Shri Bhaktmal

‘सरल भक्तमाल’-4…: असाधारण ग्रंथ, जिसकी कहानियाँ भगवान भी मन लगाकर सुनते हैं!

नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश

सिर्फ सुनने में दिलचस्पी रखने वालों के लिए ऑडियो फाइल नीचे दी गई है…

श्रीभक्तमाल कोई साधारण ग्रंथ नहीं है, ऐसा हमारे संत-महात्माओं का कहना है। हालाँकि, प्रश्न करने वाले फिर भी पूछ सकते हैं कि आखिर इस ग्रंथ में ऐसा क्या है, जो यह असाधारण हो गया? तो इसका जवाब गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित श्रीभक्तमाल ग्रंथ के शुरू में ही मिल जाता है। गीता प्रेस के संपादक श्री राधेश्याम खेमका जी ‘श्रीभक्तमाल परिचय’ में लिखते हैं, “जैसा नाम से ही स्पष्ट है, यह ग्रंथ भगवान के प्रिय भक्तों के चरित्रों के पुष्पों की माला है। इस माला को भगवान अपने कण्ठ में वैसे ही धारण किए रहते हैं, जैसे उनकी वैजयंती माला।” यानि श्रीभक्तमाल में भगवान के भक्तों के ऐसे-ऐसे जीवन प्रसंग हैं, उनकी ऐसी-ऐसी कहानियाँ हैं, जो भगवान को अपनी वैजयंती माला के जैसी या कहें कि उससे भी बढ़कर प्रिय हैं। तो जैसे श्री भगवान की वैजयंती माला की खुशबू सृष्टि के कण-कण को पवित्र करती है, वैसे ही उनके भक्तों की कहानियाँ भी अपना असर दिखाती हैं। कानों के माध्यम से इनकी महक जिस किसी के भी दिल-दिमाग में उतरती है, वही शांत और आनंदित हो जाता है। उसकी बेचैनी मिट जाती है। पर इससे क्या होगा?

इससे यह होगा कि “मन चंगा, तो कठौते में गंगा”। भगवान के परम भक्त संत कवि श्री रैदास जी यही कहते थे न? यानि जब हमारा मन अच्छा होगा, आनंद में होगा, शुद्ध होगा, शांत होगा, तो हमें हर जगह ईश्वर दिखने लग जाएँगे। उनकी लीलाएँ दिखने लग जाएँगी और इस तरह हम भगवान से जुड़ने लग जाएँगे, वैसे ही जैसे उनके भक्त उनसे जुड़े रहते हैं। और इससे भी क्या होगा? तो इसका उत्तर खुद भगवान श्रीकृष्ण देते हैं। श्रीमद्भागवत के 11वें स्कंध के 14वें अध्याय में भक्तियोग प्रसंग के तहत भगवान श्रीउद्धव जी के सामने भक्तों का महत्त्व बता रहे हैं। उस प्रसंग के 16वें श्लोक में वह कहते हैं, “जो सभी कामनाओं से मुक्त है, जो मौन है, शांत है, जो किसी से वैर नहीं रखता और हर जगह, हर किसी में मुझे ही देखता है, मैं खुद उसके पीछे-पीछे चलता हूँ। ताकि उसके पैरों की धूल मेरे ऊपर आ जाए और मैं पवित्र हो सकूँ।” मतलब जब हमारा मन शुद्ध होगा, चंगा होगा तो हमें कठौते के पानी में गंगाजी यानि हर कहीं भगवान का अनुभव होने लगा। फिर यह अभ्यास बढ़ते-बढ़ते हम उन भक्तों जैसी स्थिति तक भी पहुँच सकेंगे, जिनके पीछे खुद भगवान चला करते हैं। और यह सब हो सकेगा भक्तों की कहानियों की प्रेरणा से।

इसीलिए भगवान के भक्तों की कहानियों की प्रमुखता वाले श्रीभक्तमाल को असाधारण ग्रंथ माना गया है। इस ग्रंथ में लगभग दो-तीन सौ कहानियाँ हैं। इनकी शुरुआत भगवान के 24 अवतारों की कहानियों से हुई है। फिर उनके 12 मुख्य भक्तों की कहानियाँ हैं। इनमें ब्रह्मा जी और शंकर जी, भी शामिल हैं। आगे उनके 16 पार्षदों की कहानियाँ हैं। इनमें जय, विजय, बल, प्रबल, नंद, सुनंद, आदि हैं। इसके बाद गरुड़ जी, हनुमान जी, जाम्बवान जी, सुग्रीव जी, आदि के चरित्र हैँ। ऐसे करते-करते आदि काल से कलियुग के अभी कुछ 200-300 साल पहले तक के भक्तों की कहानियाँ श्रीभक्तमाल में दी गई हैं। अलबत्ता, प्रश्न यहाँ भी हो सकता है कि अभी तो कहा था कि श्रीभक्तमाल में भगवान के भक्तों की कहानियाँ हैं। फिर इनमें भगवान के अवतारों और ब्रह्मा जी, शंकर जी, हनुमान जी, आदि की कहानियाँ क्यों? इसका जवाब श्रीभक्तमाल को पहली बार प्रकट करने वाले, लिखने वाले श्री नाभादास जी देते हैं, “भक्त, भक्ति, भगवंत, गुरु, चतुर नाम वपु एक। इनके पद वंदन किएँ, नासत विघ्न अनेक।।” मतलब भक्त, भक्ति, भगवान और गुरु, ये चारों सिर्फ नाम से अलग हैं। वास्तव में ये हैं सब एक। इनके सेवन-पूजन से ही सब बाधाएँ खत्म होती हैं।

और ऐसा भी कहते हैं, बल्कि पूरे विश्वास के साथ मानते भी हैं कि भगवान के जीवन प्रसंगों से जुड़ी कहानियाँ सुनने से जितनी प्रसन्नता भक्तों को होती है, उससे कहीं अधिक आनंद भगवान को अपने भक्तों के चरित्र सुनकर होता है। वह खुद भक्तों के जीवन से जुड़ी कहानियाँ बड़े चाव से, मन लगाकर सुनते हैँ। श्री राधेश्याम खेमका जी लिखते भी हैं, “भगवान जब शिव जी का रूप लेते हैं, तो वह श्रीराम जी के भक्त बन जाते हैं। जबकि श्रीराम जी के रूप में वही शिव जी के भक्त हो जाते हैँ। इस तरह एक-दूसरे की लीला कथाओं के आनंद में डूबे रहते हैं। ऐसे देखें तो भक्त और भगवान एक-दूसरे के लीला-सहचर हैं। मतलब एक-दूसरे की लीलाओं में परस्पर सहयोगी। अकेले भगवान की तो कोई लीला बन भी नहीं सकती। दोनों नित्य निरंतर साथ हैं।”

मतलब जब हम श्रीभक्तमाल की कहानियों को पढ़ते-सुनते हैं, तो एक साथ भक्त और भगवान दोनों के चरित्रों, उनकी लीलाओं को पढ़-सुन रहे होते हैं। आम तौर पर किसी अन्य पौराणिक ग्रंथ को पढ़ने-सुनने से ऐसा दुर्लभ लाभ आंशिक रूप से ही मिल पाता है। जैसे- हम महर्षि श्री वाल्मीकि जी द्वारा लिखी श्रीमद् रामायण या श्री गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा लिखा गया श्री रामचरित मानस पढ़ें-सुनें, तो इनमें भगवान श्रीराम की लीलाएँ, उनका जीवन-चरित्र ही प्रमुखता से मिलता है। जबकि उनके भक्त श्री हनुमानजी, जाम्बवान, सुग्रीव, विभीषण, निषादराज, केवट, आदि के प्रसंग संक्षेप में मिलते हैं। ऐसा ही श्रीमद् भागवत जैसे ग्रंथों में है। मगर श्रीभक्तमाल में ऐसा नहीं है। इसमें भक्तों की कहानियाँ प्रमुख हैं। भगवान की लीला-कथा उनके पीछे है।

इस संबंध में लोकप्रिय कथावाचक इन्द्रेश उपाध्याय जी एक और महत्त्वपूर्ण बात बताते हैं। वह अपने कथा-प्रवचन के दौरान श्रीमद् भागवत के पहले श्लोक, “सच्चिदानंद रूपाय विश्व उत्पत्यादि हेतवे। ताप त्रय विनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नम:” की सुंदर व्याख्या करते हैं। वह कहते हैं, “भगवान को सत्य मानिए। चैतन्य मानिए। क्योंकि वह ऐसे ही हैं। हम जब उन्हें सत्य, चैतन्य मानेंगे, तो वह आनंद रूप से हमारे जीवन में रहेंगे। और हमें तीनों प्रकार के- दैहिक, भौतिक और दैविक कष्टों से मुक्ति देंगे।” पर प्रश्न यह है कि ऐसी व्याख्याएँ सुनने के बावजूद क्या किसी सामान्य व्यक्ति के लिए भगवान को सत्य, चैतन्य मानकर हमेशा, हर समय उन्हें अपने पास महसूस करना संभव होता है? शायद नहीं। इसीलिए फिर इस काम में जनसामान्य के लिए सहयोगी और मार्गदर्शक होता है, श्री भक्तमाल जैसा ग्रंथ। उसमें भक्तों के चरित्र, उनके जीवन प्रसंग, भगवान के साथ उनके राग-अनुराग, उनके व्यवहार, आदि को पढ़-सुनकर कोई भी व्यक्ति उन्हीं के जैसे काम करने लिए प्रेरित, प्रोत्साहित हो सकता है। ऐसा कर के भगवान के नजदीक आ सकता है।

इसीलिए असाधारण है श्री भक्तमाल ग्रंथ।… अभी के लिए बस इतना ही। अगली कड़ी में गौर करेंगे कि भक्तमाल ग्रंथ किसने लिखा, कब-किसने इसे विस्तार दिया?….

श्री राधाकृष्णार्पणम् अस्तु…, श्री राधाकृष्णाभ्याम् नम:। श्री राधा-कृष्ण को समर्पित। श्री राधा-कृष्ण को प्रणाम। 

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नोट : यह श्रृंखला गीता प्रेस की आधिकारिक पुस्तक ‘श्री भक्तमाल’ में उल्लिखित कथा-प्रसंगों पर आधारित है। इसके प्रकाशन-प्रसारण के पीछे हमारा उद्देश्य सिर्फ इतना है कि गीता प्रेस के ऐसे उच्च स्तर के ऐतिहासिक, पौराणिक महत्त्व के ग्रंथ के प्रचार-प्रसार में #अपनीडिजिटलडायरी की ओर से थोड़ा योगदान हो सके। साथ ही #डायरी से जुड़े पाठकों को इसका लाभ हो। बहुत जल्द हम इसी श्रृंखला को #अपनीडिजिटलडायरी के यूट्यूब चैनल पर भी शुरू करने का इरादा रखते हैं।) 

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श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ

3 – ‘सरल भक्तमाल’-3…ठाकुर जी ने ‘अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन’ दिलाया श्रीराजेन्द्रदास जी महाराज से!
2 – ‘सरल भक्तमाल’-2…ठाकुर जी ने भक्तमाल की सेवा में मुझे कैसे लगाया?  
1- सरल भक्तमाल’-1…आखिर इसकी जरूरत क्यों?

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