माने या नहीं, स्मार्ट फोन, मुफ़्त इन्टरनेट और ‘सोशल’ मीडिया ‘अब महामारी’ बन रही है!

नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश

पहले चन्द सुर्ख़ियों पर नज़र डालिए। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), इन्दौर का एक छात्र था, रोहित। प्रथम वर्ष की पढ़ाई कर रहा था। उसके हाथ में जब मोबाइल फोन, मुफ़्त इन्टरनेट आया तो उसे ऑनलाइन जुए की लत लग गई। इतनी अधिक कि उसे जितना भी पैसा मिलता, सब उस जुए में लगा देता। तेलंगाना का रहने वाला था। अभी नए साल पर घर गया तो माता-पिता ने 40 हजार रुपए दिए, फीस जमा करने के लिए। उसने वह पैसे भी ऑनलाइन जुए में लगा दिए। सब हार गया। फिर ज़िन्दगी से भी हार गया। उसने ख़ुदकुशी कर ली

पिछले साल कई भारतीय विमानों और दिल्ली के कुछ स्कूलों में भी, बम होने की झूठी अफ़वाहें फैलाई गईं थीं। इनकी जाँच के दौरान एक 17 साल का लड़का पकड़ा गया, मुम्बई में। वह किसी से बदला लेना चाहता था। उस व्यक्ति को फँसाना चाहता था। इसलिए उसी के नाम से यह अफ़वाह फैलाई। दिल्ली में एक युवक पकड़ा गया। वह बेरोज़ग़ार था। नाम कमाना चाहता था। इसलिए उसने अफ़वाह फैलाई। बीते दिसम्बर में तीन स्कूली बच्चे पकड़े गए। वे परीक्षाएँ आगे बढ़वाना चाहते थे। इसलिए अपने ही स्कूल बम होने की अफ़वाह फैला दी। इस तरह की ख़ुराफ़ातों में इन आरोपियों का बड़ा मददग़ार कौन बना? मोबाइल फोन, मुफ़्त इन्टरनेट और सोशल मीडिया

बीते साल ही जुलाई में आन्ध्रप्रदेश में 12-13 साल के 3 बच्चे पकड़े गए थे। उन्होंने 8 साल की बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार किया था। फिर उसे गला दबाकर मार भी डाला था। इन किशोर आरोपियों ने ऐसा क्यों किया? क्योंकि इन्हें मोबाइल फोन, मुफ़्त इन्टरनेट के कारण अश्लील तस्वीरें, वीडियो, आदि देखने का चस्का लग चुका था। हालाँकि ये तो चन्द उदाहरण हैं। पूरी तस्वीर तो यूँ है कि मोबाइल फोन, मुफ़्त इन्टरनेट और सोशल मीडिया नामक ‘महामारियों’ की जकड़ में देश के 60% फ़ीसद से भी अधिक बच्चे आ चुके हैं। मार्च-2024 में एक सर्वे रिपोर्ट से ये पता चला था। और यह भी कि 85% माता-पिता बच्चों को इन महामारियों से बचा नहीं पा रहे हैं।

अभी और सुनिए। बीते दिसम्बर में ही एक अख़बाार ने बड़ी सी रिपोर्ट छापी थी। शोध आधारित इस रिपोर्ट में बताया गया था कि सोशल मीडिया के जितने भी मंच हैं, वे अस्ल में ‘सोशल’ कहीं से कहीं तक नहीं है। उनमें बन्दोबस्त ऐसे किए जाते हैं कि सनसनीख़ेज़ फ़र्ज़ी सूचनाएँ, मिलावटी तथ्य 6 गुणा तेजी से फैलें। हालाँकि इससे ‘सोशल मीडिया मंच’ संचालित करने वाली कम्पनियों को तो फ़ायदा हो जाता है मगर समाज को नुक़सान होता है क्योंकि सामाजिक तौर पर नफ़रत फ़ैलाने वाली भड़काऊ सामग्री को इस बन्दोबस्त से बढ़ावा मिलता है।

रिपोर्ट में इसके पक्ष में कुछ मिसालें भी दी गई थीं। जैसे- अमेरिका में जनवरी- 2021 की हिंसा, म्याँमार में रोहिंग्याओं के ख़िलाफ़ साल 2017 में हुई हिंसा, जर्मनी में शरणार्थियों पर वर्ष 2015 में हुए हमले। इसी क्रम में जनवरी-2021 में दिल्ली में किसानों की ट्रैक्टर रैली के दौरान हुई हिंसा और अभी 2024 में बांग्लादेश में हिन्दू समुदाय पर हुए अत्याचारों के उदाहरणों को भी जोड़ सकते हैं। ऐसे हर मामले में पर्दे के पीछे सिर्फ़ और सिर्फ़ मोबाइल फोन, मुफ़्त इन्टरनेट तथा सोशल मीडिया नामक ‘बेलगाम महामारियों’ की भूमिका ही दिखाई देती है।

इन्हें ‘बेलग़ाम महामारी’ इसलिए लिखा क्योंकि इन पर किसी का ज़ोर नहीं चल रहा है। दुनियाभर की सरकारों ने इन्हें नियंत्रित करने के लिए क़दम उठाए हैं। मसलन- अभी भारत सरकार ने कानून में संशोधन की पहल की है। इसके तहत 18 साल से कम उम्र के बच्चे माता-पिता की पूर्व अनुमति के बिना सोशल मीडिया पर ख़ाते नहीं बना सकते। लेकिन इस बन्दोबस्त पर विशेषज्ञों का सवाल यह है कि माता-पिता की अनुमति मिल चुकी है या नहीं इसका पता कैसे चलेगा? क्योंकि सोशल मीडिया पर फ़र्ज़ी ख़ाते बनाना तो आज किसी के लिए भी बाएँ हाथ का खेल है। ऊपर बच्चों द्वारा किए गए जिन अपराधों का उल्लेख है, वे सब फ़र्ज़ी ख़ाते बनाकर ही किए गए थे।

अलबत्ता भारत सरकार के कानूनी बन्दोबस्त की मानें तो सोशल मीडिया मंच संचालित करने वाली कम्पनियाँ ही सख़्ती से इस कानून का पालन कराएँगी। यानि अगर कोई बच्चा इन मंचों पर ख़ाता खोलने की कोशिश करेगा तो ये कम्पनियाँ ही फ़िल्मी अन्दाज़ में उससे कहेंगी कि “जाओ, पहले अपने माता-पिता के दस्तख़त लेकर आओ!” मज़ाक है न? ये कम्पनियाँ भला ऐसा क्यों करने चलीं? जिस काम से उनका ख़र्चा बढ़ता हो, मुनाफ़ा कम होने की सम्भावना होती हो, वे ऐसा काम क्यों करेंगी भला? वह भी सख़्ती से? सरकार से लेकर हम सब को पता होना चाहिए कि ये कम्पनियाँ समाज सेवा नहीं, व्यापार कर रही हैं। उन्हें हमारे या किसी भी देश का सामाजिक ताना-बाना बनने बिगड़ने से कोई लेना-देना नहीं। यह उनके सोचने का विषय भी नहीं है दूर-दूर तक। तो फिर क्या करें?

एक सीधा सा ज़वाब है। सरल समाधान है। क्वारेन्टाइन हो जाइए। ख़ुद दूरी बनाइए। जैसे कोरोना महामारी से बचने के लिए बनाई थी, अब इन महामारियों से ख़ुद को, अपने बच्चों को बचाने के लिए दूरी बनाइए। जहाँ-जहाँ से भी, जिस-जिस माध्यम से भी यह महामारियाँ हमें संक्रमित करती हों, हमारे और बच्चों के दिमाग़ों में ज़हर घोलती हों, उन सभी माध्यमों से दूरी बनाइए। अगर किसी मज़बूरीवश ऐसे माध्यमों से सम्पर्क रखना भी है तो उसी तरीक़े से, उतना ही रखिए, जितना और जिस तरह छुआछूत की बीमारियों तथा उनके बीमारों से रखा जाता है।

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