Rishabh Khaneja, IIT Fail

जिन्हें सच्ची खुशी की तलाश, वे आईआईटी प्रवेश परीक्षा में जानबूझकर फेल भी हो जाते हैं!

टीम डायरी

जिन्दगी अपनी है, चुनाव भी अपने ही होते हैं। ऐसा अक्सर कहा जाता है। लेकिन सही मायने में ऐसा होता नहीं है। ज्यादातर मामलों में बच्चों का मानस बचपन से ऐसा बना दिया जाता है कि वे दूसरों की देखा-देखी अपनी आगे की राह तय करने लगते हैं। जैसे- माता-पिता चिकित्सक या अभियंता हैं, तो वे भी वही पेशा अपनाएँगे। दुकानदार हैं, कारोबार करते हैं, तो उनके बच्चे भी उसी रास्ते पर आगे बढ़ जाते हैं। कभी-कभी तयशुदा पेशों से अलग हटकर बच्चों को आगे ले जाने की बात होती है, तो वह भी ले-देकर घिसी-पिटी लकीर पर चलने जैसी ही कवायद बनकर रह जाती है। कारण कि ज्यादातर माता-पिता दूसरे बच्चों की देख-सुनकर, उनके बारे में जान-समझकर तय करते हैं कि बच्चा या अभियंता बनेगा। किसी अच्छे प्रौद्योगिकी महाविद्यालय से पढ़कर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में नौकरी करेगा। या फिर चिकित्सक बन जाएगा। प्रबंधन का क्षेत्र भी है। बस, ऐसा एकाध और।

खुद सोचकर देखिए, ऐसा नहीं होता है क्या? कितने माता-पिता हैं, जो बच्चों को यह गुंजाइश देते होंगे कि ठीक है, तुम अपने शौक को पेशा बनाओ? जिसमें तुम्हें खुशी मिलती हो, वह काम करो? शायद दो-पाँच प्रतिशत। और बताइए, बच्चे कितने ऐसे होते हैं, जो अपने जीवन की सच्ची खुशी को पहचान लेते हैं और फिर उसे पाने के लिए हौसले से भरा कदम उठाते हैं? अधिक से अधक एकाध प्रतिशत, इतना ही न। अलबत्ता यही वे लोग होते हैं असल में, जो जीवन की सच्ची खुशी की कीमत जानते हैं। देश में तेजी से पहचान बना रहे ऋषभ खनेजा ऐसे ही लोगों में शामिल हैं। वह रचनात्मक शिक्षाविद् हैं। अच्छे छायाचित्रकार हैं और लेखन में भी पूरी महारत के साथ अपना हाथ आजमाते हैं। इन तीनों रूपों ने ही मिलकर उनकी अलग पहचान गढ़ दी है। उन्हें वह खुशी दी है, जिसकी उन्हें हमेशा से तलाश थी। यकीनन हर किसी को रहती है, लेकिन हर कोई उस खुशी को हासिल करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। मन मसोसकर दीगर काम करता है। हालाँकि, ऋषभ ने ऐसा विकल्प नहीं चुना अपने लिए।

एक हालिया साक्षात्कार के दौरान उन्होंने खुलासा किया, “मैं अपने घर में सबसे बड़ा हूँ। इसीलिए जैसा अमूमन हम सबके घरों में होता है, छोटी उम्र में ही मेरा भविष्य तय कर दिया गया था। विद्यालय में विज्ञान की पढ़ाई करना। फिर अभियांत्रिकी का अध्ययन, या प्रबंधन का और फिर किसी बड़ी कम्पनी में नौकरी। अधिकांश चूँकि यही रास्ता चुनते हैं और इसके लिए उनकी प्रशंसा भी होती है। यहाँ तक कि हम जैसे लोगों के परिवारों में जब कोई समारोह होते हैं, तो उनमें भी ज्यादातर लोग यही बातें करते हैं कि फलाँ का लड़का या लड़की उस बड़ी कम्पनी में नौकरी में लग गया। फलाँ का बच्चा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) की परीक्षा में पास हो गया। फलाँ की औलाद तो विदेश में है। उसका इतने लाख या करोड़ का वेतन है, आदि। लेकिन जब मैं बड़ा हुआ और इस तरह के ‘सफल कहलाने वाले’ लोगों से मिला, तो मैंने पाया कि उनमें अधिकतर लोग नाखुश हैं। वे सब जीवन में कुछ और करना चाहते थे, लेकिन कर नहीं पाए। परिवार के दबाव में उन्होंने रास्ता चुना और अब जिन्दगीभर का तनाव झेल रहे हैं। तब मैंने सोचा कि मैं आखिर ऐसा क्यों करूँ? लिहाजा मैंने अपना रास्ता चुना,अलग।”

ऋषभ आगे बताते हैं, “माता-पिता की इच्छा के मुताबिक, मैं आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में बैठा। उसके लिए मैंने पूरी तैयारी भी की। जब परीक्षा के समय प्रश्न-पत्र मेरे सामने आया, तो मुझे ज्यादातर सवालों का जवाब पता था। इतना कि मैं आराम से उत्तीर्ण हो सकता था। लेकिन तब शायद खुशी के इम्तिहान में विफल हो जाता। इसलिए मैंने परीक्षा के दौरान जानबूझकर अधिकांश सवालों के जवाब गलत लिख दिए। मैं अनुत्तीर्ण हो गया। इसके बाद मैंने मुम्बई के मिठीबाई महाविद्यालय से कला संकाय में पढ़ाई की। उस समय ज्यादातर लोग यही सोचते थे कि मैंने अपना भविष्य बर्बाद कर दिया। लेकिन मैं अपना काम करता रहा। मैं अध्ययन-अध्यापन के एक बड़े काम से जुड़ा। कुछ समय बाद उसे छोड़ा तो करीब तीन महीने के लिए मोटरसाइकिल पर घूमने निकल गया और जिन्दगी के तमाम पहलू खँगाले। आज मैं लेखक हूँ, छायाचित्रकार हूँ, कलाकार हूँ, लोगों को उनकी रचनात्मकता के साथ जोड़ने में मदद करता हूँ और सबसे बड़ी बात कि जीवन से, अपने काम से पूरी तरह खुश हूँ। मेरे माता-पिता भी तो यही चाहते थे आखिर। जाहिर तौर पर वे भी आज मेरे वर्तमान से खुश और सन्तुष्ट हैं।”

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