जो विषधर कालिय नाग के फण पर भी नृत्य कर सके, वह श्रीकृष्ण।
रोहित मेघानी, भोपाल मध्य प्रदेश
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर आने-जाने वाले बधाई और शुभकामना सन्देशों के बीच एक सुन्दर सन्देश हाथ लगा। इसमें लिखा था,
“सुदर्शन जैसा शस्त्र हाथ में होने के बाद भी यदि हाथ में मुरली है, तो वह श्रीकृष्ण हैं। द्वारिका का वैभव होने के बाद यदि सुदामा मित्र है, तो वह श्रीकृष्ण हैं। मृत्यु के फण (कालिय नाग) पर खड़े होकर यदि नृत्य कर सकें, तो वह श्रीकृष्ण हैं। सर्वसामर्थ्य होकर भी यदि सारथी बन सकें, तो वह श्री कृष्ण हैं।”
कितना सुन्दर सन्देश है! यह किसी भी विचारशील व्यक्ति को और आगे सोचने पर विवश करता है। इसी तरह की और कड़ियाँ जोड़कर एक श्रृंखला बनाने को बाध्य करता है। श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़े कुछ चन्द पहलुओं को समझते हुए व्यक्तित्त्व की विराटता का रहस्य समझने की ओर अग्रसर करता है। उदाहरण देखिए।
एक नहीं बल्कि 16,108 पत्नियों से विवाहित गृहस्थ होकर भी जो प्रेम की पराकाष्ठा (राधा) को स्वीकारें और उसे पूरे जगत में स्वीकार्य बना दें, वह श्रीकृष्ण हैं। युद्धभूमि में खड़े होकर जो जीवन और मृत्यु से परे रहकर कर्म करते रहने का उपदेश दें, गीता का ज्ञान दें, वह श्रीकृष्ण हैं। भूलक्ष्मी, योगलक्ष्मी, वैभवलक्ष्मी जिनके क़दमों में खेलती हों, फिर भी उनसे निर्विकार रहें, उदासीन रहें, वह श्रीकृष्ण हैं। वामनरूप में राजा बलि से वरदान में तीन पग ज़मीन माँगें और इस बहाने से पूरा चराचर जगत नाप लें, फिर उसी राजा के द्वारपाल बनकर खड़े हो जाएँ, वह श्रीकृष्ण हैं।
सृष्टि के स्वामी होकर भी छछियाभर छाछ के लिए गाँव की ग्वालिनों के प्रेम में उनके सामने नाचने लग जाएँ, उनके घर दधि-माखन की चोरी का स्वांग करने लगें, वह श्रीकृष्ण हैं। सर्वश्रेष्ठ और अजेय योद्धा होकर भी जो किसी आततायी राजा (कालयवन) से बचने के लिए रणछोड़ बनें, वह श्रीकृष्ण हैं। श्रीराम रूप में रावण जैसे महाबली को परास्त करने के बाद भी उसकी स्वर्णनगरी, उसका राज-पाट उसी के भाई विभीषण को सौंप दें, वह श्रीकृष्ण हैं। परशुराम रूप में पूरे 21 बार क्षत्रियों को परास्त कर पृथ्वी को जीतने के बाद भी उसे ब्राह्मणों को दान दे दें, वह श्रीकृष्ण हैँ।
सोचने बैठेंगे, विचार करते जाएँगे, तो ऐसे न जाने कितने उदाहरण मिलेंगे श्रीकृष्ण के जीवन से, उनके व्यक्तित्त्व से। वहाँ हर बिन्दु पर महसूस होगा मानो दो विपरीत ध्रुवों के बीच एक सन्तुलन बिन्दु हैं श्रीकृष्ण। वे हर समय हमें बता रहे हैं कि विपरीतताओं, प्रतिकूलताओं से घबराना नहीं। उनकी चिन्ता नहीं करनी। उनको अनापेक्षित नहीं मानना है। और न ही उनसे मुँह मोड़ना है। बल्कि सहजताओं, अनुकूलताओं के साथ उनका सह-अस्तित्व स्वीकार करते हुए सन्तुलन बनाना सीखना है। उनके साथ चलना सीखना है। यही जीवन है, यही श्रीकृष्ण हैं।
शुभ श्रीकृष्ण जन्माष्टमी।
—–
(रोहित मेघानी भोपाल में ऑटोमोबाइल के व्यवसायी हैं। उन्होंने श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर ये विचार #अपनीडिजिटलडायरी को भेजे, जिसे एक रोचक-सोचक लेख का स्वरूप दिया गया।)
देश में जनगणना होने वाली है। मतलब जनसंख्या कितनी है और उसका स्वरूप कैसा है,… Read More
जय जय श्री राधे Read More
अभी एक तारीख को किसी जरूरी काम से भोपाल से पन्ना जाना हुआ। वहाँ ट्रेन… Read More
भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय के नए परिसर का उद्घाटन 13 फरवरी 2026 को हुआ। इसे… Read More
‘भ्रष्ट’ का अर्थ है- जब कोई अपने धर्म (कर्तव्य-पथ) से दूर हट जाए और ‘आचार’… Read More
ऐसी सूचना है कि अंग्रेजों की ईस्ट इण्डिया कम्पनी फिर दिवालिया हो गई और उसका… Read More