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कैसे शिक्षक हैं ये, जो छोटे बच्चों को भावनात्मक चोट पहुँचा रहे, जान देने पर मजबूर कर रहे हैं?

टीम डायरी

अभी दो दिन में सामने आई तीन सूचनाओं ने एक नई बहस को जन्म दिया है। इसमें प्रश्न यह है कि बच्चों के जीवन में शिक्षकों की भूमिका क्या हो रही है और क्या होनी चाहिए। अलबत्ता, कुछेक वर्ष पहले तो शिक्षकों को बच्चाें का जीवन सँवारने वाला ही समझा जाता था, माना जाता था। आज भी एक बड़े पैमाने पर ऐसा माना जाता होगा, लेकिन विद्यालयों से सामने आ रही सूचनाओं, घटनाओं ने इस मान्यता को दरकाया भी है। 

पहली सूचना जयपुर से। बीते साल शहर के बड़े नामी निजी विद्यालय में एक चौथी कक्षा की बच्ची ने ऊपरी मंजिल से कूदकर जान दे दी थी। उस मामले में अब पता चला है कि वह इतना बड़ा कदम उठाने पर स्कूल के शिक्षकों की वजह से मजबूर हुई थी। नीचे एक वीडियो दिया गया है, देखिएगा। यह वीडियो संबंधित विद्यालय में लगे कैमरों का ही है। इसे बच्ची के माता-पिता ने किसी तरह हासिल करने के बाद अब सार्वजनिक किया है, क्योंकि उन्हें अब तक न्याय नहीं मिला है। उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी बच्ची को लगातार उसकी कक्षा के कुछ बच्चे परेशान कर रहे थे। उसके खिलाफ ऐसे शब्दों का उपयोग कर रहे थे कि उन्हें सुनना भी किसी के लिए मुनासिब न हो। इस बारे में बच्ची ने कई बार शिक्षकों से शिकायत की। मानसिक उत्पीड़न हद से ज्यादा बढ़ने पर जब उस बच्ची ने मजबूरन जान देने का फैसला किया, तब भी उसने कक्षा में चार-पाँच बार शिक्षिका से शिकायत की थी। लेकिन किसी ने उसकी शिकायत पर कार्रवाई करना तो दूर, गौर भी नहीं किया। बल्कि उसे ही फटकार दिया। 

बच्ची के माता-पिता के आरोप, इस वीडियो को देखने के बाद, काफी हद सही भी लग रहे हैं। हालाँकि, अभी विद्यालय की तरफ से इस संबंध में कोई स्पष्टीकरण नहीं आया है। इस बीच, इसी स्कूल के शिक्षकों के बारे में एक और सूचना यह सामने आई है कि हादसे के बाद वे लोग बुरी तरह घायल बच्ची को अस्पताल तो ले गए, लेकिन वहाँ यूँ ही अकेला छोड़कर लौट गए। उन्होंने बच्ची के माता-पिता के आने का इंतजार तक नहीं किया। 

इसके बाद एक अन्य सूचना बेंगलुरू से। वहाँ के बाहरी इलाके में स्थित एक सरकारी विद्यालय के शिक्षक और एक अन्य कर्मचारी की कथित प्रताड़ना से तंग आकर आठवी कक्षा में पढ़ने वाली एक बच्ची ने आत्महत्या कर ली। उसके पास से पुलिस ने एक पत्र भी बरामद भी किया है। यह आत्महत्या से पहले लिखा गया था। इसमें उसने लिखा है कि अब “वह इतनी अपमानजनक स्थितियों को बर्दाश्त नहीं कर सकती, जिन्दा नहीं रह सकती। स्कूल के शिक्षक मुझे ऐसे काम की वजह से प्रताड़ित कर रहे हैं, दण्डित कर रहे हैं, जो मैने किया ही नहीं है।” 

मामला इन दो सूचनाओं तक ही सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश के बलिया से आई तीसरी सूचना यह है कि वहाँ के शिक्षा अधिकारी ने प्राथमिक विद्यालय के एक शिक्षक को इसलिए निलम्बित कर दिया क्योंकि उसने 14 साल के स्कूली छात्र को घर बुलाकर उससे अप्राकृतिक दुष्कर्म किया। सोचिए, इससे बच्चे के मस्तिष्क पर कैसा आघात लगा होगा? शिक्षक के नाम पर उसके मन में कैसी गंदी छवि बनी होगी? क्या यह सब होना चाहिए? 

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Neelesh Dwivedi

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