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जो अपना युद्ध नहीं रोक पा रहा, उसे भारत-पाकिस्तान युद्ध रुकवाने का श्रेय, नोबेल चाहिए!

टीम डायरी

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने एक बार कहा था, “लोकतंत्र लोगों का, लोगों के लिए, लोगों द्वारा किया जाने वाला शासन है।” फिर किसी मसखरे ने कई देशों में लोकतंत्र की दुर्गति देखकर इस कथन को बदल डाला और  कहा, “लोकतंत्र मूर्खों का, मूर्खों के लिए, मूर्खों द्वारा किया जाने वाला शासन है।” अब आज की दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका के लोग ओर वहाँ के राष्ट्रपति इस दूसरे कथन को अक्षरश: सही साबित करने में लगे हैं। वहाँ के लोगों ने पहले तो भावनाओं में बहकर एक विशुद्ध कारोबारी बुद्धि वाले व्यक्ति को देश का राष्ट्रपति बना दिया। इसके बाद अब मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति देश के हितों से ज्यादा अपने कारोबार के नफे-नुकसान को ऊपर रखकर अमेरिका का भट्‌टा बिठाने में लगे हैं। इस पर भी दिलचस्प यह कि वह इस सबके बावजूद नोबेल शांति पुरस्कार चाहते हैं। 

अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति ने अपने देश को दुनियाभर के सामने मजाक का विषय बना दिया है। इसके बावजूद न तो वह अपनी नीतियाँ बदल रहे हैं, न ही नीयत। उन्होंने पहले महज अपने कारोबार का लाभ देखकर पाकिस्तान के आतंकी-तंत्र के साथ दोस्ती बनाने को तवज्जो दी। अनुमान है कि पाकिस्तानी आतंकी-तंत्र के साथ याराना निभाने के बदले अमेरिकी राष्ट्रपति और उनके परिवार के मालिकाना हक वाले कारोबार को पाकिस्तान से शुरुआती नजराने में ही लगभग 50 करोड़ डॉलर (करीब 47.68 अरब भारतीय रुपए) का लाभ होने जा रहा है। आगे इस कंगाल देश से वह न जाने कितनी रकम लूटेंगे, कोई अंदाज भी लगा ले तो बड़ी बात है। अब कोई उनसे पूछे कि भला उन्होंने ऐसा क्यों किया? तो वह जवाब में कूटनीतिक-सा तर्क देते हैं कि पाकिस्तान को साधकर वह एक साथ भारत और ईरान दोनों पर दबाव बना रहे हैं। जबकि सच यह है कि भारत ने अब तक अमेरिका के सभी दबावों को झटकते हुए अमेरिकी शर्तों पर उसके साथ व्यापार समझौता करने से साफ मना ही दिया है। यानि अमेरिकी राष्ट्रपति का पहला झूठ।

अब आते हैं दूसरे झूठ, यानि ईरान के मसले पर। अमेरिकी राष्ट्रपति ने आगे-पीछे सोचे बिना ही इसी साल 28 फरवरी को ईरान पर हमला कर दिया। कहा कि वह वहाँ सत्ता परिवर्तन कराना चाहते हैं। इस्लामिक शासन का अंत करके ईरान के परमाणु हथियार कार्यक्रम को खत्म करना चाहते हैं। उनकी खुशफहमी थी कि कुछ ही दिनों में वह मकसद हासिल कर लेंगे। जबकि सच्चाई क्या है? आज अमेरिका-ईरान युद्ध को 131 दिन हो चुके हैं। ईरान में न तो कोई सत्ता परिवर्तन हुआ है। हाँ, पहले दिन के हमले में ईरान के शीर्ष धार्मिक नेता अयातोल्ला अली खमेनेई की मौत जरूर हुई। मगर इस्लामिक कट्‌टरपंथियों का कब्जा अब भी ईरान के शासन पर कायम है। ईरान ने मोजतबा (अयातोल्ला के बड़े बेटे) को नया शीर्ष नेता चुन लिया है। ईरान अपना परिमाणु कार्यक्रम भी छोड़ने को तैयार नहीं है। और अब तो वह होर्मुज जलडमरूमध्य के महत्त्वपूर्ण कारोबारी जलमार्ग पर कब्जा करके बैठ गया है। वहाँ से विभिन्न देशों के मालवाहक जहाजों को सुरक्षित रास्ता देने के बदले वह मोटा शुल्क वसूलना चाहता है। यही नहीं, खाड़ी के अमेरिका समर्थक देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों और अन्य जगहों पर भी वह लगातार अपनी मिसाइलों से निशाना साध रहा है। इससे अमेरिका को अब तक करीब 108 खरब रुपए (113.3 अरब डॉलर) का नुकसान हो चुका है।

अलबत्ता, अमेरिकी राष्ट्रपति को अमेरिका के नुकसान से ज्यादा मतलब है, ऐसा लगता नहीं। कारण, अमेरिका के अखबार ही बताते हैं कि ईरान के साथ युद्ध की वजह से दुनियाभर में कच्चे तेल के भाव बढ़ने से अमेरिकी राष्ट्रपति के कारोबारी समर्थक और खुद उनके परिवारजन भी पर्याप्त मुनाफाखोरी कर रहे हैं। अब सोचिए और देखिए भी कि इतना सब होने के बाद भी अमेरिका के राष्ट्रपति दावा कर रहे हैं कि उन्होंने अपने इस कार्यकाल में अब तक आठ युद्ध रुकवाए हैं। इनमें भारत-पाकिस्तान का सैन्य संघर्ष (ऑपरेशन सिन्दूर के समय का) भी शामिल है, जिसे अगर वह नहीं रुकवाते तो दोनों देशों में परमाणु युद्ध हो जाता। अपने इसी दावे के आधार पर वह फिर से माँग कर रहे हैं कि उन्हें नोबेल शान्ति पुरस्कार मिलना चाहिए इसलिए कि उन्होंने वैश्विक शान्ति की दिशा में अमेरिका में अब तक हुए सभी राष्ट्रपतियों से ज्यादा योगदान दिया है। बताइए, किसी चुटकुले जैसी नहीं है उनकी यह माँग?

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Neelesh Dwivedi

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