संक्रान्ति : 56 भाेग तो ठीक, पर बेटी-दामाद को परोसे 130 या 465 भोग का क्या माजरा है?

नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश

परम्पराएँ हैं, मज़ाक नहीं हैं। हिन्दुस्तान में हर परम्परा अपने आप में गहरा अर्थ समेटे होती है। भले उनमें आधुनिकता की थोड़ी सी छोंक लग गई हो। अलबत्ता, तथाकथित ‘सोशल मीडिया’ और आधुनिक ‘जल्दबाज़ मीडिया’ को परम्परा में छिपे अर्थों को जानने या बताने से मतलब नहीं होता। बल्कि उसे सिर्फ़ लगाई गई ‘छोंक या तड़के’ से ताल्लुक़ होता है। उससे ही उसका काम चलता है। इससे ज़्यादा उसे कोई ज़रूरत होती नहीं। 

उदाहरण मकर संक्रान्ति के मौक़े पर आई दो ख़बरों का ही लिया जा सकता है। इसमें एक ख़बर पुड्‌डुचेरी के यनम की बताई गई। वहाँ के एक व्यापारी एम. सत्यभास्कर ने अपने नए-नवेले दामाद और बेटी की ख़ातिरदारी में उनके सामने 465 प्रकार के व्यंजन परोस दिए। सत्यभास्कर की बेटी हरिण्या की शादी पिछले साल विजयवाड़ा, आन्ध्रप्रदेश के एक कारोबारी के बेटे साकेत से हुई थी। संक्रान्ति पर बेटी पति के साथ मायके आई तो उन दोनों का ऐसा भव्य स्वागत हुआ कि साकेत अपनी भावनाओं पर क़ाबू न रख सके। उनके आँसू निकल पड़े। 

इसी तरह की दूसरी ख़बर हैदराबाद, तेलंगाना से। यहाँ से कुछ ही दूरी पर रंगा रेड्‌डी जिले में एक रिहाइश है सरूर नगर। वहाँ भी संक्रान्ति पर पहली बार घर आए बेटी-दामाद को 130 तरह के व्यंजन परोसे गए। कंतरी और कल्पना की बड़ी बेटी की शादी चार महीने पहले ही काकीनाड़ा में रहने वाले मल्लिकार्जुन से हुई है। हालाँकि, ये पहले अवसर नहीं हैं, जब बेटी-दामाद का इतने व्यंजनों से स्वागत किया गया हो। बताते हैं कि पिछले साल संक्रान्ति पर ऐलुरु, आन्ध्र प्रदेश के एक दंपति ने अपने बेटी-दामाद को 379 तरह के व्यंजन परोसे थे। 

तो, ये हुई उस ‘तड़के’ की बात, जो परम्पराओं में आधुनिकता ने लगाया है। तथाकथित ‘सोशल मीडिया’ और आधुनिक ‘जल्दबाज़ मीडिया’ के अधिकांश मंचों का इतने से काम चल जाता है। उनके पास इतना समय ही नहीं होता कि वे इन परम्पराओं के पीछे छिपे गहरे अर्थों को जानें, समझें और समझाएँ। अलबत्ता, #अपनीडिजिटलडायरी जैसे कुछ चुनिन्दा मंच हैं, जो अपने ‘सरोकार’ की वज़ह से थोड़ा अतिरिक्त प्रयास करते हैं। और प्रयास करने पर ऐसी अद्भुत जानकारियाँ मिलती हैं कि भारत के सांस्कृतिक ताने-बाने की सुन्दर तस्वीर खुल जाती है। 

मसलन, तमाम व्यंजन परोसकर बेटी-दामाद की आवभगत करने की परम्परा। दक्षिण भारत के आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और पुड्‌डुचेरी में प्रचलित यह परम्परा काफ़ी-कुछ उत्तर भारत की गिरिराज गोवर्धन पूजा से मिलती-जुलती है। उत्तर भारत में विशेष रूप से, ब्रज क्षेत्र में, जिस तरह दीवाली के बाद गोवर्धन पूजा की जाती है। उसी तरह, दक्षिण भारत के उक्त राज्यों में साल के सबसे बड़े त्यौहार ‘पोंगल’ पर पूजा-अर्चना होती है। समाजसेवी नन्दिता पाठक इस बारे में विस्तार से बताती हैं। वह मूल रूप से आन्ध्र प्रदेश से ताल्लुक़ रखती हैं। 

उनके मुताबिक, “भारत की ग्राम और कृषि आधारित संस्कृति का सौन्दर्यबोध (सुन्दरता के अवलोकन-विवेचन से पैदा होने वाला ज्ञानानुभव) प्रस्तुत करता है हमारा पोंगल का त्योहार। वैसे ही जैसे, अन्य नामों से देश के अन्यत्र स्थानों में इसी तरह के त्योहार मनाए जाते हैं। इसकी तैयारी हमारे यहाँ महीनेभर पहले से शुरू हो जाती है। सबसे पहले हम गोबर से उपले आदि बनाकर रखते हैं। फिर सात दिनों तक घरों के मुख्य द्वार पर विभिन्न रंगोली, आदि बनाते हैं। इन रंगोलियों में ख़ास सन्देश छिपा होता है। जैसे- पोंगल से पूर्व के दिनों में हम रंगोली से खुला हुआ द्वार बनाते हैं। इस तरह भगवान से हम आग्रह करते हैं कि वे अतिथि रूप में हमारे घर पधारें। जबकि बाद वाले दिन में बन्द द्वार वाली रंगोलियाँ बनाते हैं। उनके जरिए भगवान से उनके धाम पधारने का आग्रह किया जाता है।” 

“पोंगल का त्यौहार वर्तमान में चार दिन चलता है। पहले दिन को ‘भोगी पोंगल’ कहते हैं। इस दिन ताज़ा गोबर से घर मे मुख्य द्वार पर भगवद् विग्रह बनाकर उनका पूजन-अर्चन, श्रंगार- 56 भोग निवेदन, आदि करते है। जैसे, उत्तर भारत में गिरिराज गोवर्धन का विग्रह बनाकर उनका पूजन, आदि किया जाता है। अर्थात् भगवान आपके घर पधार चुके हैं। इस समय, जिन बेटियों की नई-नई शादी होती है, वे पहले ‘पोंगल’ पर पति के साथ घर आती है। सो, ‘अतिथि देवो भव:’ की भावना से बेटी-दामाद का सत्कार करते है। उन्हें भोग निवेदित करते हैं।

“घर में भगवान आए हैं, तो अबाड़-न्कबाड़ का क्या काम? तो, उसी दिन शाम को गोबर के उपलों के साथ घर में पड़ा अंगड़-खंगड़ भी जलाकर रोशनी करते हैं। जैसे, होलिका दहन, लोहड़ी आदि में होता है। फिर सब प्रसाद पाते हैं। दूसरा दिन ‘थाई पोंगल’ का होता है, सूर्य पूजा की जाती है। इसी दिन, देश में अन्य जगहों पर संक्रान्ति मनाई जाती हैं। तीसरा दिन ‘मट्‌टु पोंगल’ कहलाता है। इस दिन गाय-बैल, बछड़े-बछड़ियों की पूजा की जाती है। ठीक उसी तरह, जैसे गोवत्स द्वादशी पर उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में होती है। फिर आख़िर में, जैसे होली के अगले दिन भाई दूज मनाई जाती है, उसी तरह ‘कनुम पोंगल’ पर बहनें अपने भाइयों के मंगल की कामना करती हैं।”  

“तो इस तरह पोंगल का यह एक त्यौहार देश के अन्य क्षेत्रों में मनाए जाने वाले चार त्यौहारों- गोवर्धन पूजा, होली, गोवत्स द्वादशी और भाई दूज के साथ साम्य लेकर चलता है। पोंगल पर वर्षा के देवता देवराज इन्द्र की पूजा करने का भी विधान है, जिसके आस-पास भगवान कृष्ण द्वारा गिरिराज गोवर्धन की पूजा कराने, इन्द्र के कोप से गोकुलवासियों को बचाने के लिए गोवर्धन उठाने की कहानी वर्णित है। याद रखें कि श्रीकृष्ण ने गोवर्धन को सात दिन तक अपने सीधे हाथ की छोटी अँगुली पर उठाए रखा था। पोंगल के सात दिन हमें वह भी याद दिलाते हैं।” 

यानि इस जानकारी का मतलब क्या? यही कि थोड़े प्रयास करने चाहिए। प्रयास करने से भारतीय संस्कृति से जुड़ी ऐसी अद्भुत जानकारियाँ मिलेंगी, जिनमें एक अंचल की दूसरे के साथ समानताएँ पता चलेंगी। ऐसे प्रयासों से उन सभी लोगाें को उपयुक्त उत्तर भी मिलेगा, जो क्षेत्र, भाषा, संस्कृति, आदि के आधार पर भारतीय समाज में भेदभाव के बीज बोने की कोशिश करते हैं। उत्तरायण पर इस उत्तर से बेहतर और क्या हो सकता है?

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