बंगाल, भाजपा और क्लबहाउस

टीम डायरी, 11/4/2021

क्लबहाउस (ऐपल यूजर्स के लिए बतकही का अड्डा) पर चुनाव रणनीतिकार प्रशान्त किशोर के साथ चुनिन्दा पत्रकारों (पढ़ना चाहिए, मौजूदा सत्तारूढ़ पार्टी के आलोचक) की बातचीत लीक होने के बाद पश्चिम बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की हार और भाजपा की जीत के कयास लगने तेज हो गए हैं। लोग कह रहे हैं कि प्रशान्त किशोर ने हार मान ली। भाजपा बंगाल जीत जाएगी। उनकी प्रतिक्रिया देख ऐसा लग रहा है, जैसे भाजपा के बंगाल जीत जाने से कयामत आ जाएगी, जो अब तक नहीं आई है। 

सवाल यह है कि बंगाल चुनाव परिणाम को हम किस तरह देख रहे हैं। क्या हमें ममता बनर्जी की सत्ता में किसी तरह की दिलचस्पी है? अगर नहीं, तो बंगाल में भाजपा की जीत या टीएमसी की हार से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। क्योंकि अगर हम बंगाल और देश के भविष्य को लेकर चिन्तित हैं, तो हमें अपने चश्मे का फ्रेम थोड़ा बड़ा करना होगा। 

भाजपा बंगाल में जीतने के लिए जो कर रही है, क्या उसने दूसरे राज्यों में ऐसा नहीं किया? उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, कश्मीर… ऐसा कौन सा राज्य बचा है, जहाँ भाजपा ने विचारधारा को अमलीजामा पहनाने की ख़ातिर सत्ता हासिल करने के लिए साम-दाम-दंड-भेद न अपनाया हो? 

हाँ, बंगाल में भाजपा के सामने चुनौती कड़ी है। इसलिए हल्ला ज़्यादा है। मेरा मानना है कि इस हो-हल्ले के बीच ममता की सियासत और बंगाल की राजनीति की भविष्यवाणी हफ़्ते-दो- हफ़्ते की चुनावी यात्रा से नहीं करनी चाहिए। हर वह शख़्स, जो भाजपा की राजनीति और उसकी विचारधारा से ख़ुश नहीं है, उसे लम्बी लड़ाई के लिए तैयार होना पड़ेगा। विचारधारा और वोट वाली राजनीति के लिए भी तैयार रहना होगा। 

गौर करने वाली बात यह है कि जितनी तैयारी भाजपा ने की है, उतनी तैयारी किसी के पास नहीं है। हाँ, पंजाब और हरियाणा के किसानों ने इसके संकेत दिए हैं। सौ से ज़्यादा दिन उन्होंने भाजपा का मुक़ाबला किया है। देखना होगा कि उनकी लड़ाई आगे क्या स्वरूप लेती है। 

केन्द्र और राज्यों में भाजपा का शासन सिर्फ़ चुनाव में सबसे ज़्यादा सीटें हासिल करने वाली पार्टी का शासन नहीं है। इसके लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) ने लम्बी तैयारी की है। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह उसके सिपाही हैं, जो अपने मौजूदा कद में संगठन पर हावी दिखते हैं। इसलिए देश के किसी भी व्यक्ति को जो, अपने भविष्य के प्रति चिन्तित है, उसे सच कहने की ताकत रखनी होगी। लम्बे संघर्ष के लिए तैयार रहना होगा। 

नौकरी, पैसा, आलीशान ज़िन्दगी और शॉर्टकट के ज़रिए आरामपसन्द सत्ता नहीं मिलती। सत्ता कभी भी शान्ति से नहीं मिलती। इसलिए भाजपा बंगाल में जीते या हारे, इससे कुछ नहीं बदलने वाला। अख़बारों और समाचार चैनलों के शीर्षक (Headlines) अब भी मैनेज हो रही है। कल भी हो जाएगी। रही बात बंगाल की, तो 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही केन्द्रीय एजेंसियों ने ममता की नींद उड़ा रखी है। 

पर इतना तय लग रहा है कि बंगाल में दो मई के बाद भाजपा का असर बहुत निचले और सूक्ष्म स्तर पर दिखेगा। क्या बंगाल के लोग इस असर को जज़्ब करने के लिए तैयार हैं? क्या वे भाजपा की विचारधारा से तालमेल बैठा पाएँगे? दिल्ली में बैठे लोगों को इस बात का विश्लेषण करना चाहिए। क्या बंगाल का भद्रलोक विचार के स्तर भाजपा से लड़ पाएगा? या सत्ता सुख के लिए दिल्ली के सामने नतमस्तक हो जाएगा? 

ये सब कुछ सिर्फ़ बंगाल के लोग तय करेंगे। अगर हम इस बारे में कुछ संकेत हासिल करना चाहते हैं तो हमें उनके जीवन में झाँकना होगा। उनका दुःख-सुख सब जानना होगा। उनकी ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव से गुज़रने पर पता चलेगा कि उनकी सोच की बुनावट क्या है। 

प्रशान्त किशोर की पूरी रणनीति आँकड़ों, तथ्यों (Data) आदि पर आधारित होती है। लेकिन घर में आटा ना हो तो डाटा का प्रभाव शून्य होता है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि भूख की मारी चिड़िया शिकारी के बिछाए जाल में फँस जाती है। यह भी याद रखना चाहिए कि मालदा में बैठे लोगों को इस बात से फ़र्क नहीं पड़ता कि दिल्ली का लुटियंस (जहाँ देश चलाने वाले रहते हैं) क्या सोचता है।
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(यह लेख #अपनीडिजिटलडायरी के पास वॉट्सऐप सन्देश के रूप में आया है। लिखने वाले डायरी के नियमित पाठक भी हैं। इसलिए वे ‘टीम डायरी’ के स्वाभाविक सदस्य भी हैं। उन्होंने लेख के साथ यह आग्रह भी भेजा है, “मैं नहीं चाहता कि लोग मेरी दुनियानवी पहचान से रू-ब-रू हों। बेहतर है कि कलम ही मेरी पहचान बने।” उनके आग्रह का सम्मान करते हुए यहाँ लेख के साथ उनका नाम नहीं दिया जा रहा है। सिर्फ़ उनके विचार सामने रखे जा रहे हैं।)
 

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