प्रतीकात्मक तस्वीर
चेतन जोशी, मशहूर बाँसुरी वादक, दिल्ली
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का प्रयोग आजकल हर जगह हो रहा है। कुछ जगहों पर उपयोगकर्ता की सहमति से तो कुछ जगहों पर बिना किसी को पूछे। इस चक्कर में कई प्रकार की समस्याएँ पैदा हो जाती हैं।
मैं या मेरे जैसे कई कलाकार अपने कार्यक्रमों के सिलसिले में लगातार यात्रा पर रहते हैं। इस कारण मेरे अधिकांश शिष्य मुझसे ऑनलाईन वीडियो एप के माध्यम से संगीत की शिक्षा ग्रहण करते हैं। महामारी के दौरान और उसके बाद यह माध्यम बहुत सुविधाजनक भी साबित हुआ है। लेकिन इस सब में मामला बिगड़ता तब है, जब क्लास के दौरान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस फटे में टाँग अड़ाने पहुँच जाता है।
संगीत शिक्षा में वीडियो से अधिक महत्त्व ऑडियो का होता है। जबकि वीडियो एप में विद्यमान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को शिक्षा मिली है कि मानव की आवाज के अतिरिक्त सब कुछ शोर या हल्ला-गुल्ला है। अतः पार्श्व में आ रही सभी ध्वनियों को वह दबा देता है। अब इसमें दिक्कत तब होती है, जब उसे लगता है कि बाँसुरी, तबले तथा तानपुरे की ध्वनियाँ भी शोर हैं। तब वह नाॅयज़ कैंसिलेशन के क्रम में हमारी आवश्यक ध्वनियाँ भी दबा देता है।
मुझे लगता है कि यह समस्या दुनियाभर के संगीतकारों को आ रही होगी। विरोध भी हुआ होगा। जो भी हो अंततः कुछ समय पूर्व एक लोकप्रिय एप वालों ने नाॅयज़ कैंसिलेशन के कुछ अतिरिक्त विकल्प विंडोज प्लेटफॉर्म से युक्त लैपटॉप वालों के लिए डाले। उससे स्थिति कुछ सुधरी। लेकिन विचित्र स्थिति यह है कि यह विकल्प उसी एप से मोबाइल या एपल प्लेटफॉर्म के माध्यम से जुड़े लोगों को नहीं मिलते, जिनकी संख्या अधिक है।
यद्यपि, ऐसा मत समझिए कि इस मामले में एपल वाले पीछे हैं, बिल्कुल नहीं। उनके फेसटाइम वीडियो एप पर कैमरा घूमता रहता है और लगातार चेहरे को फोकस किए रखता है। ऐसे में, जब मुझे विद्यार्थी की उँगलियों को देखना हो तब भी वह पुनः चेहरे की तरफ अपने आप ले जाता है। अब ऐसा काम कोई व्यक्ति करे तो कम से कम उसे बुद्धिमान तो नहीं ही कह सकते। लेकिन ये साहब तो अपने नाम में ही ‘इंटेलिजेंट’ लगा बैठे हैं, क्या करें!
इसीलिए वह कहावत याद आ जाती है- “आँख का अंधा, नाम नयनसुख”।
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(चेतन जोशी जी देश के जाने-माने बाँसुरी वादक हैं। संगीत दिवस पर उन्होंने यह लेख फेसबुक पोस्ट की शक़्ल में लिखा है। इसे उनकी पूर्व अनुमति से #अपनीडिजिटलडायरी के पन्नों पर दर्ज़ किया गया है।)
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