अंग्रेजों की पसंद की चित्रकारी, कलाकारी का सिलसिला पहली बार कहाँ से शुरू हुआ?

माइकल एडवर्ड्स की पुस्तक ‘ब्रिटिश भारत’ से, 22/9/2021

अंग्रेजों से पहले हिन्दुस्तान में कलात्मक गतिविधियाँ मुख्य रूप से राजदरबारों तक सीमित थीँ। लेकिन मुग़लिया सल्तनत के पतन के बाद दरबारी चित्रकार, कलाकार बेकार हो गए। लिहाज़ा, उन्होंने संरक्षण की आस में अंग्रेजों के ठिकानों की तरफ़ रुख़ किया। लेकिन यहाँ भारतीय कलाकारों, चित्रकारों की सफलता दो कारकों पर निर्भर थी। पहला- अंग्रेजों के पास उन्हें अपने पास रखने का कोई कारण हो। दूसरा- कलाकार अपने नए संरक्षकों की ज़रूरतों और तकनीकों को समझें। उन्हें अपनाने के लिए तैयार हों। हिंदुस्तानी कलाकारों ने यह लचीलापन दिखाया भी। हालाँकि एक और कारण था, जो अंग्रेजों को भारतीय कलाकारों के संरक्षण के लिए प्रेरित कर रहा था। दरअसल, अंग्रेज अपने मुल्क में मित्रों, परिचितों को भारतीय त्योहारों, समारोहों आदि के चित्र भेजने के शौक़ीन थे। ताकि यहाँ की स्मृतियों को वहाँ सुरक्षित रखा जा सके। इस तरह के चित्रों के एवज़ में भारत में मौज़ूद यूरोपीय चित्रकार काफ़ी रकम वसूलते थे। जबकि भारतीय चित्रकार से उन्हें ये बेहद कम दामों में उपलब्ध करा देते थे। लिहाज़ा, भारतीय चित्रकारों को उन्होंने संरक्षण देने से परहेज़ नहीं किया।

वैसे, कह सकते हैं कि अंग्रेजों की पसंद की चित्रकारी/कलाकारी का सिलसिला पहली बार क़ायदे से, बंगाल के मुर्शिदाबाद से शुरू हुआ। वहाँ बंगाल के नवाबों के दरबारी कलाकार पहले मुग़ल शैली के बड़े चित्र बनाते थे। लेकिन 1757 में अंग्रेजों के आधिपत्य के बाद नवाबों की ताक़त कम हो गई। मुर्शिदाबाद में अंग्रेजों की आबादी बढ़ गई तो कलाकारों ने रोज़ग़ार के लिए उनकी पसंद के हिसाब से छोटे-छोटे चित्र बनाने शुरू कर दिए। अबरख़ की पतली पत्तर पर चित्रकारी की। यह चित्रकारी अंग्रेजों के बीच 1700 के मध्य से ही लोकप्रिय थी। लिहाज़ा उन्होंने भारतीय कलाकारों के प्रयास को भी पसंद किया। वे उनसे स्थानीय तीज-त्योहारों, समारोहों को प्रदर्शित करने वाले चित्रों की माँग करने लगे। इस तरह यह ‘उद्यम’ 1850 तक लगातार विकसित हुआ, जब तक कि मुर्शिदाबाद में अंग्रेजों की आबादी घटने नहीं लगी।

हालाँकि पटना के चित्रकार कहीं अधिक तेजी से अंग्रेजों की शैली अपना रहे थे। इसीलिए वे कारोबार, अधिग्रहण, आक्रमण जैसे विषयों पर चित्र बना रहे थे। उन्होंने कागज आदि पर चित्र बनाने की विधा भी सीख ली थी। साथ ही, पनीले रंगों (वॉटर कलर्स) का इस्तेमाल भी। स्थानीय अंग्रेज रहवासियों से पटना शैली की इस भारतीय चित्रकारी को खूब संरक्षण मिला। साथ ही ब्रिटिश पर्यटकों का भी प्रश्रय मिला, जो अच्छी-खासी संख्या में आते थे। ऐसे ही एक थे, सर चार्ल्स डी ओली। ओली 1833 तक पटना में अफ़ीम कारोबार के एजेंट थे। ख़ुद भी अच्छे कलाकार और शैल चित्रकार थे। उन्होंने जयराम दास नामक एक स्थानीय चित्रकार को खूब प्रोत्साहन दिया। उन्हें यूरोपीय तकनीक से काम करने वाले अन्य कलाकारों से मिलवाने में मदद की। अन्य स्थानीय कलाकारों ने ओली की कलाकृतियों की नकल भी की। पटना के कलाकारों ने मुर्शिदाबाद की ‘अबरख़ चित्रकारी’ को भी अपनाया। कारण कि वह अंग्रेजों के बीच वह पहले से लोकप्रिय थी। मग़र 20वीं सदी की शुरुआत से पटना चित्रकारी का कारोबार सिमटने लगा। 

वहीं, लखनऊ की स्थिति थोड़ी अलग थी क्योंकि अवध प्रांत 1856 तक ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल नहीं था। लिहाज़ा, यहाँ यूरोपीय और भारतीय चित्रकारों ने आज़ादी से एक-दूसरे की शैली अपनाई। अवध के नवाबों ने भी सबको संरक्षण दिया। चाहे हिंदुस्तानी हों या यूरोपीय। यहाँ अंग्रेज चूँकि थोड़ी प्रभावशाली स्थिति में थे, इसलिए उनकी शैली का असर स्थानीय चित्रकला पर अधिक दिखा। विशेष रूप से समृद्ध चटकीली मुग़ल शैली से मद्धम पनीले-रंगों वाली बारीक ब्रिटिश शैली की ओर बदलाव दिखा।

दिल्ली में भी अंग्रेजों ने समृद्ध पारंपरिक मुग़ल शैली की चित्रकला को मौज़ूद पाया। उसके आकर्षण से अंग्रेज अछूते नहीं रह सके। उन्होंने अपने चित्रकारों को मुग़ल शैली की नकल करने के लिए प्रोत्साहित किया। साथ ही, उन्होंने मनोरम दृश्यों वाले चित्रों की भी माँग की। यह माँग समझी भी जा सकती थी क्योंकि उस समय दिल्ली अतीत के समृद्ध स्मारकों से भरी हुई थी। फिर 1830 तक ‘हाथीदाँत की चित्रकारी’ (ऐसी पत्तर पर चित्र बनाना जो हाथीदाँत या उस जैसे अन्य पदार्थ से बनी हो) प्रचलन में आ गई। आकृति-चित्रों और दृश्यावली खींचने के लिए इसी का प्रयोग होने लगा। इसके बाद छायाचित्रकारी (फोटोग्राफ़ी) अस्तित्व में आई। इससे छायाचित्रों की नकल जैसी चित्रकारी की माँग बढ़ी और कलाकारों ने बहुत हद तक अपनी पुरानी कठिन शैली को छोड़ दिया, पहले वे जिसके पक्षधर थे।

दक्षिण में ब्रिटिश-भारत कलाकर्म का केंद्र तंजोर था। वहाँ मुगल शैली के चित्रकारों का समूह 1770 से पहले ही हैदराबाद से आकर बस गया था। इन कलाकारों के बनाए पारंपरिक चित्र यूरोपीय समुदाय को पसंद आ रहे थे। इन कलाकृतियों का व्यापार 17वीं सदी में पश्चिमी तट पर डच ठिकानों के साथ किया जाता था। ये कलाकृतियाँ ख़ास ‘दक्खनी शैली’ में बन रही थीं। लेकिन जैसे-जैसे तंजोर में अंग्रेजों का प्रभाव बढ़ा, वहाँ के कलाकारों ने भी अपनी शैली में परिवर्तन किए। इन परिवर्तनों के लिए तंजोर के राजा शरभोजी भोंसले (शरफोजी-2) भी कुछ हद तक ज़िम्मेदार थे। उनकी शिक्षा-दीक्षा मद्रास में लूथरन मिशनरी के शिक्षा केंद्र से हुई थी। इसलिए जाहिरन उनकी पसंद यूरोपियों जैसी हो गई थी। उन्होंने उसी के अनुरूप कलाकारों को कलाकृतियाँ बनाने के लिए प्रोत्साहित किया। 

ऐसे ही, वास्तुशिल्प की बात करें तो ब्रिटिश शैली ने अपरिहार्य रूप से इस क्षेत्र में भी असर छोड़ा। इस असर के कारण भारत के लोग पहले ब्रिटिश पारंपरिक और फिर नव-जर्मन (नियो-गॉथिक) शैली अपनाने के लिए प्रेरित हुए। हालाँकि लखनऊ इस मामले में भी अलग था। वहाँ मुग़ल और पारंपरिक भारतीय शैलियों के मिश्रण वाला वास्तुशिल्प ही काफ़ी समय तक लोकप्रिय रहा। उस बारे में एक दक्ष विवेचक बिशप हेबर का मानना था कि कई मायनों में ‘लखनऊ ड्रेसडेन (जर्मनी का शहर) से मिलता है। हालाँकि यहाँ के राजमार्ग ऑक्सफोर्ड (इंग्लैंड का शहर) के मुख्य मार्गों की याद दिलाते हैं।’ उधर, दक्षिण में तंजोर के राजा सरफोजी ने अपने लिए जो महल बनवाया, वह ख़ास भारतीय और यूरोपीय वास्तुशिल्प के मिश्रण का उदाहरण बना। जबकि कलकत्ता जैसे शहरी इलाकों में तेजी से बढ़ता मध्य वर्ग निर्माण कार्यों में विशिष्ट पश्चिमी शैली को प्राथमिकता दे रहा था। समसामयिक चलन के मुताबिक उनके भवनों में कॉरेंथियन (यूनानी शहर कॉरिंथ से जुड़ी शैली) स्तंभ नज़र आने लगे थे। 

(जारी…..)

अनुवाद : नीलेश द्विवेदी 
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(‘ब्रिटिश भारत’ पुस्तक प्रभात प्रकाशन, दिल्ली से जल्द ही प्रकाशित हो रही है। इसके कॉपीराइट पूरी तरह प्रभात प्रकाशन के पास सुरक्षित हैं। ‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ श्रृंखला के अन्तर्गत प्रभात प्रकाशन की लिखित अनुमति से #अपनीडिजिटलडायरी पर इस पुस्तक के प्रसंग प्रकाशित किए जा रहे हैं। देश, समाज, साहित्य, संस्कृति, के प्रति डायरी के सरोकार की वज़ह से। बिना अनुमति इन किस्सों/प्रसंगों का किसी भी तरह से इस्तेमाल सम्बन्धित पक्ष पर कानूनी कार्यवाही का आधार बन सकता है।)
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पिछली कड़ियाँ : 
36. राजा राममोहन रॉय के संगठन का शुरुआती नाम क्या था?
35. भारतीय शिक्षा पद्धति के बारे में मैकॉले क्या सोचते थे?
34. पटना में अंग्रेजों के किस दफ़्तर को ‘शैतानों का गिनती-घर’ कहा जाता था?
33. अंग्रेजों ने पहले धनी, कारोबारी वर्ग को अंग्रेजी शिक्षा देने का विकल्प क्यों चुना?
32. ब्रिटिश शासन के शुरुआती दौर में भारत में शिक्षा की स्थिति कैसी थी?
31. मानव अंग-विच्छेद की प्रक्रिया में हिस्सा लेने वाले पहले हिन्दु चिकित्सक कौन थे?
30. भारत के ठग अपने काम काे सही ठहराने के लिए कौन सा धार्मिक किस्सा सुनाते थे?
29. भारत से सती प्रथा ख़त्म करने के लिए अंग्रेजों ने क्या प्रक्रिया अपनाई?
28. भारत में बच्चियों को मारने या महिलाओं को सती बनाने के तरीके कैसे थे?
27. अंग्रेज भारत में दास प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुप्रथाएँ रोक क्यों नहीं सके?
26. ब्रिटिश काल में भारतीय कारोबारियों का पहला संगठन कब बना?
25. अंग्रेजों की आर्थिक नीतियों ने भारतीय उद्योग धंधों को किस तरह प्रभावित किया?
24. अंग्रेजों ने ज़मीन और खेती से जुड़े जो नवाचार किए, उसके नुकसान क्या हुए?
23. ‘रैयतवाड़ी व्यवस्था’ किस तरह ‘स्थायी बन्दोबस्त’ से अलग थी?
22. स्थायी बंदोबस्त की व्यवस्था क्यों लागू की गई थी?
21: अंग्रेजों की विधि-संहिता में ‘फौज़दारी कानून’ किस धर्म से प्रेरित था?
20. अंग्रेज हिंदु धार्मिक कानून के बारे में क्या सोचते थे?
19. रेलवे, डाक, तार जैसी सेवाओं के लिए अखिल भारतीय विभाग किसने बनाए?
18. हिन्दुस्तान में ‘भारत सरकार’ ने काम करना कब से शुरू किया?
17. अंग्रेजों को ‘लगान का सिद्धान्त’ किसने दिया था?
16. भारतीयों को सिर्फ़ ‘सक्षम और सुलभ’ सरकार चाहिए, यह कौन मानता था?
15. सरकारी आलोचकों ने अंग्रेजी-सरकार को ‘भगवान विष्णु की आया’ क्यों कहा था?
14. भारत में कलेक्टर और डीएम बिठाने की शुरुआत किसने की थी?
13. ‘महलों का शहर’ किस महानगर को कहा जाता है?
12. भारत में रहे अंग्रेज साहित्यकारों की रचनाएँ शुरू में किस भावना से प्रेरित थीं?
11. भारतीय पुरातत्व का संस्थापक किस अंग्रेज अफ़सर को कहा जाता है?
10. हर हिन्दुस्तानी भ्रष्ट है, ये कौन मानता था?
9. किस डर ने अंग्रेजों को अफ़ग़ानिस्तान में आत्मघाती युद्ध के लिए मज़बूर किया?
8.अंग्रेजों ने टीपू सुल्तान को किसकी मदद से मारा?
7. सही मायने में हिन्दुस्तान में ब्रिटिश हुक़ूमत की नींव कब पड़ी?
6.जेलों में ख़ास यातना-गृहों को ‘काल-कोठरी’ नाम किसने दिया?
5. शिवाजी ने अंग्रेजों से समझौता क्यूँ किया था?
4. अवध का इलाका काफ़ी समय तक अंग्रेजों के कब्ज़े से बाहर क्यों रहा?
3. हिन्दुस्तान पर अंग्रेजों के आधिपत्य की शुरुआत किन हालात में हुई?
2. औरंगज़ेब को क्यों लगता था कि अकबर ने मुग़ल सल्तनत का नुकसान किया? 
1. बड़े पैमाने पर धर्मांतरण के बावज़ूद हिन्दुस्तान में मुस्लिम अलग-थलग क्यों रहे?

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