Suharawardy - Mukherji

सुहरावर्दी पर ‘बयान-गर्दी’ : जो अतीत ‘बहुतों’ के लिए तकलीफदेह, उससे विपक्ष को इतना प्रेम!

टीम डायरी

सुहरावर्दी पर ‘बयान-गर्दी’ पढ़कर चौंकिएगा मत। कारण कि फारसी शब्द ‘गर्दी’ के तमाम मतलबों में एक है, ‘दुर्भाग्य’, जबकि दूसरा है, ‘हमला’। और इन दोनों मतलबों के साथ जुड़ा है यह ‘प्रसंग सुहरावर्दी’

असल में अभी 20 जून, शनिवार को ‘पश्चिम बंग दिवस’ था। यह दिन 1947 की घटना की याद के रूप में मनाया जाता है। तब भारत की आजादी से ठीक पहले तत्कालीन बंगाल विधानसभा के सदस्यों ने मतदान के जरिए प्रांत के विभाजन और ‘पश्चिम बंगाल’ को भारत के हिस्से के रूप में बनाए रखने का निर्णय लिया था। उस वक्त बंगाल प्रांत के प्रशासनिक मुखिया ‘प्रधानमंत्री’ कहलाते थे और इस पद थे हुसैन शहीद सुहरावर्दी। वही सुहरावर्दी, जिनको हिन्दुस्तान की तारीख में ‘बंगाल के कसाई’ के नाम से भी जाना जाता है। इसलिए कि इन्होंने 16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग द्वारा घोषित ‘सीधी कार्रवाई दिवस’ की प्रतिक्रिया में हुए दंगों में जब बंगाल में हिन्दुओं का कत्ल-ए-आम हो रहा था, तब कुछ नहीं किया। अपनी सरकार या पुलिस को भी कुछ नहीं करने दिया। ताकि देश व बंगाल को बाँटने के मुस्लिम लीग के मंसूबे पूरे हो सकें। बाद में ये जनाब पाकिस्तान चले गए और वहाँ के पाँचवें प्रधानमंत्री भी बने। 

इस तरह बंगाल के इतिहास में ‘सुहरावर्दी’ शब्द हमेशा के लिए एक कलंक की तरह चस्पा हो गया। तब से अब तक जब भी इस शब्द का कहीं जिक्र हुआ, इसने हमेशा उस दिन की याद दिलाई, जब बंगाल के हिन्दुओं के खून से सड़कों को लाल किया जा रहा था। जब उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार किया जा रहा था। जब बच्चों और बूढों पर भी रहम नहीं किया जा रहा था, उन्हें मौत के घाट उतार दिया जा रहा था। लिहाजा, उसके बाद कभी इस बात से फर्क नहीं पड़ा कि ‘सुहरावर्दी’ उपनाम वाले कुछ और लोग भी होंगे, जिन्होंने शायद कोई ठीक-ठाक या कह लीजिए कि अच्छे काम भी किए होंगे। सो, अभी 2026 में जब पश्चिम बंगाल में नई सरकार बनी, तो उसने इसी धारणा के मद्देनजर कोलकाता के ‘सुहरावर्दी एवेन्यू’ का नाम बदलवा (नगर निगम के जरिए) दिया। यहाँ का नाम अब ‘गोपाल मुखर्जी मार्ग’ होगा। उन गोपाल मुखर्जी के नाम पर, जिन्होंने 1946 के कत्ल-ए-आम में हजारों लोग बचाए थे।   

सीधे तौर देखें तो इस निर्णय को अच्छा ही कहा जाना चाहिए, क्योंकि एक कलंकित उपनाम से छुटकारा पाया गया और सम्मान दिए जाने लायक व्यक्तित्त्व को उसके हक की पहचान दी गई। इसमें क्या गलत है? लेकिन देश के सबसे पुराने राजनैतिक दल की अतिप्राचीनकालीन मानसिकता को इस निर्णय में खोट दिखता है। इसलिए कि इस फैसले और ऐसे अन्य फैसलों से, उसकी अतिप्राचीनकालीन मानसिकता में जड़ें जमा चुके मुस्लिम तुष्टिकरण को परेशानी होती है। लिहाजा, विरोध के लिए उसकी ओर से अलग दलील आई है। यह कि जिस ‘सुहरावर्दी एवेन्यू’ का नाम बदला गया, वास्तव में उसका ‘बंगाल के कसाई’ से कोई लेना-देना नहीं है। इस सड़क का नामकरण हसन सुहरावर्दी के नाम पर हुआ था, जो बंगाल के जाने-माने शिक्षाविद् ओर चिकित्सक थे। वह कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति (1930 से 1934 तक) भी रहे। बस, रिश्ते में ‘बंगाल के कसाई’ के चाचा थे। तो क्या इससे…?  

देश के इस सबसे पुराने राजनैतिक दल के जैसी ही सोच वाले अन्य दलों की ओर से भी ऐसे ही बयान आए हैं। इसीलिए ऊपर ‘बयान-गर्दी’ शब्द का इस्तेमाल किया क्योंकि इसे बयानों का दुर्भाग्यपूर्ण हमला ही कहेंगे। हालाँकि, बयानबाजों का वह आखिरी सवाल, कि ‘तो क्या इससे…’ उनसे पूछा भी जा सकता है। हुसैन हों या हसन, भतीजा हो या चाचा, ‘सुहरावर्दी’ उपनाम के साथ बंगाल के इतिहास पर जो कलंक लगा, उसे अनदेखा किया जा सकता हैं क्या? इस कलंक तथा ऐसे अन्य कलंकित प्रसंगों से मुक्ति पाने के हर प्रयास से उन्हें तकलीफ क्यों? भारतीय इतिहास में दर्ज ‘बहुतों’ के लिए तकलीफदेह ऐसे प्रसंगों से उन्हें इतना प्रेम क्यों है?

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