सोनम वाँगचुक और ‘थ्री इडियट’ के फुनसुक वाँगड़ू (आमिर खान)।
अनुज राज पाठक, दिल्ली
शिक्षा प्रणाली में मूलभूत सुधार और केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की माँग के साथ लद्दाख के सामाजिक, शैक्षिक और पर्यवारण कार्यकर्ता सोनम वाँगचुक दिल्ली में भूख हड़ताल कर रहे हैं। उनकी उम्र 59 साल है और उन्हें भूख हड़ताल करते हुए 20 दिन हो चुके हैं। उनका स्वास्थ्य लगातार बिगड़ रहा है, लेकिन अब तक सरकार ने उनकी माँगों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। दूसरी तरफ एक वर्ग है, जो किसी विशेष मकसद से सोनम वाँगचुक के बारे में यह प्रचारित कर रहा है कि फिल्म ‘थ्री इडियट’ के मुख्य किरदार फुनसुक वाँगड़ू असल जिन्दगी में सोनम ही हैं। कहा यह भी जा रहा है कि फिल्म उन्हीं के जीवन पर आधारित है। जबकि यह झूठ है।
खुद सोनम वाँगचुक स्पष्ट कह चुके हैं कि साल 2009 में आई ‘थ्री इडियट’ फिल्म उनके जीवन पर आधारित नहीं है। हाँ, इसके कुछ दृश्य जरूर लद्दाख में स्थित उनके उस विद्यालय में फिल्माए गए हैं, जिसे वह संचालित करते हैं। फिल्म में फुनसुक वाँगड़ू का मुख्य किरदार निभाने वाले अभिनेता आमिर खान ने भी स्पष्ट कर दिया है कि फिल्मी कहानी सोनम वाँगचुक के जीवन पर आधारित नहीं है। यहाँ तक कि ‘थ्री इडियट’ को निर्देशित करने वाले राजकुमार हिरानी भी साफ तौर पर बता चुके हैं कि इस फिल्म की पटकथा वास्तव में एक ऐसे व्यक्ति के जीवन पर आधारित है, जो फिल्म निर्माण में अपना भविष्य बनाना चाहता था। लेकिन उसे प्रतिष्ठित- भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान में प्रवेश नहीं दिया गया था। हालाँकि, उन्होंने उस व्यक्ति का नाम नहीं बताया।
इसके बावजूद सोनम वाँगचुक को फुनसुक वाँगड़ू के तौर पर प्रचारित करने की पुरजोर कोशिशें हो रही हैं? आखिर क्यों? इसके जवाब के लिए सोनम वाँगचुक के जीवन की वास्तविक पृष्ठभूमि देखना जरूरी हो जाता है। फिल्म में जिस तरह दिखाया गया फुनसुक वाँगड़ू एक गरीब घर का लड़का है। अभियांत्रिकी की पढ़ाई से उसे बेहद लगाव है। इसके लिए वह एक पैसे वाले व्यक्ति (रणछोड़दास चाँचड़ उर्फ रैंचो) के लिए, उसी के नाम पर (रैंचो के पिता से मिली वित्तीय मदद से नकली छात्र के रूप में) एक बड़े संस्थान में दाखिला ले लेता है। वहाँ पढ़ाई में हमेशा अव्वल आता है, लेकिन अपनी उपाधि रणछोड़दास को सौंपकर (क्योंकि उसी के नाम से पढ़ाई की थी) अंत में अपने घर ‘लद्दाख’ चला जाता है। वहाँ लगातार नवाचार करता है। इसके लिए उसे 400 के करीब पेटेन्ट मिल जाते हैं। अभिनव प्रयोग करते हुए वह एक अनोखा विद्यालय भी खोल लेता है। इस तरह उसका दुनिया में नाम होता है।
जबकि असरल जिन्दगी में सोनम वाँगचुक के जीवन की ऐसी (फुनसुक की तरह) कतई नहीं है। वह लद्दाख के एक पूर्व राजनेता के पुत्र हैं। उनके पिता सोनम वाँग्याल 1972 के आस-पास लद्दाख से कांग्रेस के नेता रहे। आगे चलकर वह विधायक बने और 1975 की जम्मू-कश्मीर (तब लद्दाख इस राज्य का हिस्सा था) सरकार में मंत्री बनाए गए। हालाँकि गौर करने लायक यह भी है कि 1984 में सोनम वाँग्याल ने कांग्रेस की ही केन्द्र सरकार के विरुद्ध भूख हड़ताल की थी। वह लद्दाख को जनजातीय राज्य का दर्जा देने की माँग कर रहे थे। बताते हैं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी तब सोनम वाँग्यल की भूख हड़ताल तुड़वाने के लिए खुद लेह गई थीं। और अब खबर है कि इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए सम्भवत: कुछेक दिनों में कांग्रेस की शीर्ष नेता सोनिया गाँधी भी सोनम वाँगचुक से मिल सकती हैं। उनसे भूख हड़ताल तोड़ने का आग्रह कर सकती हैं। तो एक अहम पहलू यह हुआ।
दूसरा, सोनम वाँगचुक को उनके नवाचारों के लिए 400 क्या 40 पेटेन्ट भी मिले हों, ऐसा भी नहीं है। हाँ, उन्होंने नवाचार जरूर किए हैं। जैसे- कृत्रिम ग्लेशियर बना देना, पहाड़ों पर सौर ऊर्जा से गर्म रहने वाली इमारतों का बना देना, भारतीय सेना के लिए बर्फीले इलाकों में भी अंदर से गर्म रहने वाले तम्बू बना देना, आदि। अभी कुछ समय पहले जब वह जेल में थे, तो वहाँ बैरकों को ठण्डा कैसे रखा जाए, इसका भी उन्होंने खाका बनाया था, ऐसा बताया जाता है। इस सबका पूरा श्रेय उन्हें जाता है। लेकिन यहीं फिर एक दूसरा तथ्य भी कि उन्होंने जो हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव लर्निंग (एचआईएएल) बनाया है, वह पिछले कुछ सालों से लगातार विवादों में हैं। क्यों? क्योंकि इस संस्थान को लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद से 2018 में 135 एकड़ जमीन आवंटित की गई थी। इसकी बाजार कीमत आज 30 करोड़ रुपए के आस-पास बताई जाती है। इस संस्थान को निजी विश्वविद्यालय के जैसे विकसित किया जाएगा, ऐसा दावा था। मगर चार साल कुछ नहीं हुआ। संस्थान ने 2022 में विश्वविद्यालय दर्जे के लिए आवेदन किया। जबकि पट्टा अनुबंध में एक साल में विश्वविद्यालय स्थापित करने की बात थी। यही नहीं, संस्थान ने शासन को आवंटित जमीन का किराया भी नहीं चुकाया, ऐसी सूचना है। संस्थान की ओर से दावा किया गया उसे 14 करोड़ रुपए की छूट के रूप में शासन से वित्तीय मदद मिली है। जबकि इस प्रस्ताव को शासन ने स्वीकृति नहीं दी थी।
मतलब, कुल मिलाकर सोनम वाँगचुक की कहानी घूम-फिर निजी हितों से जुड़े मकसद और राजनीति के दाँव-पेंचों के इर्द-गिर्द सिमटती नजर आती है। वह राजनीति, जो पिछले कुछ सालों से लगातार केन्द्र की मौजूदा सरकार के विरुद्ध कोई बड़ा देशव्यापी आन्दोलन खड़ा करने के लिए छटपटा रही है। इसीलिए कभी नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) का विरोध करते हुए महीनों तक दिल्ली की सड़कों को बाधित रखा जाता है। कभी जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे संस्थान में कश्मीर के लिए नारे लगते हैं, ‘हम लेकर रहेंगे आजादी’। इसी तरह, कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं को कभी किसान आन्दोलन जरिए बाँध दिया जाता है। तो कभी कोई अन्य मुद्दा लेकर आम जनता को, युवाओं को सरकार के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश की जाती है।
हालाँकि, ऐसे कोई भी प्रयास बड़े पैमाने पर सफल हो नहीं पाए हैं। शायद इसलिए कि इन आन्दोलनाें मे से नेतृत्त्व के लिहाज से अब तक कोई भी निर्विवाद और लोकप्रिय चेहरा नहीं उभर सका, जो जनमानस को झकझोर सके। लिहाजा इसीलिए, अब तक मोटे तौर पर निर्विवाद रहे, तरक्की पसंद समझे जाने वाले और सौम्य से दिखने वाले सोनम वाँगचुक को लोकप्रिय फिल्म ‘थ्री इडियट‘ के जन-जनप्रिय किरदार से जोड़कर पेश करने की कोशिश हो रही है। ताकि जनता में आन्दोलन का उत्साह भरा जा सके। अलबत्ता, यहीं सवाल उठता है कि जनता क्या वाकई सभी पहलुओं को देखे-समझे बिना सोनम वाँगचुक के पीछे खड़ी होगी? जवाब तो वक्त ही देगा।
भाषा को लेकर बेवजह की हाय-तौबा मची हुई इन दिनों। वजह वही, पीढ़ियों से भारतीय… Read More
जिन्दगी अपनी है, चुनाव भी अपने ही होते हैं। ऐसा अक्सर कहा जाता है। लेकिन… Read More
महाराष्ट्र से एक चिन्ताजनक सूचना सामने आई है। यह सिर्फ उस राज्य ही नहीं, देश… Read More
भारतीय रेल बदल रही है। काफी हद तक बदल चुकी है। बदलाव का पहला पहलू-… Read More
‘श्री भक्तमाल’ के करीब-करीब सभी संस्करणों में कथा का क्रम सत युग में हुए भगवान… Read More
अभी दो दिन में सामने आई तीन सूचनाओं ने एक नई बहस को जन्म दिया… Read More