कोशिश तो खूब कर रहे हैं, मगर अमेरिका को ‘ग्रेट’ कितना बना पा रहे हैं ट्रम्प?

समीर शिवाजीराव पाटिल, भोपाल मध्य प्रदेश

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लगभग वह सब कर रहे हैं, जो उनसे अपेक्षित था। लेकिन वे वहीं तक रुक नहीं रहे। वह सबसे खराब आशंकाओं की दहलीज पर बहुत अलग, ज्यादा और तेजी से सारी स्थापित वर्जनाएँ तोड़कर अपने एजेंडे को अमली जामा पहनाने में जुटे हैं। वह अमेरिका को ग्रेट बनाना चाहते हैं। इससे दुनिया अभूतपूर्व अस्थिरता अनुभव कर रही है। विश्व-व्यवस्था में अस्थिरता के जो संकेत पिछले कुछ सालों में देखने को मिल रहे थे, ट्रम्प उसके मूर्तिमान प्रतीक हैं। उनकी हालिया कार्रवाइयाँ अच्छे-अच्छों की समझ को गच्चा दे जाती है। ट्रम्प युग में विश्व परिदृश्य पर कुछ भी कहना अपनी पाग को दाँव पर लगाने के कम नहीं।

राष्ट्रपति ट्रम्प को चुनाव में मिला बहुमत अतिउदार वैश्विकतावादी दृष्टिकोण और नीति के विरुद्ध है। इसे वह अमेरिकी अर्थव्यवस्था की परेशानियों और पतन का कारण मानते हैं। डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिका-फर्स्ट और राष्ट्रवाद के नाम पर चली आ रही उस अतिउदारवादी विचारधारा को चुनौती दी है, जिसमें वैश्वीकरण की नीति अब चीन को ग्रेट बना रही है। जाहिर है, ग्रेट अमेरिका को ग्रेट चाइना नहीं सुहा रहा। इसलिए अमेरिका को वैश्विक उत्पादन का केन्द्र बनाने के लिए ट्रम्प ने आते ही सरकारी तंत्र को छरहरा और फुर्तीला बनाने, बॉर्डर बन्द कर आव्रजन और घुसपैठ रोकने, उद्योग-उत्पादन को प्रोत्साहन देने, जैसे कई फैसले लिए हैं। साथ ही दुनियाभर से हो रहे सस्ते आयात पर सीमाशुल्क बढ़ाकर कई देशों से अमेरिकी हितों के पक्ष में सौदेबाजी करने की कोशिश की है।

अब इसके पक्ष में नया कथानक गढ़ने और सामाजिक नैतिक मूल्यों को राष्ट्रवादी बनाने के लिए उनके वैचारिक गढ़ हॉर्वर्ड, कोलम्बिया, कॉर्नेल जैसे विश्वविद्यालयों को कसने की कवायद शुरू हो गई है। ये संस्थान वैश्वीकरण के समर्थक तो हैं ही, चीन, कतर और अरब देशों से बड़ी आर्थिक मदद लेकर उदारवादी विमर्श का मंच भी बनाते हैं। इसी तरह, उन्होंने स्कूलों को भी अपने मनमुताबिक, जिन्हें वह ठीक समझते हैं, ऐसे बदलाव करने के लिए विवश किया है। 

इसके अलावा अमेरिका नाटो (उत्तर अटलांटिक सन्धि संगठन), यूएन (संयुक्त राष्ट्र) , डब्लूएचओ (विश्व स्वास्थ्य संगठन), आदि में अपना आर्थिक योगदान भी रोक रहा है। हाल ही में उसने प्रतिबन्ध लगाकर कर आईसीसी (इन्टरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस) को सरेआम बेआबरू कर दिया है। आईसीसी रूसी राष्ट्रपति पुतिन या इजरायली राष्ट्रपति नेतन्याहू के नाम से गिरफ्तारी वारंट जारी कर सुर्खियों में आया था। 

इस तरह, ट्रम्प अपनी खास शैली में स्थापित वर्जनाएँ तोड़ रहे हैं और दुनिया को नई सीख दे रहे होते हैं। वह प्रधानमंत्री मोदी के साथ अमेरिका में चुनाव रैली के दौरान उनसे निजी घनिष्ठता दिखाते हैं। बिना चूके हर महीने एक दो बार मोदी को अपना अच्छा मित्र बताते हैं। उन्हें समझदार व्यक्तित्व का तमगा दे देते हैं। लेकिन दूसरी तरफ, ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ के बाद भारत-पाकिस्तान के संघर्ष विराम का श्रेय भी ले उड़ते हैं। यूँ मोदी और भारत की प्रतिष्ठा को जबरदस्त धक्का भी पहुँचा देते हैं।

ट्रम्प ने चीन से होने वाले आयात पर हास्यास्पद स्तर के सीमा शुल्क लगाए। लेकिन चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का रूख देखकर चीन की लगभग सभी माँगें स्वीकार भी कर लीं। कुल मिलाकर स्थिति यह है कि कई लोग जिन्होंने ट्रम्प के बड़बोलेपन और उनकी खिलन्दड़ तथा दोस्ताना छवि पर भरोसा किया, उन्हें गम्भीरता से लिया, उन्हें शर्मसार होना पड़ा है। वहीं, जो लोग उन्हें हल्के मेंं लेते रहे, उनका और गहरे गडढे में गिरना तय है। मतलब ट्रम्प को समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। ऐसे में प्रश्न यह है कि ट्रम्प किस आत्म-पहचान, मूलभूत विचार, नैतिक परिवेश से आते हैं? वह उन्हें क्या छूट देते है और उन पर क्या बन्धन लगाते हैं? यदि हम इनके तथ्यगत जानकारी के आधार पर कुछ अनुमान लगाने का प्रयास करें, तो कुछ ठोस हासिल कर सकते हैं।

देखा जाए तो ट्रम्प का करियर किसी करिश्मे से कम नहीं। वह अमेरिकी स्वप्न का एक सशक्त उदाहरण है। वह बहुत तेज दिमाग वाले चालाक व्यवसायी हैं। सौदेबाजी के जादूगर हैं। ट्रम्प का जन्म एक जमीन-मकान (रियल एस्टेट) के कारोबारी के घर हुआ। उन्होंने पेन्सिल्वेनिया यूनिवर्सिटी और व्हार्टन बिजनेस स्कूल जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से शिक्षा प्राप्त की और फिर पिता के साथ व्यापार में उनका हाथ बँटाते अपना एक बड़ा साम्राज्य स्थापित किया। इसके बाद वे होटल, जुए के व्यापार तथा उड्‌डयन क्षेत्र में उतरे। अपार धन और ताकत अर्जित की।

ट्रम्प की भूतपूर्व और वर्तमान पत्नी, दोनों ही मॉडलिंग और सिनेमा जगत से आती है। ट्रम्प ने सफल बनने के नुस्खे बताने वाली कई किताबें भी लिखी हैंं, जो खूब बिकती हैं। उनका व्यावसायिक समूह मिस यूनिवर्स, मिस यूएसए जैसी सौन्दर्य प्रतियोगिताओं का आयोजक-प्रायोजक रहा है। उन्होंने टीवी रियालिटी शो की एंकरिंग की है, फिल्म, टीवी सीरियल और विज्ञापनों में लम्बे समय तक काम किया है। रेडियो पर दैनिक टाॅक-शो किए हैं। वे एक मँझे हुए कलाकार है और उन्हें चतुरता और अपने आशय का खुलासा न करते हुए संवाद करने में महारत हासिल है।

अब तक कई अदालती मामले झेल चुके ट्रम्प आर्थिक अनियमितताएँ, टैक्स चोरी और घपलों के कारण विवादों में रहे हैं। अमेरिका में एक तेजतर्रार, सफल और आक्रमक व्यवसायी के रूप में उन्हें देखा जाता है। वह राजनीतिक स्तर पर अपने बलबूते खड़े हुए नेता हैं। इस प्रकार, डोनाल्ड ट्रम्प कोई नियम मानने-मनवाने वाले या नीति-व्यवस्था बनाने वाले व्यक्ति के रूप में सामने नहीं आते। वह लेन-देनवाद में ज्यादा भरोसा करते हैं। यही सब वह विश्व राजनीति में भी ला रहे हैं। अपनी पुस्तक ‘द आर्ट ऑफ डील’ में ट्रम्प कारोबार जगत के लोगों को ‘बड़ा सोचने’, ‘अपने प्रभाव का उपयोग करने’ और हमेशा ‘लड़ने’ की सलाह देते हैं। कहते हैं कि जब आप सौदे में उतरें, तो आपको शुरुआत अजेय ताकत के बिन्दु से करनी चाहिए। आपको भव्यता दिखानी चाहिए। उनके मुताबिक, “मैं बहुत ऊँचा लक्ष्य रखता हूँ। फिर बस जो चाहता हूँ, उसे पाने के लिए जोर लगाता रहता हूँ, जोर लगाता रहता हूँ, जोर लगाता रहता हूँ।”

ट्रम्प किसी भी नियम आधारित व्यवस्था को नहीं मानते। पोलिटिफैक्ट ने 2016 में एक अध्ययन में पाया कि ट्रम्प द्वारा किए गए दावों में से केवल 2 प्रतिशत ही सत्य हैं। उनमें 7 प्रतिशत अधिकतर सत्य हैं, 15 प्रतिशत आधे सत्य हैं, 15 प्रतिशत अधिकतर झूठे हैं, 42 प्रतिशत झूठे हैं, तथा 18 प्रतिशत दावे तो बेबुनियाद हैं।* इस प्रकार, ट्रम्प बने हुए नियम तोड़कर आगे बढ़ने वाले अधिनायक के रूप में ज्यादा दिखते हैं। 

वह बेपरवाह हैं। किसी चीज या व्यक्ति को वह महत्त्व नहीं देते। अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रमुखों की बैठक से यमन पर हमले का की योजना समाचार माध्यमों में पहले ही आ जाने की घटना पर उनकी बेपरवाही ताजा प्रमाण है। कुछ मनोवैज्ञानिक उन्हें आत्ममुग्ध व्यक्तित्त्व करार देते हैं। तो कुछ अन्य उन्हें आत्मकेन्द्रित मानते हैं। इनमें पहले वाला व्यक्तित्त्व स्वयं पर मुग्ध रहता है और दूसरे व्यक्तित्त्व के लिए सिर्फ उसका अपना अस्तित्व ही मायने रखता है, दूसरा कोई नहीं। सोचिए कि ऐसा व्यक्ति अमेरिका को ‘ग्रेट’ बनाना चाहता है। इसीलिए प्रश्न उठता है कि क्या अमेिरका इस तरह ट्रम्प के चाल, चरित्र और चेहरे से ‘ग्रेट बन भी पाएगा?

सोचने लायक बात है!

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(नोट : समीर #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सुधी-सदस्यों में से एक हैं। भोपाल, मध्य प्रदेश में नौकरी करते हैं। उज्जैन के रहने वाले हैं। पढ़ने, लिखने में स्वाभाविक रुचि हैं। वैचारिक लेखों के साथ कभी-कभी उतनी ही विचारशील कविताएँ लिखते हैं। डायरी के पन्नों पर लगातार उपस्थिति दर्ज़ कराते हैं। सनातन धर्म, संस्कृति, परम्परा तथा वैश्विक मसलों पर अक्सर श्रृंखलाबद्ध लेख भी लिखते हैं।) 

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