प्रतीकात्मक तस्वीर
ऋषु मिश्रा, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश
साल 2017 में कुछ प्राथमिक विद्यालयों का चयन अँग्रेजी माध्यम के लिए किया गया l लिखित परीक्षा के उपरांत जिला शिक्षा प्रशिक्षण संस्थान में इंटरव्यू की प्रक्रिया चल रही थी l मेरी एक मित्र ने दूर बैठी एक शान्त, सौम्य महिला की तरफ़ इशारा करते हुए कहा, “वो मैडम बहुत अच्छी हैं l” मैं उन्हें देखती रही और थोड़ी देर बाद उनके ठीक बगल की कुर्सी पर बैठकर स्वयं ही उनसे परिचय पूछा l पता चला कि वे किसी दूरस्थ ब्लॉक में प्रधानाध्यापिका के पद पर कार्यरत हैं l मैंने पूछा कि मैम आपको अपने सहायक अध्यापकों के साथ सामंजस्य बैठाने में दिक्कत आती होगी?
उन्होंने शान्त स्वर में उत्तर दिया, “मैं उनके कामकाज से ज्यादा मतलब नहीं रखती l वो थोड़ी देर से भी आती हैं तो मैं कोई प्रतिक्रिया नहीं देती l दूर का विद्यालय है तो थोड़ी बहुत देर हो सकती है लेकिन मैं समय से उपस्थित होती हूँ l प्रार्थना, पीटी सब मैं कराती हूँ l छुट्टी कम से कम लेती हूँ l लगातार ऐसा करने से उनके ऊपर भी प्रभाव पड़ा है। अब वे लोग भी समय से आने का पूरा प्रयास करती हैं। बेवजह की छुट्टी लेने से परहेज़ करती हैं l”
उनकी यह बात मेरे मन में बैठ गयी l फिर उनके नियम को मैंने खुद पर लागू किया। हालाँकि मैं प्रधानाध्यापिका नहीं थी। लेकिन इस सीधे-सादे नियम ने मेरी ऊर्जा को सकारात्मक कार्यो में लगा दिया। उनके विद्यालय का नाम तो याद नहीं है लेकिन उनका चेहरा आज भी याद है।
सच कहूँ तो, कोई अनुभवी व्यक्ति अपने आप में एक सम्पूर्ण पुस्तक ही होता है। उनसे बातचीत करना या उनके मूल्यों को अपने जीवन में उतार लेना स्वयं का मार्गदर्शन करना होता है।
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(ऋषु मिश्रा जी उत्तर प्रदेश में प्रयागराज के एक शासकीय विद्यालय में शिक्षिका हैं। #अपनीडिजिटलडायरी की सबसे पुरानी और सुधी पाठकों में से एक। वे निरन्तर डायरी के साथ हैं, उसका सम्बल बनकर। वे लगातार फेसबुक पर अपने स्कूल के अनुभवों के बारे में ऐसी पोस्ट लिखती रहती हैं। उनकी सहमति लेकर वहीं से #डायरी के लिए उनका यह लेख लिया गया है। ताकि सरकारी स्कूलों में पढ़ने-पढ़ाने वालों का एक धवल पहलू भी सामने आ सके।)
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