एंडरसन को सरकारी विमान से दिल्ली ले जाने का आदेश अर्जुन सिंह के निवास से मिला था

विजय मनोहर तिवारी की पुस्तक, ‘भोपाल गैस त्रासदी: आधी रात का सच’ से, 21/12/2021

मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह से उस व्यक्ति का नाम बताने का आग्रह किया है, जिसने उन्हें एंडरसन को तत्काल रिहाई की व्यवस्था करने को कहा था। इस बाबत उन्होंने श्री सिंह को एक पत्र लिखा है। इसमें मुख्यमंत्री ने लिखा कि पिछले 72 घंटों (फैसला आने के बाद) से देश इंतजार कर रहा है कि आप इस मामले में सच्चाई उजागर करें मप्र और खासतौर से भोपाल की जनता को यह अधिकार है कि वह अपने तत्कालीन मुख्यमंत्री से हकीकत जान सके। चौहान साहब, ऐसे मासूम मत बनो। आप भी जानते हो कि ऐसी चिट्ठियों को कितनी संजीदगी से लिया जाता है। यह मानना पड़ेगा कि आपका यह वक्तव्य जरूर मौके के मुताबिक है। आपको एक सुर्खी तो दिला ही गया। 

पूर्व आईएएस अधिकारी एमएन बुच ने तत्कालीन कलेक्टर मोतीसिंह के दावे को खारिज करते हुए कहा कि दबाव में मजबूर होना अधिकारी का फर्ज नहीं है। हादसे के वक्त मैं कलेक्टर होता तो दबाव आने पर भी एंडरसन को नहीं छोड़ता। उनसे मुख्य सचिव भी ऐसा करने के लिए कहते तो वे उलटे उनके खिलाफ ही एक्शन ले लेते। कानून कहता है कि किसी के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के साथ गिरफ्तारी हुई तो उसे जमानत देने का हक सिर्फ न्यायिक दंडाधिकारी को ही है।… 

मध्यप्रदेश सरकार के तत्कालीन विमानन संचालक आरसी सौंधी ने दावा किया कि राज्य सरकार के उस विमान को भोपाल से दिल्ली भेजने का आदेश मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह के निवास से मिला था, जिसमें गैस हादसे का मुख्य आरोपी वॉरन एंडरसन सवार था। सौंधी ने बताया कि सीएम निवास से उन्हें कहा गया था कि विमान को अपराह्न चार बजे दिल्ली ले जाना है। इसमें खास लोग सवार होंगे। इन्हें दिल्ली छोड़कर वापस आना है। इस पर उन्होंने पायलट को विमान तैयार करने के निर्देश दिए थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि उस समय वे नहीं जानते थे कि विमान में एंडरसन को दिल्ली भेजा रहा है। बाद में यह जानकर बेहद दुःख हुआ कि वह व्यक्ति एंडरसन था। 

कैप्टन सौंधी ने बताया कि जब एंडरसन विमान में चढ़ने लगा तो तत्कालीन कलेक्टर मोतीसिंह और एसपी स्वराजपुरी ने हाथ हिलाकर उसे विदा किया था। उस घटना के दौरान विमान में सह-पायलट कैप्टन अली ने भी कहा कि उन्हें नहीं पता था कि जिस व्यक्ति को वह दिल्ली छोड़ने जा रहे हैं, वह एंडरसन है। अली ने कहा कि उन्हें जो आदेश मिला, उसे पूरा किया, लेकिन आज उन्हें भी यह बात तकलीफ देती है कि जिस आदमी को उन्होंने दिल्ली छोड़ा वह भोपाल का मुजरिम था। अली याद करते हैं कि दिल्ली पहुंचने में करीब एक घंटा 20 मिनट लगे। पूरे रास्ते एंडरसन चुप ही रहा। दिल्ली पहुंचने पर वह उसी खामोशी के साथ विमान से उतरा और उसे रिसीव करने आए लोगों के साथ रवाना हो गया।… 

भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर कह रहे हैं कि एंडरसन के साथ भोपाल से दिल्ली तक एक मंत्री भी था। इसके पक्के सबूत हैं। केंद्र को बताना चाहिए कि वह कौन था? राजीव गांधी- अर्जुनसिंह की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। केंद्रीय मंत्री अंबिका सोनी ने इस पर सफाई दी है कि ऐसा प्रमाण नहीं है, जिससे साबित हो कि एंडरसन के साथ विमान में कोई मंत्री बैठा था। एंडरसन के भाग निकलने की जांच मंत्री समूह ही करेगा। कोई तथ्य छिपाया नहीं जाएगा।… 

कोई मुगालते में न रहे कि कुसूरवार चंद बड़े लोग ही हैं। हकीकत यह है कि संवेदनहीनता हर कोने में सिर उठाए थी। राहत अस्पतालों की असलियत को उजागर करने वाली यह खबर बता रही है कि गैस पीड़ि इन अस्पतालों में दूसरी त्रासदी भोगने को मजबूर रहे हैं। बरखेड़ा पठानी में रहने वाले गैस पीड़ित मोहम्मद अकील (28) की दोनों किडनियां खराब हो चुकी हैं। भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर (बीएमएचआरसी) के डॉक्टरों ने शुरुआत में डायलिसिस करने के बाद इलाज करने में इनकार कर दिया। अब वह एक नर्सिंग होम में डायलिसिस करा रहा है। उसकी दवा पर हर माह करीब तीन हजार रुपए खर्च होते हैं। यह स्थिति सिर्फ अकील की नहीं है, उसके जैसे कई गैस पीड़ित हैं, जिन्हें इलाज के लिए परेशान होना पड़ रहा है। वह भी तब जबकि सरकार गैस पीड़ितों के इलाज के नाम पर 383.93 करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है। कोर्ट के फैसले के बाद गैस पीड़ितों के जख्म हरे हो गए हैं। ये लोग अब भी बेहतर इलाज की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

जहरीली गैस का दंश झेल रहे लोगों को इलाज और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के सरकारी दावों की हमने पड़ताल की पड़ताल में यह बात सामने आई कि गैस राहत अस्पतालों में मरीजों का ठीक से इलाज तो दूर, उन्हें दवा तक नहीं दी जा रही है। अकील के मुताबिक बीएमएचआरसी के डॉक्टरों ने डायलिसिस करने से तो इनकार कर ही दिया, अब दवा भी नहीं दी जा रही है। जेपी नगर निवासी हनीमन बी (80) के फेफड़े खराब हो गए हैं। वह कहती हैं कि जवाहरलाल नेहरू गैस राहत अस्पताल एव बीएमएचआरसी के डॉक्टर उन्हें अस्पताल में देखते ही भगा देते हैं। त्रासदी के बाद से अब तक करीब 11 लाख लोग गैस राहत अस्पतालों में इलाज करा चुके हैं। तीन लाख से ज्यादा लोग अब भी गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं। पीड़ितों के लिए काम करने वाले संगठन भी मानते हैं कि ये अस्पताल अब नाम के ही रह गए हैं। 

सरकार ने पीड़ितों के इलाज के लिए नी अस्पताल एवं 18 है केयर यूनिट स्थापित की है। इन अस्पतालों में 89 विशेषज्ञ डॉक्टर तथा 157 मेडिकल आफीसर्स के पद स्वीकृत हैं। इनमें से विशेषज्ञ डॉक्टरों के 56 तथा मेडिकल आफीसर्स के 24 पद लंबे समय से खाली पड़े हैं। पैरामेडिकल स्टाफ की कमी के कारण इन में पीड़ितों की जरूरी जांचें नहीं हो पा रही हैं। कहने को तो सरकार ने गैस पीड़ितों के चिकित्सकीय पुनर्वास के नाम पर 383.93 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। इसके बावजूद पीड़ितों का समुचित उचित इलाज नहीं हो पा रहा है। 

तीन अस्पतालों के नाम तो कमला नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी के नाम पर हैं, लेकिन इनकी हालत दूर गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों जैसी ही है। मुझे समझ में नहीं आता, नेहरू परिवार के इन सदस्यों के नाम देश में अनगिनत सड़कें और संस्थान हैं, यहां इनकी क्या जरूरत थी? यहां नाम की नहीं काम की जरूरत थी। गैस पीड़ितों जैसी संवेदनशील सेवाओं के लिए इन महान हस्तियों के नाम रखने वालों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए।…
( जारी….)
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(नोट : विजय मनोहर तिवारी जी, मध्य प्रदेश के सूचना आयुक्त, वरिष्ठ लेखक और पत्रकार हैं। उन्हें हाल ही में मध्य प्रदेश सरकार ने 2020 का शरद जोशी सम्मान भी दिया है। उनकी पूर्व-अनुमति और पुस्तक के प्रकाशक ‘बेंतेन बुक्स’ के सान्निध्य अग्रवाल की सहमति से #अपनीडिजिटलडायरी पर यह विशेष श्रृंखला चलाई जा रही है। इसके पीछे डायरी की अभिरुचि सिर्फ अपने सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक सरोकार तक सीमित है। इस श्रृंखला में पुस्तक की सामग्री अक्षरश: नहीं, बल्कि संपादित अंश के रूप में प्रकाशित की जा रही है। इसका कॉपीराइट पूरी तरह लेखक विजय मनोहर जी और बेंतेन बुक्स के पास सुरक्षित है। उनकी पूर्व अनुमति के बिना सामग्री का किसी भी रूप में इस्तेमाल कानूनी कार्यवाही का कारण बन सकता है।)
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श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ 
8.प्लांट की सुरक्षा के लिए सब लापरवाह, बस, एंडरसन के लिए दिखाई परवाह
7.केंद्र के साफ निर्देश थे कि वॉरेन एंडरसन को भारत लाने की कोशिश न की जाए!
6. कानून मंत्री भूल गए…इंसाफ दफन करने के इंतजाम उन्हीं की पार्टी ने किए थे!
5. एंडरसन को जब फैसले की जानकारी मिली होगी तो उसकी प्रतिक्रिया कैसी रही होगी?
4. हादसे के जिम्मेदारों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए थी, जो मिसाल बनती, लेकिन…
3. फैसला आते ही आरोपियों को जमानत और पिछले दरवाज़े से रिहाई
2. फैसला, जिसमें देर भी गजब की और अंधेर भी जबर्दस्त!
1. गैस त्रासदी…जिसने लोकतंत्र के तीनों स्तंभों को सरे बाजार नंगा किया!

 

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