, निरन्तर हिन्दुओं को सशक्त बनाने के कार्य कर रहा था। समाज में संघ अपनी भूमिका से विशेष स्थान बना रहा था, उसे कांग्रेस नष्ट करना चाह रही थी। 

तो, संघ के प्रभाव को नष्ट करने का अवसर कांग्रेस को सहज प्राप्त हो गया। कांग्रेस की इसी सोच के कारण सरदार पटेल जी भी बार-बार संघ के कांग्रेस में विलय की बात दोहराते रहे। पटेल जी ने पाँच दिसम्बर को ग्वालियर में कहा भी था, “हमने उन्हें कांग्रेस में सम्मिलित हो जाने की सलाह देकर उनका ह्रदयपरिवर्तन करने का प्रयास किया। लेकिन उन्होंने शक्ति आजमाने तथा देशद्रोह का मार्ग अपनाया।” मतलब, अगर संघ का कांग्रेस में विलय नहीं होता, तो वह देशद्रोही! यही बात श्री नेहरू जी ने 20 दिसम्बर के भाषण में दोहराई, “हम अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगाकर आन्दोलन को दबा देगें।” असल में संघ ने प्रतिबन्ध हटवाने के लिए सत्याग्रह का मार्ग चुना था, जिसे देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री बलप्रयोग से कुचलने की बात कर रह थे।

वहीं, श्री जयप्रकाश नारायण ने कहा था, “मैं संघ पर गाँधी की हत्या का आरोप करना नहीं चाहता। संघ के स्वयंसेवकों की अनुशासनप्रियता, चारित्र्य, दृढता तथा प्रेम सचमुच प्रशंसनीय है। संघ ने समाज के लिए पर्याप्त ठोस काम किया है। इसीलिए वह अब तक टिका है। कानून से हम उसे खत्म नहीं कर सकेंगे।” ऐसे ही, मराठी साप्ताहिक सुदर्शन (25- 9- 1948) के अनुसार- सरदार भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह जी ने भी नेहरू को लिखे पत्र में कहा था, “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गाँधी जी की हत्या में तनिक भी सम्बन्ध नहीं है। संघ ने अगणित देशभक्त निर्माण किए। देश के सर्वाधिक वृहद् संगठन पर लादे गए ऐसे सभी निराधार आरोप वापिस लिए जाने चाहिए। यह संगठन वास्तव में, राष्ट्र की सच्ची सम्पत्ति है।”

इस आन्दोलन और समर्थन का परिणाम यह हुआ कि संघ तथा सरकार के बीच समझौता कराने के लिए कई लोग आगे आए। अन्ततः 12 जुलाई 1949 को संघ पर लगे प्रतिबन्ध वापस ले लिए गए। संघ ने अगले ही दिन से अपने नियमित कार्यों पुनः उत्साह से प्रारम्भ कर दिए। यह संघ की नैतिक निर्णायक जीत भी थी। संघ पुनः और मजबूती से खड़ा हुआ। इसके परिमाण स्वरूप ही संघ के स्वयंसेवकों ने जनसंघ के नाम से राजनैतिक क्षेत्र में राजनैतिक पार्टी बनाकर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज की। हाँ, संघ ने स्वयं राजनैतिक गतिविधियों को प्रारम्भ नहीं किया, अपितु राष्ट्र निर्माण या कहें कि सामाजिक कार्य में ही अपने आप को सीमित रखा। 

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(नोट : अनुज राज पाठक दिल्ली में संस्कृत विषय के शिक्षक हैं। #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सदस्यों में शामिल हैं। अच्छे लेख और कविताएँ लिखते हैं। कभी-कभी श्रृंखलाबद्ध लेखन भी करते हैं।) 

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श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ

4 – आरएसएस के 100 वर्ष : संघ अपनी पद्धति पर डटा रहा, उसकी गतिविधियाँ भी चलती रहीं 
3 – आरएसएस के 100 वर्ष : मात्र चार के अन्तराल में ही कांग्रेस संघ को प्रतिद्वन्द्वी मानने लगी थी!
2 – आरएसएस के 100 वर्ष : देखिए, हेडगेवार का कथन अक्षरशः: सत्य भी सिद्ध हुआ!
1- आरएसएस के 100 वर्ष : यह नहीं कह सकते कि जो कांग्रेस में नहीं था, वह देशभक्त नहीं था!

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