Hindutva

क्या हिन्दुत्त्व को अब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की फिर से समीक्षा नहीं करनी चाहिए?

समीर शिवाजी राव पाटिल, भोपाल मध्य प्रदेश

बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की अभूतपूर्व विजय और प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी के दीर्घतम कार्यकाल वाले उत्सव की निष्पत्ति नैतिक अशुचिता पर उठे विकराल यक्ष प्रश्न में हुई। महाराष्ट्र में उद्धव शिवसेना के सांसदों की सेंधमारी और मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री मोहन यादव पर जमीन खरीद के आरोपों ने भारतीय जनता पक्ष की राजनीतिक शुचिता के दावे पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इतना ही नहीं, श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर की दान पेटियों से धन चोरी के मामले ने तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सामने एक नैतिक असहजता का हिमालय ही खड़ा कर दिया है।

भारतीय जनता पक्ष के नेताओं के भ्रष्टाचार-शिष्टाचार से आम-ओ-खास वाकिफ है। किन्तु श्रीराममन्दिर में हुए कदाचार से जुड़े किरदारों का संघ से जुड़ाव का सम्भवत: यह पहला मामला है। यह कोई छोटी-मोटी बात नहीं। संघ के महत्त्व का आकलन हम इस बात से कर सकते हैं कि देश के लाखों परिवार गुरु पूर्णिमा पर संघ में जाकर अपने सामर्थ्य के अनुसार गुरु प्रणामी भेंट करते हैं। किसी न किसी अंश में यह घटना संघ के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में सन्निहित नैतिकता के दर्शन और उपादेयता पर प्रश्न उठाती है। सनातनी हिन्दुओं के मन में विक्षोभ का बवंडर घूम रहा है। एक ओर अपेक्षाभंग का दंश है तो दूसरी तरफ प्रकट और गुप्त विद्वेष रखने वाले लोगों का कुप्रचार है। ऐसी जटिल स्थिति में कोई सीधी-सपाट, मनलुभावनी तर्कणा सम्भव नहीं। अस्तु, यहाँ स्थिति और चुनौतियों को समग्रता में समझते हैं।

मर्मज्ञ इतिहासकार सीताराम गोयल ने शायद सत्तर-अस्सी के दशक में कहा था, “कांग्रेस समय के साथ मुस्लिम लीग बन जाएगी। जबकि भाजपा अगली कांग्रेस।” तब उनके समसामयिक हिन्दुओं ने स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा कि यह कथन कभी ऐसे सच होगा। सनातन धर्म के शिखरपुरुष करपात्री महाराज ने भी साठ के दशक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिन्दुत्त्व को कुछ निश्चित आधारों पर सनातन धर्म विरोधी सिद्ध किया था। उस पर भी अभी कोई सार्थक प्रतिवाद नहीं आया है। हाँ, संघ-परिवार प्रणित हिन्दुत्व सत्ता के केन्द्र में जरूर है। इस दोनों टिप्पणियों को पासंग में रखकर उसके आलोक में भारतीय समाज को देखें तो स्पष्ट है कि सनातन सभ्यता के सामने चुनौती सांस्कृतिक मूल्य, नीति-दर्शन और पहचान की अवधारणा के स्तर की है। जब तक हम उसे नहीं समझते, राजनीतिक हिन्दुत्व उपयोगी नहीं होगा।

भारतीय जनता पार्टी आज विकास के सोपान से बढ़कर उत्कर्ष के महल में स्थापित दिखती है। यानि जीवन चक्र में विकास, पठार या परिपक्वता और फिर गिरावट के जो तीन चरण होते हैं, उसमें पठार जैसी स्थिति में। बिहार में सत्ता परिवर्तन के बाद बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को शिकस्त देकर उसने सत्ता का वह आत्मविश्वास हासिल कर लिया है, जो हमें इन्दिरा गाँधी के बाद की कांग्रेस में देखने में आता था। सत्ता की लाचारी कहें या आकर्षण, लेकिन असम्यक समीकरण की गलबाहियाें से जो विजातीयता आती है, उससे होने वाला संक्रमक सांकर्य समाज का बल क्षीण कर ही देता है। सत्ता के सम्मोहन और उससे तमाम जुड़ी गतिविधियों में सनातनी समाज मूल उत्स, दायित्त्व और स्वभाव को विस्मृत कर बैठा है और बेखौफ हाेकर शत्रुगत आत्मघाती विचारों को गले लगाता है।

इसके एक-दो उदाहरण दृष्टव्य हैं। अभी कुछ ही दिन हुए हैं, जब इतिहास के जानकार गौतम खट्टर ने यूट्यूब पर एक वीडियो डाता। इसमें उन्होंने गोवा में सैकड़ों हिन्दुओं के नरसंहार और हजारों हिन्दूजनों का धर्मान्तरण कराने के लिए जिम्मेदार पादरी फ्रांसिस की कारस्तानियों का जिक्र किया। इसके बाद समूचा सरकारी-अदालती तंत्र उनके पीछे पड़ गया। पहले उनके निरपराध भाई को गिरफ्तार कर पीड़ित किया गया। फिर गौतम पर दबाव बनाकर उन्हें भी गिरफ्तार किया गया। और यह सब तब जबकि गोवा में ‘हिन्दुत्ववादी दल’ की सरकार है!  दूसरा उदाहरण, सरकार के दलितवादी प्रचार-हथकण्डे की विषाक्त दलीलों पर मौन का लें!  इतना भर नहीं, वह अन्य पिछड़ा वर्ग की प्रताड़ना और शोषण का गल्प स्थापित कर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों के जरिए नया दलित वर्ग खड़ा करने को भी तत्पर थी।

ऐसा कर के सरकार किस हिन्दु एकता को साधना चाहती थी, यह समझना ब्रह्माजी के लिए भी आसान नहीं। हाँ, कुछ राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इसके माध्यम से भाजपा तथाकथित दलित और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं को जरूर साधना चाहती है। यदि यह सत्य है, तो यह भयावह है, लेकिन अप्रत्याशित नहीं। पूरे कुओं में भाँग नहीं, अब मदिरा पड़ी हुई है, ऐसा कह सकते हैं। इतना ही नहीं, हम अपने आस-पास बड़ी संख्या में खुल रही मधुशालाओं को देखें। वहाँ नशे के लिए गिरते पड़ते युवा, अधेड़ों के हुजूम को देखें। फिर पूछें कि हिन्दुत्त्ववादी सरकार क्या युवाओं को शराबनोशी कराते हुए देश को विश्व गुरु बनाएगी? सो, विचारणीय प्रश्न है कि इस बौद्धिक खोखलेपन, दाेहरेपन की जड़ें कहाँ हैं? हिन्दुत्व के राजनीतिक, सामाजिक सरमाएदार संगठन–दल विऔपनिवेशिकरण लाने की कितनी काबिलियत रखते हैं? सनातन समाज खरे अर्थों में कैसे इन दुष्प्रभावों से मुक्त हो सकता है?

यह तथ्य सर्वज्ञात और बहुश्रुत है कि उपनिवेशी संस्कृति स्थानीय समाज में बौद्धिक ठहराव, खोखलापन और दोहरापन लाता है। भारत तो भिन्न-भिन्न कौमों से सुदीर्घ काल तक पददलित रहा है। इसका प्रभाव कुछ इस कदर रहा है कि हमारा अपना धर्म-नीति-संस्कृति का तंत्र ही छितर-बितर हो गया है। हम इतिहास के नाम पर औपनिवेशिक सत्ता और उसके प्रभाव में रचे गए आख्यानों को पढ़ते और समझते हैं। जबकि भारत की स्थिति तो अद्वितीय है, यह सुदीर्घ काल तक विदेशी सत्ताओं के प्रभाव में परतंत्र किन्तु जीवित रहा। इसकी आत्मा बची रही और बहुसंख्यक लोग जैसे-तैसे रूप में अपने धर्म-संस्कृति को अपनाए रहे। यहाँ बहुसंख्यक या पूर्ण मतांतरण नहीं हो पाया।

इस स्थिति में हमें इतिहास लेखन की एक नई विधा अपनाने की जरूरत है। ऐसा इतिहास, जिसमें स्थानीय पारम्परिक देसी स्रोतों से उपलब्ध तथ्य,जानकारी और सांस्कृतिक चिह्नों के आधार पर मुख्यधारा बनें। फिर इसके सन्दर्भ में उपनिवेशी सत्ता की हरकतों और गतिविधियाें काे दर्ज किया जाए। अपने स्वत्त्व को स्वीकार कर उसके हितदृष्टि से तमाम अनसुलझे मुद्दे हल किए जाएँ। नि:सन्देह यह इतिहास लेखन प्रचलित औपनिवेशिकोत्तर इतिहास लेखन पर प्रतिघात होगा। इससे उन सभी गड्‌डमड्ड विचारों से छुटकारा मिलेगा, जिनके सहारे उपनिवेशी विचार जीवित है। इससे मिलने वाली अंतरदृष्टि ही उपनिवेशी प्रभाव को निष्प्रभ कर सकती है।

लेकिन वर्तमान में हिन्दुत्ववादी सरकार विनौपनिवेशीकरण की जो रीति अपना रही है, वह औपनिवेशिक प्रभाव के अंतर्गत ही है। यो समझें कि नाली का पानी है और कीचड़ के दाग धोने की कवायद है। दरअसल, औपनिवेशिकता अपने साथ जो संकरित अब्राहिमी विचारधारा लाई, उससे भारत में दो तरह की प्रतिक्रियाएँ उठी। एक थी, संस्कृतिकरण और दूसरी, विसंस्कृतिकरण। संस्कृतिकरण पर बहुत कुछ पढ़ा-लिखा गया है। इसके तहत हिन्दू धर्म को हिन्दुओं ने ही औपनिवेशिक मजहब के खाँचे में देखना शुरू किया। शास्त्रीय ज्ञान परम्परा, संस्कृत, वर्णाश्रम व्यवस्था, शास्त्र-दर्शन को भी एकेश्वरवादी अब्राहिमी अनुभवों की चौखट में समझने का प्रयास हुआ। लेकिन फिर भी इनमें स्थानीय परम्परा के प्रति सहानुभूति और संवेदना का स्वर था। अधिकांश आधुनिक शिक्षा प्राप्त हिन्दुत्ववादी तबका इसी विचारधारा से आता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भी इसी प्रभाव के अंतर्गत अस्तित्व में आया है।

लोगों को यह आश्चर्यजनक लग सकता है, किन्तु वेद-प्रामाण्य और वर्णाश्रम धर्म के प्रति संघ के विचार जैन-बौद्धादि नास्तिक मत के समान है। धर्म में सुधार की भूमिका लेकर चला संघ अपने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के साथ सत्ता के केन्द्र में है। मार्मिक सवाल यह है कि अब जबकि सत्ता संघ के शिष्यों के हाथ में है, वह नैतिक और राजनीतिक स्तर पर समाज में क्या सुधार ला पाया? संघ ने परम्परा में जो मनमुखीपन से बदलाव किए हैं, वह नितांत असम्यक् सिद्ध हो रहे हैं। सनातनधर्म के मर्मज्ञ विद्वान करपात्री महाराज ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सबसे प्रभावशाली प्रमुखों में से एक रहे गुरु गोलवलकर (माधव सदाशिव गोलवलकर) के समय ही संघ प्रणीत हिन्दुत्व का विरोध इसी धर्मरहित सांस्कृतिकता या भौगोलिकता के आधार पर किया था, जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की नींव है। यथार्थ परम्परावादी सनातनी हिन्दू चाहे वह द्विज हो या अंत्यज आधुनिक जीवन शैली में असहज रहे हैं। अपने स्तर पर अपनी धर्म-परम्परा को जीकर उसकी रक्षा करते हैं। उनकी जो पीढ़ियाँ पारम्परिक शिक्षा व्यवसाय आदि में रही हैं, वो आज भी अभाव, तिरस्कार सह रही हैं।

औपनिवेशिक प्रभाव की दूसरी प्रतिक्रिया विसंस्कृतिकरण की थी, जो ब्रितानी औपनिवेशिक और परवर्तीकाल की सत्ता की भाषा में स्थापित हो गई। यह मूलत: भारतद्वेषी सूफी, मिशनरी विचार से आती है। यह बहुत ताकतवर अदृश्य और वैश्विकता से जुड़ी हुई है। संस्कृतिकरण के विपरित यहाँ का हिन्दू सुधारवादी प्रगतिशील खेमा संस्कृति-धर्म-दर्शन को ही समस्या की जड़ समझता था। इस खेमे के किरदारों ने मिशनरी और वामपंथी साहित्य में वर्णित दमन के गल्पों का उपयोग सत्ता में अपने समुदायों की भागीदारी बढ़ाने के लिए किया। ये औपनिवेशिक लूट में सहभाग चाहने वाला वर्ग था। ध्यान देने की बात यह है कि औपनिवेशिक ब्रिटिश सत्ता के साथ सामंजस्य बनाने वाले अंग्रेजी विश्वविद्यालयों में पढ़े लिखे ज्यादातर लोग जिस संविधान सभा के सदस्य थे, उसमें संस्कृतिकरण और विसंस्कृतिकरण दोनों से प्रभावित वर्गों का प्रतिनिधत्त्व था। उन लोगों के जरिए ब्रितानवी सत्ता की निगाहबानी मेें बना संविधान वास्तव में इन वर्गों के बीच समझौते का मसविदा था। अपेक्षा थी कि साथ रह कर लोग एकात्मकता ढूँढ लेंगे। लेकिन वास्तव में वह ऐतिहासिक परिस्थितिजन्य अपरिहार्य समझौता था, जिससे कोई संतुष्ट नहीं था। शायद इसीलिए उसी संविधान सभा के प्रमुख रहे भीमराव आम्बेडकर आगे चलकर संविधान को कूड़े में फेंकने की बात करने लगे थे।

तो औपनिवेशिक काल से ही परिवेश में संस्कृतिकरण और विसंस्कृतिकरण के प्रवाहों झंझावात था। वामपंथ को अंगीकार कर बने दक्षिणी ब्राह्मण मुक्तिबोध का एक भेदक सवाल रहता, “पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?” यह सवाल आज के किसी प्रामाणिक दलितवादी या धर्मनिरपेक्ष चिंतक से पूछे, तो उसका जवाब होगा- विसंस्कृतिकरण। किसी प्रामाणिक हिन्दुत्ववादी विचारक से यही सवाल पूछने पर जवाब मिलेगा– संस्कृतिकरण। यानी संघ का संस्कृतिकरण ठीक-ठीक कांग्रेस और दलितापंथियों के विसंस्कृतिकरण का विलाेम छोर है।

साफ है कि मौजूदा चौखट में हिन्दुत्व विचार विऔपनिवेशीकरण करने के लिए आवश्यक योग्यता, सामर्थ्य और प्रतिबद्धता से रहित है। यद्यपि हम में से कई लोग संघ को समर्पित ऐसे कई लोगों को जानते होंगे, जिन्होंने सनातन धर्म के संगठन-सुरक्षा के लिए पूर्वोत्तर, दक्षिण और अन्दरुनी स्थानों पर असाधारण त्याग, तितिक्षा और कर्त्तव्यबोध से कार्य किया है। आज भी कर रहे है। लेकिन यहाँ हमें महान तपस्वी और विद्वान करपात्री जी की ‘धर्म को जड़ों से पोषित करने की अंतर्दृष्टि’ को समझना होगा। मूल प्रश्न है कि कैसे सनातन नीति और आचार समाज में स्थापित होते हैं?

प्रस्तुत घटनाक्रम पर विचार करें तो यह सवाल उठता ही है कि श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर प्रशासन में ऐसे कमजोर लोग लग कैसे गए? लग गए तो व्यवस्था ने उनका कदाचरण पकड़ा क्यों नहीं? यह भ्रष्टाचार है, या फिर नाकारापन। दोनों ही अक्षम्य है। और मजे की बात यह है कि कठोर दिखावटी कार्रवाई के तहत अब भाजपा सरकार मन्दिर प्रशासन में उस अफसरशाही या न्यायपालिका से कुछ अच्छे नाम वाले किरदारों को बैठा देगी, जो सर्वश्रेष्ठ परिस्थिति में धार्मिक प्रतिबद्धतारहित निखालिस पेशेवर होंगे। ऐसे लोगों का क्या ऐतबार?

समझने की बात है कि यह कोई देश का पहला मामला नहीं है, जहाँ देवों की अमानत में खयानत हुई है। तिरुपति देवस्थानम बोर्ड, महाकालेश्वर मन्दिर, पद्मानाभ स्वामी देवस्थान आदि में कानून सम्मत भ्रष्टाचार के मामले उठते हैं और दब जाते हैं। तमिलनाडु में तो धर्मस्व विभाग के अधिकारी ही मन्दिरों की सम्पत्ति, मूर्तियाँ और देवविग्रहों की तस्करी में लिप्त पाए गए हैं। इससे स्पष्ट है कि जहाँ धार्मिक-नैतिक प्रतिबद्धता की आ वश्यकता हो, वहाँ पेशेवर प्रतिबद्धता निष्फल ही साबित होगी। यही कारण है कि मन्दिरों के गैरसरकारीकरण, तीर्थस्थलों को गैरव्यवसायीकरण या फिर अंधाधुंध विकास-खनन से प्रकृति पर्यावरण का संरक्षण हिन्दुत्ववादियों की प्राथमिकता नहीं बनता। 

भारतीय जनता पक्ष को सनातनियों का वोट किसी अन्य दल को मिलने वाले मत की तरह नहीं है। यह विकास या मीनमेखवाले परिवर्तनों के लिए नहीं मिला है। उसे ऐतिहासिक जनादेश साभ्यतिक दोषों के निवारण के लिए मिला है। उसे उन परम्परावादियों की समालोचना को गम्भीरता और सकारात्मकता से लेने की जरूरत है, जो राजनीति, सत्ता और प्रचार-प्रसार से दूर धर्म-संस्कृति की रक्षा और सेवा में रत है। भाजपा जब-तब संविधान–संविधान का खेल चालू कर देती है, या चुनावी जीत के प्रबंधन के सनातन समाज के विघटन की नीतियाँ अपनाती है, तो इनसे वह सीताराम गोयल की चेतावनी को ही पुख्ता करती है। इसीलिए कहा जा सकता है कि अब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की फिर से समीक्षा करने का सही समय आ गया है। यदि वह यथार्थ में आस्तिकता और धर्म को अंगीकार नहीं करता, तो आने वाले समय में उसके सामने संकटों का अंबार लगना भी तय है। 

—-

(नोट : समीर #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सुधी-सदस्यों में से एक हैं। भोपाल, मध्य प्रदेश में नौकरी करते हैं। उज्जैन के रहने वाले हैं। पढ़ने, लिखने में स्वाभाविक रुचि हैं। वैचारिक लेखों के साथ कभी-कभी उतनी ही विचारशील कविताएँ लिखते हैं। डायरी के पन्नों पर लगातार उपस्थिति दर्ज़ कराते हैं। सनातन धर्म, संस्कृति, परम्परा तथा वैश्विक मसलों पर अक्सर श्रृंखलाबद्ध लेख भी लिखते हैं।) 

—– 

समीर के पिछले 10 लेख 

25 – जब विश्वशक्तियाँ ऊर्जा के लिए युद्ध लड़ें, भारत इसी मकसद से खेतों की ओर लौटे
24 – चाल-कुचालों के बीच क्या जातियों-समाजों का आपसी अनुबंध सनातन को बचा सकता है?
23 – क्या हम आज जो ‘धर्माचरण’ कर रहे हैं, उससे अधर्म की अभिवृद्धि हो रही है?
22 -क्या नव-हिन्दुत्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए अस्तित्त्व की चुनौती है? 
21 – धुरंधर : तमाम अस्वीकरण के बावजूद साफगोई से अपनी बात कहने वाली फिल्म!
20 – वैश्विक अर्थव्यवस्था के दुष्चक्र में फँसा भारत इससे बाहर कैसे निकल सकता है?
19- भारत के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई सेवानिवृत्त हो रहे हैं, मगर सवाल छोड़ जा रहे हैं
18 – क्या डोनाल्ड ट्रम्प एक ‘विदूषक’ और अमेरिकी सत्ता ‘प्रहसन’ बन गई है?
17- भारत पर अमेरिका का 50 फीसद सीमा शुल्क भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद कैसे? 
16- विवाह के योग्य न रह जाना भारतीय समाज में आज आम प्रचलित बात कैसे हो गई? 

सोशल मीडिया पर शेयर करें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *