सांकेतिक तस्वीर
टीम डायरी
सोशल मीडिया के मंच ‘लिंक्डइन’ पर एक उद्यमी किरण वर्मा ने मार्मिक कहानी साझा की है। सच्ची कहानी, जो एक ऐसे व्यक्ति की है, जिन्होंने करीब 14-15 साल एक बड़ी कम्पनी में नौकरी की। लेकिन बाद में उन्हें उनकी उम्र और स्वास्थ्य का हवाला देकर निकाल दिया गया। इन्हीं दो कारणों से उन्हें दूसरी नौकरी भी नहीं मिली। मजबूरन उन्हें आज ऐसा काम करना पड़ रहा है, जो शायद ही वह करना चाहते होंगे। वर्तमान में एक कुरियर कम्पनी में मालवाहक (पोर्टर या कुली) के रूप में काम करते हैं वह।
किरण वर्मा एक गैरलाभकारी संस्था, ‘चेंज विद वन मील’ में मुख्य सेवा अधिकारी हैं। उन्होंने बताया, “मुझे नोएडा में ही एक जगह जल्दी से जल्दी अपना पत्र भिजवाना था। लिहाजा, मैंने एक कुरियर कम्पनी से पोर्टर बुक किया। मैंने उम्मीद की थी कि हमेशा की तरह यह सामान्य कार्यवाही होगी, लेकिन वह दिन मेरे लिए एक यादगार और थोड़ा दुखी करने वाला अनुभव दे गया। उस अनुभव ने मुझे बताया कि काम, सम्मान और नौकरी में असुरक्षा, जैसी स्थितियाँ क्या होती है। उसने मुझे सिखाया कि जीवन कठिन है। जीवन की वास्तविकता उससे भी कठिन है। जबकि कठोर सच्चाई का सामना करना कठिनतम होता है।”
वर्मा ने बताया, “बुकिंग के बाद एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति मेरे घर लिफाफा लेने आए। उस दिन चूँकि मैं घर के कपड़ों में ही था, इसलिए मैंने नीचे आना ठीक नहीं समझा। उन्हीं ऊपर बुला लिया। वह पहली मंजिल पर स्थित मेरे घर तक आ तो गए, लेकिन जल्दी ही मुझे समझ आ गया कि उन्हें सीढ़ियों से वहाँ तक पहुँचने में परेशानी हुई है। लिहाजा, मैंने उन्हें पानी के लिए पूछा। मगर उन्होंने मना कर दिया और मुस्कुराकर मुझसे लिफाफा लेकर नीचे जाने लगे। उन्होंने अच्छे-से कपड़े पहन रखे थे। बात भी काफी सभ्यता से कर रहे थे। उनके इसी रवैये ने मुझे मजबूर कर दिया कि मैं उन्हें वापस बुलाऊँ और मैंने उनको बुला भी लिया। उन्होंने ही थोड़ी देर पहले बताया था कि आज काम ही नहीं था। मतलब, उनके पास समय भी था। तो सोचा कि दो घड़ी उनके साथ कुछ बातें करूँ। वही मैंने किया भी और उस बातचीत में पता चला कि वह मजबूरी में यह काम कर रहे हैं।”
वर्मा आगे बताते हैं, “बातचीत के दौरान उन्होंने एक ऐसी बात कही, जो मेरे दिल-दिमाग में बैठ गई। उन्होंने एक रूपक का इस्तेमाल करते हुए कहा- बेटा जब सब्जी बनाते हैं, तो कड़ी पत्ता उसमें सबसे पहले डालते हैं। पर जब सब्जी बन जाने के बाद उसे खाते हैं, तो वही कड़ी पत्ता सबसे पहले निकालकर बाहर फेंकते हैं। उनके मुँह से यह बात सुनकर मेरा दिमाग हिल गया। मैं लगातार यही सोचता रहा कि क्या आज के समय में कॉरपोरेट-जगत वास्तव में इतना संवेदनाशून्य हो गया है कि जैसे ही कोई इंसान थोड़ा मजबूर हो, या उम्र अथवा स्वास्थ्य के कारण कम काम करने की स्थिति में आ जाए तो उसे निकाल फेंका जाए?”
सवाल वाकई गंभीर है, जो हम सबको सोचने पर मजबूर करता है।
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