नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश
कहानी सिर्फ सुनना चाहें, तो ऑडियो नीचे दिया गया है, सुन सकते हैं…
श्रृंखला की दूसरी कड़ी में बात निकली थी कि किस तरह ठाकुर जी ने मुझे ‘भक्तमाल’ की सेवा में लगाया। हालाँकि एक पूरी कड़ी में इस बारे में बहुत कुछ बता देने की पूरी कोशिश कर लेने बावजूद मैं ईमानदारी से मानूँगा कि इस संबंध ठाकुर जी की कार्यप्रणाली को एकाध हजार शब्दों में समेटना मेरे लिए संभव नहीं हो पाया। पर ठीक है, जैसी ठाकुर जी की मंशा। सो, अब आगे बढ़ते हैं क्योंकि यहाँ अपना मकसद अपनी बातें कम और भक्त-भगवान की कहानियाँ कहने का अधिक है। तो भगवान के अनन्य भक्तों में ही वर्तमान में एक सिद्ध संत हुए हैं श्री राजेन्द्रदास जी महाराज, जो वृन्दावन में स्थित मलूक पीठ के प्रमुख हैं। मैं सीधे तौर पर महाराज जी से जुड़ा हुआ नहीं हूँ। मेरी कोई दीक्षा, आदि भी नहीं हुई है उनसे। लेकिन फिर भी मैं कहूँगा कि ‘भक्तमाल’ की सेवा के लिए उनका अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन मुझे मिला है। संभवत: किसी न किसी रूप में आशीर्वाद भी हो। यह कैसे संभव हुआ, आज की इस कड़ी में वही कहानी बताता हूँ।
मेरे मित्र हैं समीर शिवाजीराव पाटिल। वह #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना के भी काफी पहले से मेरे साथ जुड़े हैं। अभी सक्रिय रूप से #डायरी पर अपने वैचारिक लेखों के जरिए योगदान भी देते हैं। तो समीर और मैं लगातार इस बात पर विचार कर रहे थे कि #डायरी पर पौराणिक प्रसंगों वाली कोई अच्छी श्रृंखला शुरू की जाए। हमारे पाठकों को इससे काफी लाभ होगा। और हमारा जीवन भी एक सार्थक प्रयास में लग सकेगा। अलबत्ता, हम लोग यह तय नहीं कर पा रहे थे कि किस ग्रंथ से शुरू किया जाए। मेरा मानना था कि श्रीमद्भगवद् गीता, श्रीमद्भागवत पुराण, महाभारत, वाल्मीकि रामायण, जैसे किसी ग्रंथ से कहानियाँ शुरू कर सकते हैं। मगर समीर का कहना था कि इन सभी ग्रंथों पर कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में काम हो चुका है। लिहाजा, इन पर अपनी शैली में हम बाद में भी काम कर सकते हैं। अभी शुरुआत के लिए किसी अन्य ग्रंथ पर विचार करना चाहिए। पर कौन सा? इसका हम दोनों के पास कोई उत्तर नहीं था।
इसी बीच, समीर ने श्री राजेन्द्रदास जी महाराज से गुरु दीक्षा ले ली। मैंने उस समय पहली बार समीर से ही महाराज जी का नाम सुना था। इस तरह समीर सीधे तौर पर और मैं अप्रत्यक्ष रूप से महाराज जी के संपर्क में आए। या ऐसा कहना ज्यादा सही होगा कि उनके संपर्क में ले आए गए। ठाकुर जी हमें उनकी तरफ लेकर गए। और फिर किसी न किसी माध्यम से महाराज जी की शिक्षाओं से दो-चार होने के मौके बनने लगे। इनका असर यह हुआ कि मैं और समीर दोनों इस एक बिन्दु पर आकर ठहर गए कि #डायरी पर पौराणिक ग्रंथों की श्रृंखला की शुरुआत ‘भक्तमाल’ से करनी चाहिए। इस बीच, समीर के सहयोग से ही मैं वाल्मीकि रामायण से जुड़ी एक यूट्यूब श्रृंखला का अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद कर चुका था। करीब एक साल तक वह काम चला और उसने मुझे भरोसा दिया कि ऐसे काम मैं कर सकता हूँ।
मगर कहते हैं न करने-कराने वाले हम-आप कौन? करने वाले तो ठाकुर जी हैं, और कराने वाले भी वही। उन्होंने सब निश्चित कर रखा होता है कि कब, किसको, किस समय, कहाँ-कैसे लगाना है। सो, हम अपनी योजनाएँ ही बनाते रहे, तैयारियाँ करते रहे और समय लगातार निकलता रहा। करीब एक-सवा साल निकल गया। कभी तर्क ये कि साहब, गीता प्रेस के ‘गीतासेवा एप’ पर डिजिटल रूप में जो भक्तमाल ग्रंथ उपलब्ध है, उससे कहानियाँ निकलना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं हो पा रहा है। तो कभी यह दलील कि गीता प्रेस के अलावा जो भक्तमाल के संस्करण हैं, उनकी कथाओं से अपने हिसाब से कहानियाँ निकालने में समय बहुत लगेगा। और इससे जिन कामों से आजीविका चल रही है, उन पर उल्टा असर होगा, आदि। ऐसे कई तर्क-वितर्क दिमाग में थे कि तभी विष्णुमाया ने अपनी भूमिका निभाई और हमें आगे का रास्ता साफ ताैर पर नजर आ गया।
पिछले साल दिसंबर की बात है। मैं वैष्णो देवी यात्रा से लौटते समय दिल्ली के निजामुद्दीन स्टेशन पर भोपाल जाने वाली अगली ट्रेन का इंतजार कर रहा था। ठंड में अक्सर ट्रेनें कई-कई घण्टों की देरी से चलती हैं, तो उसी क्रम में मेरी ट्रेन भी दो-तीन घण्टे की देर से आने वाली थी। अब तब तक क्या करें? तो मैं यूँ ही प्लेटफॉर्म पर घूमते-टहलते किताबों की एक दुकान के पास जा ठहरा। वहाँ आध्यात्मिक किताबें रखी थीं। सो, मैंने यूँ ही दुकानदार से पूछ लिया, “भैया आपके पास गीता प्रेस का भक्तमाल ग्रंथ है क्या?” वैसे, इस सवाल के साथ मुझे उम्मीद नहीं थी कि दुकान वाले का जवाब ‘हाँ’ में होगा। क्योंकि इस तरह के ग्रंथ वैसे ही सहज रूप से हर कहीं उपलब्ध नहीं होते। और फिर आजकल इन ग्रंथों के लेने-पढ़ने वाले भी गिनती के रह गए हैं। तो कोई दुकानदार क्यों रखेगा भला? वह भी गीता प्रेस के ग्रंथ, जिनमें मुनाफा नाममात्र का ही होता है? पर मेरा आश्चर्य कि उस दुकानदार ने बिना समय गँवाए गीता प्रेस का भक्तमाल ग्रंथ निकाल कर मेरे सामने रख दिया। उसके एवज में दक्षिणा पूछी तो वह भी बहुत कम!
मेरे मन में उसी समय विचार आया कि यह निश्चित ही ठाकुर जी और उनकी योगमाया का संकेत है। और मैंने तुरंत दुकानदार को दक्षिणा दी और वह ग्रंथ ले लिया। हालाँकि बाद में मेरी नजर पड़ी कि वास्तव में वह तो गीता प्रेस का ही अधिकृत बिक्री केन्द्र था। इससे मुझे मन ही मन हँसी आ गई, ठाकुर जी की लीला पर। क्योंकि उन्होंने मुझे वहाँ तक पहुँचाया ही नहीं, स्पष्ट आदेश भी मेरे हाथ में रख दिया था।
मगर हम इंसान भी तो आखिर इंसान ही हैं। ठाकुर जी के स्पष्ट आदेश के बाद भी घर पहुँचकर मैं और समीर इन बातों में उलझ गए कि हम भक्तमाल की कहानियों को लिखने का क्रम क्या रखेंगे? उन्हें कितना बड़ा-छोटा लिखेंगे? उनका ऑडियो कैसे बनेगा? वीडियो बनाएँ तो किस तरह बनेगा? आदि, इत्यादि। पर इस सबके बीच ही मेरे मन में ख्याल डाला गया कि भक्तमाल को पढ़ना तो शुरू करो। बाकी चीजें तो तय होती रहेंगी, जब होंगी। तो मैंने पढ़ना शुरू किया और ग्रंथ परिचय के अगले ही क्रम में श्री राजेन्द्रदास जी महाराज का लेख मेरे सामने था। पेज संख्या 23 से 26 तक उन्होंने अपने विचार व्यक्त किए हैं। काफी कुछ लिखा है, पर महाराज की जो बातें मेरे प्रोत्साहन के लिए आखिरी ऊर्जा बनीं, वह कुछ इस तरह थीं, गौर कीजिएगा…
“राष्ट्र का उज्ज्वल भविष्य उसके नागरिकों के चरित्र पर निर्भर करता है। केवल भौतिक उपलब्धियों का विकास किसी राष्ट्र को श्रेष्ठ नहीं बना सकता, जब तक कि उसके नागरिकों का चरित्र श्रेष्ठ न हो। इस दृष्टि से भक्तमाल ग्रंथ बहुत उपयोगी है। इसके पठन-श्रवण से अनायास ही चरित्र निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।…. स्वार्थ की भावना मानव चरित्र को दूषित करती है। स्वार्थी व्यक्ति समाज तथा राष्ट्र के लिए भी उपयोगी नहीं होता। जबकि भक्तमाल के पठन-श्रवण से क्रमश: स्वार्थ की भावना कम होती है, परोपकार की भावना का विकास होता है।.… इस ग्रंथ में भारत के विभिन्न क्षेत्र, भाषा, जाति, संप्रदाय, एवं वर्ग आदि के संतों का चरित्र बताया गया है। अत: इसके पठन-श्रवण से इन आधारों पर होने वाली अविवेकमूलक विषमताएँ दूर होती हैं। एकता और समरसता की प्रेरणा प्राप्त होती है। इसमें हमारी प्राचीन संस्कृति की छटा का भी दर्शन होता है।….. इसीलिए इसका अधिक से अधिक प्रचार-प्रसार हो, इसकी नितांत आवश्यकता है।”
महाराज जी की इतनी स्पष्ट टिप्पणी के बाद मेरे पास अब कोई तर्क नहीं था, कोई बहाना नहीं था। क्योंकि हम भी तो बीते कई सालों से, देश में, समाज में कुछ थोड़ा सा सकारात्मक योगदान देने के लिए ही तो हाथ-पैर मार रहे हैं। सो, हमने फिर आगे कुछ नहीं सोचा। ठाकुर जी का और उनकी योगमाया का नाम लिया, सब उन्हीं पर छोड़ा और शुरू कर दिया।
आज के लिए बस इतना ही, श्रृंखला की अगली कड़ी में श्री भक्तमाल ग्रंथ के संक्षिप्त परिचय पर गौर करेंगे….
श्री राधाकृष्णार्पणम् अस्तु…, श्री राधाकृष्णाभ्याम् नम:। श्री राधा-कृष्ण को समर्पित। श्री राधा-कृष्ण को प्रणाम।
—–
नोट : यह श्रृंखला गीता प्रेस की आधिकारिक पुस्तक ‘श्री भक्तमाल’ में उल्लिखित कथा-प्रसंगों पर आधारित है। इसके प्रकाशन-प्रसारण के पीछे हमारा उद्देश्य सिर्फ इतना है कि गीता प्रेस के ऐसे उच्च स्तर के ऐतिहासिक, पौराणिक महत्त्व के ग्रंथ के प्रचार-प्रसार में #अपनीडिजिटलडायरी की ओर से थोड़ा योगदान हो सके। साथ ही #डायरी से जुड़े पाठकों को इसका लाभ हो। बहुत जल्द हम इसी श्रृंखला को #अपनीडिजिटलडायरी के यूट्यूब चैनल पर भी शुरू करने का इरादा रखते हैं।)
—-
श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ
2 – ‘सरल भक्तमाल’-2…ठाकुर जी ने भक्तमाल की सेवा में मुझे कैसे लगाया?
1- सरल भक्तमाल’-1…आखिर इसकी जरूरत क्यों?
