नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश
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यह बहुत महत्त्वपूर्ण प्रश्न है, खुद मेरे और सभी सुनने वालों के लिए भी कि हम सबके प्रिय ठाकुर जी श्री भगवान कृष्ण ने मेरे जैसे अतिसामान्य व्यक्ति को भक्तमाल सरीखे महान् ग्रंथ की सेवा में कैसे लगाया और क्यों? क्योंकि जितना मुझे याद है, मैंने अपने इस जीवन में तो कोई ऐसा सत्कर्म किया नहीं कि मुझे ठाकुर जी अपनी कृपा का पात्र समझें। या वह अपनी और अपने भक्तों की कथा के प्रसार के लिए मुझे चुनें। तो फिर? इसका जवाब सिर्फ यह हो सकता है कि शायद पिछले जन्मों के किसी पुण्यकर्म का फल अब सामने आया हो, इसलिए यह संभव हो रहा है। पर हाँ, इस प्रश्न का उत्तर जरूर है मेरे पास कि ठाकुर जी ने कैसे मुझे भक्तमाल की सेवा में लगाया? मुझे यहाँ तक लाने का उनका तरीका कैसा था? मेरे अपने अनुभव से जुड़े इस प्रश्न का जवाब जानना सबके काम का हो सकता है क्योंकि इससे यह भी स्पष्ट होता है कि भगवान कैसे अपने सेवकों को सही रास्ते पर लाते हैं? कैसे कोई उनका थोड़ा सा भी चिंतन करे तो उसे पूरा थाम लेते हैं? और कैसे कोई उनकी तरफ सिर्फ एक कदम बढ़ाए, भले अनजाने में, तो उसकी ओर खिंच आते हैं?
बात उन दिनों की है, जब मैं स्कूल में पढ़ता था। शायद आठवीं या नौवीं में। मेरे हिन्दी के शिक्षक ने एक दिन मुझसे पूछ लिया, “नीलेश, तुम्हें अपने नाम का मतलब पता है?”, मैंने कहा, “हाँ, पता है”। तो वह बोले, “बताओ जरा”। तब मैंने हिन्दी की समास विग्रह वाली शैली में उन्हें अपने नाम का अर्थ बताया, “नील वर्ण वाले ईश हैं जो, वह नीलेश”। जाहिर तौर पर उत्तर सुनकर मेरे शिक्षक खुश हो गए। लेकिन वहीं से मेरे दिमाग में अपने नाम का वह अर्थ हमेशा के लिए अटक गया। क्योंकि मुझे एहसास हुआ कि यह नाम तो स्वयं भगवान श्री विष्णु, श्री राम और श्री कृष्ण का है। मेरे माता-पिता के माध्यम से भगवान ने अपना यह नाम मुझे दिया है, तो मैं ऐसा कोई काम क्यों करूँ कि उसकी अवमानना हो? हालाँकि, हमेशा ऐसा हो नहीं पाया। भावनाओं के आवेश और संगति के प्रभाव में कई बार ऐसा हुआ कि मैंने किसी गलत काम को करने की दिशा एकाध कदम तो बढ़ा ही दिया, लेकिन फिर तुरंत चार कदम पीछे भी आ जाता था। ऐसे ही अधरझूल में जिंदगी चल रही थी कि फिर ठाकुर जी ने विभिन्न रूपों में अपनी योगमाया को मेरे जीवन में भेजना शुरू कर दिया। मुझे उनकी सेवा-पूजा में लगाया। इससे धीरे-धीरे योगमाया में मेरा मन लगने लगा। उन्होंने जीवन में मुझे कई ऐसे प्रत्यक्ष अनुभव कराए कि मैंने उन्हें अपना आध्यात्मिक गुरू, मार्गदर्शक, रक्षक, सब मान लिया।
इस तरह विष्णुमाया में मेरी श्रद्धा हुई ही थी कि ठाकुर जी ने अपनी मुरली मेरे हाथ में थमा दी। यह साल 2011 की बात है। मुरली के प्रति मेरा आकर्षण किशोर उम्र से था। लेकिन वह मेरे हाथ में आई तब, जब मैं 37 साल का हो रहा था। अब फिर मेरे दिमाग में वही सवाल कि इस उम्र में ठाकुर जी ने यह मुरली मेरे हाथ में क्यों थमाई? इतनी उम्र के बाद तो मैं पूर्णकालिक संगीतकार भी शायद ही बन सकूँ! पर चूँकि इस समय तक विष्णुमाया की थोड़ी-थोड़ी कृपा होने लगी थी मुझ पर, इसलिए मैंने इस घटनाक्रम को उन्हीं का संकेत माना और बाँसुरी-वादन का प्रशिक्षण लेने लगा। यह भी सोचा कि अधिक नहीं, तो कभी ठाकुर जी को संगीत सुनाने लायक तो हो ही जाऊँगा। इस तरह यह क्रम शुरू ही हुआ था कि एक रोज पता चला कि भोपाल में श्री मृदुल कृष्ण शास्त्री जी की श्रीमद्भागवत कथा होने वाली है। उनके भजन वगैरा तब काफी लोकप्रिय थे। मैं भी सुना करता था। सो, उसी आकर्षण में एक दिन मैं उनके सत्संग में चला गया।
उस सत्संग में सब कुछ था। ठाकुर जी की लीलाओं का चिंतन, भजन, कीर्तन। लेकिन श्रीमद्भागवत के अधिकांश प्रसंग संक्षेप में कहे-सुने जा रहे थे। लिहाजा, मैंने इस बारे में अपना संशय दूर करने के लिए अपने बचपन के शिक्षक आचार्य श्री प्रदीप जी से एक बार प्रश्न किया। वह खुद कथावाचक हैं। पुरोहित के रूप में भी पूजा-पाठ के लिए उपलब्ध रहते हैं। तब उन्होंने सीधा प्रश्न पूछा, “क्या श्रीमद्भागवत के 18,000 श्लोकों का विस्तार से वर्णन सात दिनों के भीतर तीन-तीन घण्टे के समय के हिसाब से 21 घण्टों में कर पाना व्यावहारिक रूप से संभव है?” उन्होंने बताया, “सात दिनों की कथा जैसे नियम उनके लिए है, जिनके पास किसी कारण से समय की कमी है। नहीं तो ऐसे पौराणिक ग्रंथों का अध्ययन तो धीरे-धीरे पूरे चिंतन-मनन के साथ खुद करना ही श्रेष्ठ माना गया है।” मेरा संशय जाता रहा और फिर उन्हीं के सुझाव पर मैंने पहली बार श्रीमद्भागवत के संक्षिप्त स्वरूप ‘सुख सागर’ का अध्ययन किया। इसके बाद ठाकुर जी की प्रेरणा से श्रीमद्भागवत का पठन, चिंतन, मनन भी हुआ। आगे ऐसे अन्य ग्रंथों के अध्ययन में भी मेरी रुचि बनती गई।
इस दौरान साल 2020 में #अपनीडिजिटलडायरी जैसे मंच की शुरुआत भी ठाकुर जी ने करा दी। उसके शुरू होने के समय से ही मन में ऐसे विचार भी उन्होंने डालने शुरू किए कि चूँकि कहीं, किसी मंच पर बेहद सरल-सहज भाषा और संपूर्ण स्वरूप में हमारे पौराणिक ग्रंथों की कथाएँ उपलब्ध नहीं हैं, तो उस दिशा में हम कुछ कर सकते हैं क्या? ठाकुर जी मुझे मेरे कई साथियों के माध्यम से भी लगातार संकेत कर रहे थे, संदेश दे रहे थे कि चूँकि मेरा झुकाव आध्यात्म की ओर बढ़ रहा है, तो उस दिशा में कुछ करो। लेकिन इतने सारे संकेत, स्पष्ट संदेश और व्यवस्थाओं के बाद भी मन में दुविधा थी कि मैं क्या सचमुच इस लायक हूँ कि पौराणिक ग्रंथों को किसी भी रूप में प्रस्तुत कर सकूँ? इस दुविधा के कारण कुछ और बरस निकल गए। लेकिन देखिए, ठाकुर जी ने हाथ नहीं छोड़ा। उन्होंने गुरु तत्त्व के जरिए प्रोत्साहन दिलाया और आखिरकार अब भक्तमाल ग्रंथ की सेवा के माध्यम से यह काम शुरू हो रहा है। ऐसे हैं, हमारे ठाकुर जी। पिता की तरह बच्चे को अँगुली पकड़कर सही रास्ते पर ले जाने वाले। इसीलिए तो उन्हें परमपिता कहते हैं।
आज के लिए बस इतना ही, श्रृंखला की अगली कड़ी में बात करेंगे, उन गुरु तत्त्व के बारे में जिनका अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन मुझे इस काम के लिए मिला। और फिर उसके बाद अगली कड़ियों से भक्तमाल की कथाओं का क्रम रहेगा….
श्री राधाकृष्णार्पणम् अस्तु…, श्री राधाकृष्णाभ्याम् नम: । सब कुछ श्री राधा और श्री कृष्ण को समर्पित। उन्हें प्रणाम।
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नोट : यह श्रृंखला गीता प्रेस की आधिकारिक पुस्तक ‘श्री भक्तमाल’ में उल्लिखित कथा-प्रसंगों पर आधारित है। इसके प्रकाशन-प्रसारण के पीछे हमारा उद्देश्य सिर्फ इतना है कि गीता प्रेस के ऐसे उच्च स्तर के ऐतिहासिक, पौराणिक महत्त्व के ग्रंथ के प्रचार-प्रसार में #अपनीडिजिटलडायरी की ओर से थोड़ा योगदान हो सके। साथ ही #डायरी से जुड़े पाठकों को इसका लाभ हो। बहुत जल्द हम इसी श्रृंखला को #अपनीडिजिटलडायरी के यूट्यूब चैनल पर भी शुरू करने का इरादा रखते हैं।)
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श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ
