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‘सरल भक्तमाल’- 10..: अब हम सीधे कलियुग में हुए भगवान के भक्तों के चरित्र क्यों कहेंगे?

नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश

‘श्री भक्तमाल’ के करीब-करीब सभी संस्करणों में कथा का क्रम सत युग में हुए भगवान के भक्तों जीवन प्रसंगों से शुरू होता है। फिर त्रेता युग और द्वापर युग में हुए भगवद् भक्तों के जीवन चरित्रों से होता हुआ, कलि युग में हुए भक्तों की कहानियों तक आता है। जैसे- श्री नाभादास जी ने मूल ‘श्री भक्तदाम’ ग्रंथ में शुरू के 27 छप्पयों (छह पंक्तियों के छंद) में सत युग, त्रेता युग और द्वापर युग में हुए भगवान के भक्तों का चरित्र कहा है। इसी तरह, श्री प्रियादास जी ने भी ‘श्री भक्तमाल’ की टीका ‘श्री भक्ति रस बोधिनी’ में करीब 105 कवित्तों में इन तीनों युगों के भक्तों के प्रसंगों का विस्तार से वर्णन किया है। गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित ‘श्री भक्तमाल’ में तो लगभग 328 पन्नों में तीनों युगों के भक्तों के चरित्र को कहा गया है। हालाँकि इस ‘सरल भक्तमाल’ श्रृंखला में हम सीधे कलि युग में भक्तों के जीवन-प्रसंगों को कहने जा रहे हैं। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न हो सकता है कि ऐसा क्यों? तो इसका जवाब भी श्रृंखला की मूल परिकल्पना की तरह ‘सरल’ है कि कलि युग का ‘सहज युगधर्म’ और उसके भी पालन में हमारी अक्षमता।

यह बात विस्तार और प्रामाणिकता के साथ समझाने के लिए श्री नाभादास जी के समकालीन संत श्री गोस्वामी तुलसीदास जी की मदद लेना ठीक होगा। उनके द्वारा लिखे गए ‘श्री रामचरित मानस’ का उत्तर काण्ड है। कागभुसुण्डि जी चारों युग के युगधर्म गरुड़ जी को बता रहे हैं, “सुनु ब्यालारि काल कलि मल अवगुन आगार। गुनउ बहुत कलिजुग कर बिनु प्रयास निस्तार।। (102 क)।।” अर्थात् : सुनिए गरुड़ जी (ब्यालारि मतलब सर्पों के शत्रु जो कि गरुड़ जी ही हैं), वैसे ताे कलि युग अवगुणों का भण्डार है। इसमें मल यानि दोष ही दोष हैं। लेकिन इस युग की एक बड़ी खूबी भी है। वह ये कि इसमें बिना किसी कठिन परिश्रम के मनुष्य भवबंधन (जन्म-मरण के चक्र) से मुक्ति पा सकता है। “कृतजुग त्रेताँ द्वापर पूजा मख अरु जोग। जो गति होइ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग।। (102 क)।।” अर्थात् : कृत युग (सत युग), त्रेता और द्वापर युगों में जिस गति को लोग नियम-संयम से किए गए पूजा-विधान, यज्ञ और योग-साधना, आदि से प्राप्त कर पाते हैं, कलि युग में वही गति सिर्फ हरि नाम लेने मात्र से मिल जाती है। 

फिर आगे की चौपाइयों में कागभुसुण्डि जी इसी का थोड़ा विस्तार करते हैं, “कृत जुग सब जोगी बिग्यानी। करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी।।” मतलब : कृत युग में सब लोग योगी, ज्ञानी-विज्ञानी होते हैं। वे पूरे नियम-संयम से भगवान का पूजन-ध्यान कर के मुक्ति पाते हैं। “त्रेताँ बिबिध जग्य नर करहीं। प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं।।” यानि : त्रेता युग में विभिन्न प्रकार के यज्ञों की प्रधानता रहती है। लोग यज्ञादि सभी कर्म भगवान को समर्पित करके किया करते हैं। इस तरह भव सागर पार करते हैं। “द्वापर करि रघुपति पद पूजा। नर भव तरहिं उपाय न दूजा।।” अर्थ कि : द्वापर युग में लोग भगवान श्री राम (और योग योगेश्वर श्री कृष्ण) का भजन-पूजन करके अपने जीवन का उद्धार करते हैं। “कलिजुग केवल हरि गुन गाहा। गावत नर पावहिं भव थाहा।।” अर्थात् : कलि युग में भगवान के नाम-गुण का कीर्तन करने मात्र से ही लोग भव-बंधन से छूट सकते हैं। “कलिजुग जोग न जग्य न ज्ञाना। एक अधार राम गुन गाना।।” यानि : कलि युग में योग, यज्ञ, ज्ञान, आदि कुछ नहीं है। श्री राम के नाम-गुण का गान ही आधार है। 

कहने का अर्थ यह है कि सत युग, त्रेता युग, द्वापर युग में लोग स्वाभाविक रूप से धर्म बुद्धि वाले होते हैं। भगवान को पाना, उनके धाम को जाना ही उनके जीवन का लक्ष्य होता है। उसी लक्ष्य को लेकर वह अपने सब काम किया करते थे। मगर कलि युग में क्या ऐसा है? नहीं है। श्री रामचरित मानस के उत्तर काण्ड में ही श्री कागभुसुण्डि जी गरुड़ जी को बता रहे हैं, “कलिमल ग्रसे धर्म सब लुप्त भए सद् ग्रंथ। दंभिन्ह निज मति कल्पि करि प्रगट किए बहु पंथ।। (97 क)।।” अर्थात् : कलि युग के दोष इतने हैं कि उनमें सभी धर्म तथा सद् ग्रंथ लुप्त हो जाते हैं। उनकी जगह दम्भी किस्म के लोग अपनी बुद्धि और कल्पना से नए-नए पंथ (धर्म के नाम पर पाखण्ड के नए रास्ते) चला देते हैं। “भए लोग सब मोहबस लोभ ग्रसे शुभ कर्म। सुनु हरिजान ग्यान निधि कहऊँ कछुक कलि धर्म।। (97 ख)।।” अर्थात् : कलि युग में सब लोग मोह के वशीभूत होते हैं। लोभ उनके सभी शुभ कर्म समाप्त कर देता हैं। कलि युग के कुछ ऐसे और भी धर्म (विशेषता) हैं। हरिप्रिय ज्ञाननिधि गरुड़ जी, मैं आपको बताता हूँ, सुनिए। 

इसके बाद श्री गोस्वामी तुलसीदास जी आगे विस्तार से कागभुसुण्डि जी के माध्मम से कलि युग के गुण-धर्म का वर्णन करते हैं। जैसे- कलि युग के लोग वर्णाश्रम को नहीं मानते। शास्त्रों में बताई गई बातों के विरुद्ध आचरण करते हैं। निगम, अनुशासन नहीं मानते। जिसको जो रास्ता (पंथ,आदि) अच्छा लगता है, वह उसी को मानने लगता है। बेवजह गाल बजाने वाले लोग पण्डित माने जाते हैं। दम्भी-पाखण्डी लोग संत कहलाते हैं। जो किसी भी प्रकार से दूसरे का धन छीन लेते हैं, वह सयाने कहलाते हैं। जो सीना तानकर बड़ा दिखावा करते हैं, वह ऊँचे आचार-विचार वाले माने जाते हैं। जो झूठे और मसखरी करने वाले होते हैं, वह गुणी कहलाते हैं। जो शास्त्रों के विरुद्ध आचरण करते हैं, वह ज्ञानी-वैरागी कहे जाते हैं। जो बड़े नाखून और बड़ी जटाएँ रख लेते हैं, वह तपस्वी कहलाने लगते हैं। स्त्री और पुरुष सब दुराचारी होते हैं। माता-पिता अपने बच्चों को पेट भरने के लिए सिर्फ मोटी-मोटी कमाई करने की बातें सिखाते हैं। सुहागन स्त्रियाँ विधावाओं के समान रहती हैं और विधवाएँ सुहागनों की तरह श्रृंगार किया करती हैं, आदि। 

श्री रामचरित मानस के इस प्रसंग के माध्यम से श्री गोस्वामी तुलसीदास जी यह स्पष्ट करते हैं कि कलि युग में भगवान की प्राप्ति का सबसे सरल साधन होने के बाद भी लोग उसे साध नहीं पाते। इसलिए कि कलि युग के लोभ, मोह, दम्भ, पाखण्ड, जैसे तमाम दोष उन पर हावी रहते हैं। हालाँकि यहीं दूसरी तरफ, ‘श्री भक्तमाल’ में गोस्वामी श्री नाभादास जी कलि युग के ही महापुरुषों के जीवन-चरित्रों के माध्यम से ऐसे उदाहरण सामने रखते हैं, जिनसे पता चलता है कि इस युग के तमाम दोषों को हराया जा सकता है। इनसे यह भरोसा होता है, प्रेरणा मिलती है कि इस युग के दुर्गुणों के बीच रहते हुए भी हरि के नाम और गुणों का संकीर्तन करते-करते भगवान को पाया जा सकता है। भवबंधन से मुक्ति पाई जा सकती है। अपने इस ‘सरल भक्तमाल’ प्रयास के माध्यम से मुख्य तौर पर इसी भाव का, प्रेरणा, और प्रोत्साहन का प्रसार करना हमारा भी उद्देश्य है। इसीलिए हम इस श्रृंखला में सीधे कलि युग में हुए भक्तों के जीवन-चरित्र से जुड़ी कहानियों पर आगे बढ़ने वाले हैं। इनमें एक कहानी श्री तुलसीदास जी की भी होगी। 

आगे की कड़ियों में यह सब कुछ…,अभी के लिए बस इतना ही।

श्री राधाकृष्णार्पणम् अस्तु, श्री राधा-कृष्ण को समर्पित…, श्री राधाकृष्णाभ्याम् नम:, श्री राधा-कृष्ण को प्रणाम।

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नोट : यह श्रृंखला गीता प्रेस की आधिकारिक पुस्तक ‘श्री भक्तमाल’ में उल्लिखित कथा-प्रसंगों पर आधारित है। इसके प्रकाशन-प्रसारण के पीछे हमारा उद्देश्य सिर्फ इतना है कि गीता प्रेस के ऐसे उच्च स्तर के ऐतिहासिक, पौराणिक महत्त्व के ग्रंथ के प्रचार-प्रसार में #अपनीडिजिटलडायरी की ओर से थोड़ा योगदान हो सके। साथ ही #डायरी से जुड़े पाठकों को इसका लाभ हो। बहुत जल्द हम इसी श्रृंखला को #अपनीडिजिटलडायरी के यूट्यूब चैनल पर भी शुरू करने का इरादा रखते हैं।)

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श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ

9 – ‘सरल भक्तमाल’- 9…: प्रियादास कौन थे, उन्होंने भक्तमाल-टीका 90 साल बाद कैसे लिखी?
8 – ‘सरल भक्तमाल’- 8…: श्री नाभादास जी का यह नाम कैसे पड़ा, और इसका मतलब क्या है?
7 – ‘सरल भक्तमाल’-7…: हनुमान जी हैं बाल-ब्रह्मचारी, तो नाभादास जी ‘हनुमानवंश’ के कैसे?
6 – ‘सरल भक्तमाल’-6…: श्री नाभादास जी के हाथों ‘भक्तदाम’ ग्रंथ प्रकट कैसे हुआ?
5 – ‘सरल भक्तमाल’-5…: तुलसीदास के ‘रामचरित मानस’ जैसा नाभादास का ‘भक्तमाल’
4 – ‘सरल भक्तमाल’-4…: असाधारण ग्रंथ, जिसकी कहानियाँ भगवान भी मन लगाकर सुनते हैं!
3 – ‘सरल भक्तमाल’-3…ठाकुर जी ने ‘अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन’ दिलाया श्रीराजेन्द्रदास जी महाराज से!
2 – ‘सरल भक्तमाल’-2…ठाकुर जी ने भक्तमाल की सेवा में मुझे कैसे लगाया?
1- सरल भक्तमाल’-1…आखिर इसकी जरूरत क्यों? 

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Neelesh Dwivedi

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