दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है… दिल के डॉक्टर को दिल ही धोख़ा दे गया, क्यों?

टीम डायरी

अभी दो रोज़ पहले एक ख़बर प्रमुखता से सुर्ख़ियों में आई। गुजरात के डॉक्टर गौरव गाँधी के बारे में। जामनगर के रहने वाले डॉक्टर गौरव का महज 41 साल की उम्र में निधन हो गया। वह दिल की बीमारियों के डॉक्टर थे। इतनी सी उम्र में उन्होंने 16,000 से अधिक ऑपरेशन कर लोगों को दिल के मर्ज़ से राहत दिलाई थी। लेकिन उन्हें उनका अपना दिल ही दगा दे गया। इसी सोमवार की रात वह सामान्य दिनचर्या के अनुसार भोजन करने के बाद सोने गए। लेकिन अगली सुबह मंगलवार को उठे नहीं। परिवार वालों को अचेत अवस्था में मिले। आनन-फानन में उन्हें बड़े अस्पताल ले जाया गया। वहाँ पता चला कि दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन अस्पताल पहुँचने से पहले ही हो चुका है।

इस घटना के बाद एक बार फिर वही सवाल उठे, जो हमेशा ऐसे मामलों के बाद उठते रहे हैं कि इस तरह अचानक दिल का दौरा पड़ने से कम उम्र के लोगों की मौत क्यों हो रही है? ऐसी घटनाएँ पिछले कुछ समय से बढ़ क्यों रही हैं? इनके ज़वाब भी जब-तब सामने आए हैं। लेकिन उन ज़वाबों पर फिर से ग़ौर करना ज़रूरी है। बल्कि बार-बार उनसे गुजर कर उन्हें अच्छी तरह याद रख लेने की ज़रूरत है। ताकि हम अपनी और अपने आस-पास किसी की ज़िन्दगी बचा सकें तो बचा लें। क्योंकि इन्हीं ज़वाबों में बचाव के रास्ते भी छिपे हैं। इनके मुताबिक, दिल का दौरा पड़ने का प्रमुख कारण है ख़राब मानसिक स्थिति, तनाव, आदि। दूसरे कारण भी हैं। लेकिन मानसिक कारण सबसे प्रमुख है।

कुछ समय पहले इंडियन हार्ट एसोसिशन के एक शोध अध्ययन के निष्कर्ष सामने आए थे। उसमें बताया गया था कि 20 से 39 साल के लोगों में हर आठ में एक व्यक्ति तनाव, अवसाद, चिन्ता जैसी किसी न किसी मानसिक समस्या से पीड़ित है। शायद इसीलिए देश में साल 2000 से 2016 के बीच 40 साल से कम उम्र के युवाओं को दिल का दौरा पड़ने के मामले सालाना दो-तीन फ़ीसद की दर से बढ़ चुके हैं। आज स्थिति यह है कि दिल के दौरे से जान गँवाने वालों में हर चार में से एक व्यक्ति 40 साल से कम उम्र का पाया जा रहा है। जानकारों की मानें तो पहले से ही गम्भीर होती इस स्थिति को कोरोना महामारी ने और अधिक बिगाड़ दिया है। इस सम्बन्ध में भी शोध हुए हैं।

डॉक्टर नरेश त्रेहन और डॉक्टर सुभाष चन्द्रा जैसे देश के जाने-माने और वरिष्ठ विशेषज्ञों के हवाले से हाल ही में एक जानकारी सामने आई थी। इसमें इन विशेषज्ञों ने बताया था कि कोरोना की दूसरी लहर के दौरान जो लोग संक्रमित हुए, उनके सिर्फ़ फेंफड़ों पर ही महामारी ने असर नहीं छोड़ा था। उन लोगों दिल और दूसरे अंगों पर भी कोरोना के दुष्प्रभाव हुए, जो अब सामने आ रहे हैं। इन्हीं दुष्प्रभावों में एक यह भी है कि तमाम लोगों के दिलों में अन्दरूनी हिस्से में सूजन आ गई है। इस कारण अचानक से दिल की धड़कनें अनियमित होने, उनकी लय बिगड़ जाने जैसी परिस्थितियाँ बन रही हैं। इस दौरान सीने में तेज जलन जैसी भी महसूस होती है। और पीड़ित व्यक्ति का दिल बैठ जाता है। एक झटके में काम करना बन्द कर देता है। इससे उसकी मौत हो जाती है। इस तरह की स्थितियाँ तब अधिक बनती हैं, जब व्यक्ति शारीरिक व्यायाम आदि कर रहा हो। रात को कुछ भारी सा खा-पीकर सोया हो। या फिर किन्हीं कारणों से मानसिक तौर पर दबाव में, चिन्ता में हो।

सो, अब सवाल ये कि बचाव का रास्ता क्या है? कहने के लिए बहुत साधारण सा है। ये कि ख़ुद को सबसे पहले तो चिन्तामुक्त, दबावमुक्त रखें। क्योंकि जो होना है, वह तो होना ही है। ऐसे में चिन्ता या दबाव लेने का मतलब नहीं है। लिहाज़ा, पेड़-पौधों के साथ कुछ वक़्त बिताएँ। संगीत, साहित्य में रुचि हो तो उसे थोड़ा वक़्त दें। ये सब नहीं तो दोस्तों के साथ समय बिताएँ। मौज़-मस्ती गपबाज़ी का एक निश्चित और नियमित सत्र रखें। और कुछ नहीं तो कभी-कभार यूट्यूब वग़ैरा पर जाकर जानवरों, पक्षियों आदि की चुहलबाज़ियों के वीडियो देख-देखकर ठहाके लगा लें। हँसी-मज़ाक के भी बहुत सारे वीडियो मिल ही जाएँगे। ख़ान-पान हल्का और सन्तुलित रखें। व्यायाम या सैर-सपाटा भी बहुत भारी न हो तो बेहतर और जंक-फूड तथा हैल्थ-सप्लीमेन्ट्स से तो बिल्कुल तौबा कर लें।

हालाँकि, अनुशासन के साथ ये सभी चीज़ें करना और करते रहना किसी-किसी को मुश्किल भी लग सकता है पर करना ही होगा। क्योंकि याद रखिएगा, हमारा जीवन सिर्फ़ हमारे लिए नहीं, हमारे पूरे परिवार के लिए मायने रखता है। इसे हम अपनी ग़लती या लापरवाही से यूँ जाया नहीं कर सकते।

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Neelesh Dwivedi

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