टीम डायरी, भोपाल, मध्य प्रदेश से
क्या ख़ूब लिखा था, उस ऑटो के पीछे। ‘एक लोटा जल हर दिक्कत का हल।’ कहने के लिए कोई ख़ास बात नहीं इसमें। पर सोचें तो बिल्कुल आम भी नहीं है ये। याद कीजिए बचपन में कभी जब हम में से किसी को गुस्सा आया होगा तो हमारे बुज़ुर्गों ने हमसे कहा होगा, “एक लोटा पानी पी लो, माथा ठंडा हो जाएगा” और सच में, हम में से जिसने भी उनकी बात मानी तो उसका सकारात्मक असर महसूस किया होगा। लोटाभर पानी पीते ही माथा ठंडा। गुस्सा कम या लगभग ग़ायब ही। उसके साथ ही उस गुस्से से कोई अनहोनी हो जाने की संभावना भी क़रीब-क़रीब ख़त्म।
हालाँकि उस ऑटो वाले ने यही सोचकर यह बात लिखी होगी, ऐसा भी नहीं है। हो सकता है, उसने शायद दूसरी बात सोचकर लिखी हो। और दूसरी बात क्या? ये कि हमारे शंकर भगवान जो हैं न, वे बस एक लोटा जल में ही प्रसन्न हो जाते हैं, ऐसा कहा, माना जाता है। इसीलिए शंकर भगवान को आशुतोष कहते हैं। ‘आशु’ यानि तेज और ‘तोष’ माने तुष्टि। मतलब तेजी से या तुरंत संतुष्टि जिसे मिल जाए, वह कहाए आशुतोष। सो, अगर ऑटोवाले ने इस लिहाज़ से भी लिखा तो है तो सही ही। जो आस्था वाले हैं, उन्होंने इसे आजमाया होगा, ‘एक लोटा जल, हर दिक्कत का हल।’
सो, कुल जमा ‘रोचक-सोचक’ बात इतनी कि अर्थ पहला वाला समझें या दूसरा वाला ‘एक लोटा जल, हर दिक्कत का हल’ तो सौ फ़ीसद है। कभी किसी का मन करे तो किसी भी रूप में आजमा कर देख ले। और यक़ीनी तौर पर असर महसूस करे इसका। जल से हल मिलेगा।
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