टीम डायरी
करीब तीन साल पहले ओईसीडी (आर्थिक सहयोग और विकास संगठन) देशों (अमेरिका और यूरोप के 38 देश) की एक रिपोर्ट आई थी। इसमें बताया गया कि इन ‘समृद्ध’ देशों की नागरिकता लेने वाले विदेशी नागरिकों में सबसे अधिक संख्या भारत के लोगों की है। इन भारतीयों में भी सबसे ज्यादा लोग अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया की नागरिकता ले रहे हैं। यानि सीधे शब्दों कहें तो भारत के लोग किसी न किसी कारण से अपना देश छोड़कर विदेश की ओर भाग रहे थे। हालाँकि अब लगता है कि स्थिति थोड़ी बदल रही है। बीते हफ्तेभर के भीतर ही दो घटनाएँ मीडिया और सोशल मीडिया की सुर्खी बनी हैं। इनमें से एक तो अभी की है।
जर्मनी में करीब 10 साल तक रहने के बाद अपना जमा-जमाया काम-धंधा छोड़कर हरित भसीन नाम के पेशेवर युवा भारत लौट आए हैं। क्यों? इसका जवाब उन्होंने इस तरह दिया है, “जर्मनी में 10 साल तक रहने के बाद हमने ऐसा फैसला किया, जो कई लोगों को चौंका सकता है। हमने अपने सामान समेटा, और उस देश को छोड़ दिया जहाँ हमारे बच्चों का जन्म हुआ। हम भारत लौट आए। जब मैंने यह समाचार सार्वजनिक किया तो कई लोगों ने सवाल किया- क्या तुम्हें जर्मनी पसंद नहीं आया। मेरा जवाब बिल्कुल सीधा था- जर्मनी हमेशा मेरे दिल में रहेगा।हम लोग जन्मभूमि और कर्म भूमि का उल्लेख किया करते हैं। इस लिहाज से जर्मनी, मेरी कर्म भूमि ने मुझे 10 खूबसूरत वर्षों में बहुत कुछ दिया। मैंने अपना करियर बनाया, मेरे बच्चों का वहाँ जन्म हुआ, मैं शानदार लोगों से मिला, हमारे परिवार ने यादगार स्मृतियाँ सहेजीं, मैंने सीखना, संघर्ष करना और मजबूत होना सीखा। इसलिए ऐसा नहीं कह सकते कि हमें जर्मनी पसंद नहीं आया। यह फैसला वास्तव में हमने इसलिए लिया क्योंकि अब भारत हमें वापस बुला रहा है। हम अपने परिवार के पास रहना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे जीवन के दोनों पहलू देखें। पहला- जर्मनी जैसे देश का वैश्विक वातावरण और अनुशासन। दूसरा- भारत जैसे देश की गर्मजोशी, पारिवारिक मूल्य और संस्कृति। कई लोगों ने हमसे यह पूछा- तुम लोग सोच-समझकर तो लौटे हो? तो हाँ, हम पूरी तरह सोच-समझकर, योजना बनाकर लौटे हैं। हमने किसी दबाव या डर से फैसला नहीं लिया है। बल्कि, हमने पूरी स्पष्टता के साथ अपने परिवार, अपनी जड़ों को चुना है। हमारे लिए जर्मनी वह जगह नहीं, जहाँ का अध्याय हमने बंद करके उससे दूरी बना ली है। इस अध्याय को हमेशा मैं कृतज्ञता के साथ अपने संग रखूँगा। इसी तरह, भारत भी हमारे लिए कोई एक जगह मात्र नहीं, जहाँ हम लौटे हैं। यह हमारा घर है। मेरे दिल में दोनों देश हैं और रहेंगे।” भसीन नेतृत्त्व और करियर से जुड़ी रणनीतियाँ बनाते हैं।
वैसे, यह कोई पहला मामला नहीं है। अभी पिछले सप्ताह ही इसी तरह की एक और सुर्खी सामने आई थी। शुक्रवार, 26 जून को आंध्र प्रदेश के बापतला जिला कलेक्टर के सामने एक 94 साल की दादी महालक्षम्मा पेश हुईं थीं (लेख के साथ तस्वीर उन्हीं की है)। वह 26 साल तक अमेरिका की नागरिक रहीं। लेकिन उस रोज कलेक्टर के सामने जाकर उन्होंने अमेरिकी नागरिकता छोड़ने का अपना फैसला सुनाया। साथ ही फिर भारत की नागरिकता हासिल करने के लिए अर्जी लगाई। जानते हैं क्यों? इसलिए कि वह चाहती हैं कि उनके जीवन का आखिरी समय उनकी अपनी धरती, अपने देश में कटे। उनका अंतिम संस्कार वहीं हो, जहाँ वह पैदा हुईं, पली-बढ़ीं, विवाह हुआ और उन्होंने परिवार बनाया। जिला प्रशासन ने उनकी अर्जी पर कार्रवाई शुरू कर दी है। महालक्षम्मा को 27 जुलाई 2000 को अमेरिकी नागरिकता मिली थी। उनके पति के निधन के बाद बच्चे उन्हें अपने साथ अमेरिका ले गए थे। मगर जैसा कि उन्होंने खुद बताया, “उस देश में सब है। दुनिया की तमाम सुख-सुविधाएँ। लेकिन फिर भी वहाँ वैसा अपनापन, सामाजिकता नहीं है, जैसी भारत में। वहाँ सब होकर भी अकेलापन घेरे रहता है।”
काश! इन दादी और हरित भसीन जैसे चुनिन्दा युवाओं के अनुभव से वे लोग भी कुछ सीख सकें, जो अपना देश, अपनी मिट्टी छोड़कर अमेरिका, आदि देशों में जिन्दगी गुजारने के लिए मरे जा रहे हैं। काश! इनके जैसी भावनाएँ उनमें भी पनपें, तो कितना अच्छा हो। खास तौर पर अपने देश के लिए?
