टीम डायरी
दो दिन बाद, यानि एक जुलाई से भारत का पासपोर्ट बनवाने का शुल्क बढ़ने वाला है। नए नियमों के अनुसार, 36 पन्नों का नया पासपोर्ट लेने या पुराने को दोबारा जारी कराने के लिए अब 2,500 रुपए लगेंगे। पहले 1,500 रुपए लगते थे। इसी तरह से, 60 पन्नों के पासपोर्ट के लिए 3,500 रुपए लगेंगे। पहले इसके 2,000 रुपए लगा करते थे। पासपोर्ट तत्काल चाहिए, तो उसके लिए पाँच और छह हजार रुपए (iपन्नों के हिसाब से) देने होंगे।
यह हुई ताजा सूचना। इसके बाद अब समझते हैं कि किस-किस को भारतीय पासपोर्ट जारी किया जा सकता है। तो मुख्य रूप से भारतीय पासपोर्ट तीन श्रेणियों में जारी होते हैं। पहला- आम नागरिकों के लिए नीला पासपोर्ट। दूसरा- सरकार अफसरों के लिए सफेद पासपोर्ट। तीसरा- राजनयिकों (भारतीय विदेश सेवा के अफसर, राजदूत, उच्चायुक्त, आदि) के लिए भूरे-से गहरे लाल (मरून) रंग का पासपोर्ट। इनमें से कोई भी पासपोर्ट अगर किसी के पास है, तो आम तौर पर यही माना जाता है कि वह भारतीय नागरिक है। क्योंकि पासपोर्ट हासिल करने की प्रक्रिया में उसकी भारतीयता का पुष्टिकरण होता है। विभिन्न स्तरों पर जाँच होती है।
यानि, सैद्धांतिक रूप से पासपोर्ट को नागरिकता के प्रमाण-पत्र के रूप समझ सकते हैं। मगर ठहरिए, यहाँ एक पेंच है। दरअसल, इसी बुधवार, 24 जून को भारत सरकार की ओर से स्पष्ट किया गया है कि भारतीय पासपोर्ट “भारत की नागरिकता के प्रमाणीकरण के लिए ‘अंतिम दस्तावेज’ नहीं है। यह यात्रा दस्तावेज है। इसकी तुलना उन दस्तावेज (जैसे- सरकार द्वारा जारी नागरिकता प्रमाण पत्र) से नहीं हो सकती, जिनका इस्तेमाल नागरिकता संबंधी अधिकार स्थापित करने के लिए किया जाता है।” सूचनाओं की मानें तो विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने यह स्पष्टीकरण दिया है। उनसे पूछा गया था कि क्या भारतीय पासपोर्ट का इस्तेमाल एसआईआर (गहन पुनरीक्षण) के दौरान मतदाता सूची से बाहर किए जाने को चुनौती देने के लिए किया जा सकता है?”
इसके बाद जाहिर तौर पर, यह सवाल भी उठने लगे हैं कि आखिर पासपोर्ट के मामले में इस तरह का स्पष्टीकरण जारी करने का आधार क्या है? जबकि, सरकार के स्तर पर सबको पता है कि ऐसा कहते ही विवाद होगा, दुविधा की स्थिति बन जाएगी, फिर भी? तो इसका जवाब है भारतीय पासपोर्ट अधिनियम में। भारत सरकार ने यह कानून वर्ष 1967 में बनाया। उस वक्त, फरवरी में हुए लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करके इन्दिरा गाँधी प्रधानमंत्री बनीं थीं। उनकी सरकार ने 24 जून को संसद से भारतीय पासपोर्ट अधिनियम पारित कराया। इसमें धारा-20 के तहत एक विशेष प्रावधान जोड़ा गया। उसके अनुसार, भारत सरकार ‘विशेष परिस्थिति में सार्वजनिक हित’ को ध्यान में रखते हुए गैर-भारतीयों को भी भारतीय पासपोर्ट जारी कर सकती है। ‘पीले’ रंग का!
यानि, इसी एक कानूनी पेंच की वजह से भारतीय पासपोर्ट की स्थिति भारत की नागरिकता से जुड़े अंतिम दस्तावेज के रूप में कमजोर हो गई। सो, अब सवाल यह है कि इन्दिरा गाँधी की सरकार ने यह बंदोबस्त किसके लिए किया? क्या तिब्बत के शरणार्थियों की मदद के लिए? हो सकता है। या फिर अपनी होने वाली बहू के लिए? यह भी संभव है। इस दूसरे प्रश्न के संदर्भ में यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इन्दिरा गाँधी के बड़े पुत्र राजीव का विवाह 25 फरवरी 1968 को ‘इतालवी नागरिक’ सोनिया माइनो के साथ हुआ था। यानि भारतीय पासपोर्ट कानून बनने के करीब आठ महीने बाद। और यही नहीं, गौर करने लायक यह भी कि विवाह के करीब 15 साल बाद तक सोनिया इटली की नागरिक रहीं थीं। उन्होंने 30 अप्रैल 1983 को भारतीय नागरिकता ली थी।
लिहाजा, अब बाकी बात को समझना-समझाना पढ़ने वालों के विवेक पर छोड़ना ठीक होगा।
