Shri Bhaktmal

‘सरल भक्तमाल’- 9…: प्रियादास कौन थे, उन्होंने भक्तमाल-टीका 90 साल बाद कैसे लिखी?

नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश

‘श्री भक्तमाल’ के बारे में दिलचस्प बात यह है कि वर्तमान में, इस महान् ग्रंथ की पूर्णता ‘श्री भक्ति रस बोधिनी’ के बिना होती नहीं है। ऐसे में, प्रश्न बनता है कि यह ‘भक्ति रस बोधिनी’ क्या है? तो जवाब यह कि ‘श्री भक्तमाल’ की ही विस्तृत व्याख्या है, ‘श्री भक्ति रस बोधिनी’। इसकी मदद से भगवान के भक्तों के चरित्र समझना और उन्हें आत्मसात् करना आसान हो जाता है। इसीलिए इसका अपना अलग महत्त्व है। बल्कि, अब तो सच्चाई यह है कि ‘श्री भक्तदाम’ (मूल नाम) और ‘श्री भक्ति रस बोधिनी’ को मिलाकर ही ‘श्री भक्तमाल’ का स्वरूप बनता है। हालाँकि इसमें भी गौर करने की बात यह है कि ‘श्री भक्ति रस बोधिनी’ को मूल ‘श्री भक्तदाम’ लिखे जाने के करीब 90 साल बाद लिखा गया। यही नहीं, ‘श्री भक्ति रस बोधिनी’ को जिन्होंने लिखा, उनका श्री नाभादास जी या उनकी गुरु परम्परा से भी कोई नाता नहीं था! तो फिर यह कैसे हुआ?

इसके उत्तर के लिए भी एक बढ़िया कहानी है। यह बात है ईस्वी दशक 1700 के आस-पास के वर्षों की। उस समय भारत के सिद्ध संतों में एक हुए श्री प्रियादास जी। भक्तिमार्ग की कृष्ण भक्ति शाखा में ‘चैतन्य सम्प्रदाय’ के संत। उनके सम्प्रदाय को ‘गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय’ भी कहते हैं। इसकी शुरुआत ईसा की 16वीं सदी में बंगाल के महान् संत श्री चैतन्य महाप्रभु ने की थी। उन्हीं की शिष्य परम्परा में आगे श्री प्रियादास जी का नाम भी जुड़ा। ये जन्म से गुजराती थे। सूरत जिले के राजपुरा गाँव में इनका जन्म हुआ था, ऐसा गीता प्रेस से प्रकाशित ‘श्री भक्तमाल ग्रंथ’ में उल्लेख मिलता है। हालाँकि इनके जन्म का वर्ष निश्चित नहीं है। फिर भी, कुछ जगहों पर ईस्वी सन् 1683 के एकाध साल आगे-पीछे इनका जन्म हुआ होगा, ऐसा अनुमान लगाते हैं। इनके पिताजी का नाम श्री वासुदेव जी और माता का श्रीमती गंगा देवी बताया जाता है। अलबत्ता, यह भी पुख्ता नहीं है क्योंकि इनके माता-पिता, आदि की भी प्रामाणिक जानकारी है नहीं।

ऐसी जानकारी के अभाव का सबसे बड़ा और प्रमुख कारण संभवत: यह होगा कि श्री प्रियादास जी ने बहुत छोटी उम्र में ही अपना घर-गाँव छोड़ दिया था। भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें अपनी तरफ ऐसा खींचा कि वह बिना कहीं अधिक भटकाव के सीधे वृन्दावन धाम पहुँच गए। वहाँ उन्हें श्री राधारमण जी मन्दिर के गोस्वामी श्री मनोहरदास जी का आशीर्वाद मिला। श्री मनोहर दास जी ने ही उन्हें अपने शिष्य के तौर पर दीक्षित किया और फिर कुछ समय बाद आज्ञा दी कि देश के विभिन्न तीर्थों का दर्शन करो। गुरु जी की आज्ञा से श्री प्रियादास जी वृन्दावन से निकले। प्रयागराज, अयोध्या, चित्रकूट, आदि तीर्थों का दर्शन करते हुए वह जयपुर पहुँचे श्री गलता जी धाम। वही गलता जी धाम, जहाँ श्री नाभादास जी अपने गुरु के सान्निध्य में रहा करते थे। वही गलता जी धाम, जहाँ श्री नाभादास जी ने गुरु जी की आज्ञा से ‘श्री भक्तमाल’ ग्रंथ की रचना की थी।

इस तरह, सीधे शब्दों में कहें तो श्री भगवान कृष्ण ने ही श्री प्रियादास जी को एक विशेष उद्देश्य से श्री नाभादास जी के स्थान पर लाकर बिठा दिया था। और वह उद्देश्य क्या था? इस बारे में श्री प्रियादास जी ही बताते हैं, “महाप्रभु कृष्णचैतन्य मनहरनजू के, चरण कौ ध्यान मेरे नाम मुख गाइए। ताही समय नाभाजू ने आज्ञा दई, लई धारि टीका विस्तारि भक्तमाल की सुनाइए।। कीजिए कवित्त बंद छंद अति प्यारौ लगै, जगै जग माहिं कहि वाणी विरमाइए। जानों निजमति ऐ पै सुन्यौ भागवत शुक, द्रुमनि प्रवेश कियो ऐसेई कहाइए।।” यह ‘श्री भक्ति रस बोधिनी’ का पहला कवित्त है, जिसमें श्री प्रियादास जी बता रहे हैं, “एक दिन मैं ध्यान में बैठा था। मन ही मन अपने गुरु श्री मनोहर दास जी का ध्यान कर रहा था। मुँह से भगवान के नाम का संकीर्तन हो रहा था कि तभी मुझे श्री नाभादास जी का दर्शन हो गया। उन्होंने मुझे आज्ञा दी कि श्री भक्तमाल की विस्तार से टीका करके सुनाइए। वह टीका कवित्त छंदों में हो, क्योंकि वह छंद अत्यंत प्रिय लगता है। इससे श्री भक्तमाल और उसकी टीका पूरे संसार में प्रसिद्ध हो जाएगी। इतना कहकर श्री नाभादास जी चुप हुए तो मैंने उनसे कहा, प्रभो! मैं अपनी बुद्धि की सीमा जानता हूँ। इसलिए आप ही मेरी बुद्धि में प्रवेश कर इस संकल्प को पूरा कराने की कृपा करें।” कहते हैं, श्री नाभादास जी ने उनकी विनती स्वीकारी और श्री प्रियादास जी को सतत् मार्गदर्शन देकर ‘श्री भक्ति रस बोधिनी’ टीका लिखवाई।

इस तरह, भगवान श्री कृष्ण की कृपा से दो भिन्न कालखण्डों में हुए और अलग-अलग भक्ति धाराओं के सिद्ध संतों का मिलना हुआ। और फिर ‘श्री भक्तमाल’ ग्रंथ उस स्वरूप में सामने आया, जिसमें आज वह श्रद्धालुओं को भक्ति की राह दिखा रहा है। वह समय था विक्रम संवत् 1769, यानि ईस्वी सन् 1712 का, जब ‘श्री भक्ति रस बोधिनी’ नामक ग्रंथ लिखने का काम पूरा हुआ। अब इसमें श्री प्रियादास जी ने किया क्या है? यह भी एक जिज्ञासा हो सकती है। तो गुजरात के ही एक महान् भक्त श्री नरसी मेहता के उदाहरण से इसका निदान करते हैं। श्री नाभादास जी ने मूल ‘श्री भक्तदाम’ ग्रंथ में नरसी मेहता का उल्लेख सिर्फ एक छप्पय-छंद में किया है। जबकि ‘श्री भक्ति रस बोधिनी’ में श्री प्रियादास जी ने उनकी पूरी कहानी 26 कवित्तों में विस्तार से बताई है। वह भी सरस और रुचिकर भाषा में। ऐसा ही काम उन्होंने अन्य कई प्रसंगों में भी किया है। इसीलिए ऐसा कहते हैं कि उनके ग्रंथ के संग से ही ‘श्री भक्तमाल’ की पूर्णता होती है।

अभी के लिए बस इतना ही, अगली कड़ी से ‘श्री भक्तमाल’ की आगे की कहानियों का सिलसिला शुरू करेंगे।

श्री राधाकृष्णार्पणम् अस्तु…, श्री राधाकृष्णाभ्याम् नम:। श्री राधा-कृष्ण को समर्पित। श्री राधा-कृष्ण को प्रणाम।

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नोट : यह श्रृंखला गीता प्रेस की आधिकारिक पुस्तक ‘श्री भक्तमाल’ में उल्लिखित कथा-प्रसंगों पर आधारित है। इसके प्रकाशन-प्रसारण के पीछे हमारा उद्देश्य सिर्फ इतना है कि गीता प्रेस के ऐसे उच्च स्तर के ऐतिहासिक, पौराणिक महत्त्व के ग्रंथ के प्रचार-प्रसार में #अपनीडिजिटलडायरी की ओर से थोड़ा योगदान हो सके। साथ ही #डायरी से जुड़े पाठकों को इसका लाभ हो। बहुत जल्द हम इसी श्रृंखला को #अपनीडिजिटलडायरी के यूट्यूब चैनल पर भी शुरू करने का इरादा रखते हैं।)

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श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ

8 – ‘सरल भक्तमाल’- 8…: श्री नाभादास जी का यह नाम कैसे पड़ा, और इसका मतलब क्या है?
7 – ‘सरल भक्तमाल’-7…: हनुमान जी हैं बाल-ब्रह्मचारी, तो नाभादास जी ‘हनुमानवंश’ के कैसे?
6 – ‘सरल भक्तमाल’-6…: श्री नाभादास जी के हाथों ‘भक्तदाम’ ग्रंथ प्रकट कैसे हुआ?
5 – ‘सरल भक्तमाल’-5…: तुलसीदास के ‘रामचरित मानस’ जैसा नाभादास का ‘भक्तमाल’
4 – ‘सरल भक्तमाल’-4…: असाधारण ग्रंथ, जिसकी कहानियाँ भगवान भी मन लगाकर सुनते हैं!
3 – ‘सरल भक्तमाल’-3…ठाकुर जी ने ‘अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन’ दिलाया श्रीराजेन्द्रदास जी महाराज से!
2 – ‘सरल भक्तमाल’-2…ठाकुर जी ने भक्तमाल की सेवा में मुझे कैसे लगाया?
1- सरल भक्तमाल’-1…आखिर इसकी जरूरत क्यों? 

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