वह तरबूज चबाते हुए कह रहे थे- सात दिसंबर और भोपाल को भूल जाइए

विजय मनोहर तिवारी की पुस्तक, ‘भोपाल गैस त्रासदी: आधी रात का सच’ से, 21/1/2022

हम तय वक्त पर मोतीसिंह के घर पहुंचे। दुआ-सलाम से ही लग गया कि वे तेल चुपड़े पहलवान की तरह सामने विराजित हैं, जो यह तय करके बैठे थे कि पकड़ में नहीं आना है। इसलिए दिसंबर 1984 के किसी भी सवाल पर उनका रटा रटाया सा जवाब मिलता-‘नो कमेंट।’ कोई और बात कीजिए। उन्होंने कहा कि इस मीटिंग के पहले हम तय कर चुके हैं कि इस बारे में कोई बात नहीं होगी। यह समय गुजर जाने दीजिए फिर इत्मीनान से इस बारे में बात होगी। हादसे से जुड़े हर सवाल पर वे एक और बात दोहराते गए, ‘मेरी किताब पढ़िए। उसमें मैंने सब कुछ लिख दिया है। आपके हर सवाल का जवाब मेरी किताब में है। ‘ 

करीब एक घंटा 12 मिनट की बातचीत में हमने उनसे कई सवाल किए। उन्हें खूब उत्तेजित किया। यहां तक कह दिया कि अब आप किससे डर रहे हैं? अब तो सब कुछ गुजर चुका है। कोई क्या बिगाड़ेगा? बिगाड़ने को बचा भी क्या है? आप अपने नाम के आगे सिंह लगाते हैं तो सिंह की तरह सामने आइए। सच कहने का साहस कीजिए। मैंने उनसे पूछा कि जिस दिन आप एंडरसन को एयरपोर्ट तक छोड़ने गए, उस रात आप ठीक से सो पाए होंगे, जब भोपाल में पांच से सात हजार लाशें बिछी हुई थीं? वे टस से मस नहीं हुए और हादसे के बारे कुछ नहीं कहा। 

एक ऐसा अफसर जिसने एंडरसन को बाइज्जत भोपाल मे निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इतने साल बाद अब जब उस मामले में आग लगी हुई थी, तब वह सोफे पर टिककर सींक से तरबूत के टुकड़े निगलते हुए बहुत बेफिक्र अंदाज में कह रहा था कि सात दिसंबर और भोपाल को भूल जाइए।… 

जब मीडिया का ध्यान मोतीसिंह की तरफ गया तो सहज ही स्वराज पुरी भी फोकस में आ गए, जो हादसे के समय पुलिस अधीक्षक थे। जैसा कि हम चर्चा कर चुके हैं कि इन साहब के चंद सेकंड के शर्मनाक फुटेज टीवी चैनलों पर 25 साल बाद नजर आए। नीले-हरे रंग की कलेक्टर की एम्बेसडर कार को ड्राइव करते हुए और कैमरा पर्सन के सामने हाथ हिलाकर अभिवादन सा करते हुए यह फुटेज सात दिसंबर 1984 के भोपाल के एयरपोर्ट के थे। वे कुशल वाहन चालक के रूप में वॉरेन एंडरसन को ढोकर ला रहे थे। जिस वक्त शहर में पांच-सात हजार लाशें बिछी हुई थीं, जब भोपाल के श्मशान घाटों पर सैकड़ों सामूहिक चिताएं लगातार जल रही थीं, जब कब्रस्तानों में मुर्दों को दफनाने के लिए जमीन का टोटा पड़ गया था और कफन-दफन का सामान बेचने वाले भी वक्त की बेरहमी को कोस रहे थे, तब इन मौतों के सबसे बड़े जिम्मेदार आदमी को शहर का पुलिस कप्तान खुद कार चलाकर सुरक्षित ले जा रहा था।

पुरी साहब ने हादसे के बीत जाने के सालों बाद तक मजे से नौकरी की। सारे प्रमोशन और दीगर फायदे पाए। बड़े शहरों में रहे। आईजी और डीजीपी तक बने। सियासत और मीडिया की हस्तियों से नजदीकी ताल्लुक बनाए और वक्त-बेवक्त भुनाया भी। डीजीपी के रूप में उन्हें अपने पद से हटना पड़ना था। वे अपने बेटे को गलत ढंग से एनआरआई कोटे में इंदौर के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिले को लेकर बदनाम हुए थे। आरोपों के चलते उनकी कुर्सी चली गई थी।

सेवामुक्त होने के बाद नर्मदा घाटी के बांध विस्थापितों के लिए गठित शिकायत निवारण प्राधिकरण में पुनर्वास से उनके बंगला-गाड़ी की सुविधाएं बनी रहीं होंगी, जिनमें इन कमजोर तोतों की जान बसी होती है। भाजपा के एक नेता ने बताया कि इस पदस्थापना से भी साहब खुश थे। वे किसी दूसरे तगड़े मलाईदार मौके को पाने की कोशिश में लगे थे। लेकिन जैसे ही मोतीसिंह चर्चाओं में आए तो गुजरे जमाने की फिल्मी जोड़ी की तरह अमिताभ बच्चन के साथ शशि कपूर का भी फिल्म में आना लाजिमी हो गया। 

मोतीसिंह इस वक्त किसी ओहदे पर नहीं थे, इसलिए उनकी फजीहत सिर्फ मीडिया तक सीमित रही, लेकिन पुरी साहब तो लाल बत्ती में थे। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान इस वक्त विदेश यात्रा पर हैं और वहीं से उन्होंने इन्हें पद से हटाने का फैसला मध्यप्रदेश की छह करोड़ जनता को सुनाया। यहां के सरकारी अफसरों की ओर से बाकायदा उन्हें राज्यमंत्री का प्रचारित किया गया, जबकि ऐसा था नहीं। ऐसा करके दुम हिलाऊ अफसरों की समकालीन पीढ़ी ने यह जताने की कोशिश की जैसे सरकार ने बहुत बड़ी कार्रवाई कर दी हो। जिस दिन उन्हें हटाने की घोषणा हुई, उस दिन सरकार के प्रवक्ता नरोत्तम मिश्रा ने एक कदम आगे बढ़कर कहा कि इनसे राष्ट्रपति पदक वापस लेने पर भी विचार होगा। अचानक ही राज्य सकार जागने की मुद्रा में आई। नाखून काटकर शहादों की श्रेणी में नाम जुड़वाती हुई।

…जैसा कि फिल्मों में होता है, एक्टर किसी और की लिखी है। निर्देशित की हुई फिल्म में वही कर रहे होते हैं, जैसा कि उन्हें है। पूरी साहब भी उस दिन की फिल्म में ऐसे ही किरदार में थे, स्क्रिप्ट किसी और ने लिखी थी और कोई और ही उसे निर्देशित कर रहा था। हालांकि उनके लिए यह जरूरी कतई नहीं था, लेकिन अपने आकाओं के हुक्म का पालन करना ही उन्होंने मुनासिब समझा। अक्सर मलाईदार पदों की उम्मीद में अफसर अपने राजनीतिक आकाओं के आगे ऐसे ही गिरे-पड़े रहते हैं। वे अपने फायदों के फ्रेम से बाहर नहीं सोचते। जनहित, निष्ठा या ईमानदारी का कोई मजबूत चारित्रिक उदाहरण पेश नहीं करते, जो दूसरों के लिए भी एक नजीर बने।

दुर्भाग्य यह है कि यह फिल्म नहीं, जीती-जागती हकीकत थी। इसमें संभावना पूरी थी कि पुरी अपनी भूमिका खुद लिखते। वे या मोतीसिंह चाहते तो इतिहास बना सकते थे। खैर…
(जारी….)
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(नोट : विजय मनोहर तिवारी जी, मध्य प्रदेश के सूचना आयुक्त, वरिष्ठ लेखक और पत्रकार हैं। उन्हें हाल ही में मध्य प्रदेश सरकार ने 2020 का शरद जोशी सम्मान भी दिया है। उनकी पूर्व-अनुमति और पुस्तक के प्रकाशक ‘बेंतेन बुक्स’ के सान्निध्य अग्रवाल की सहमति से #अपनीडिजिटलडायरी पर यह विशेष श्रृंखला चलाई जा रही है। इसके पीछे डायरी की अभिरुचि सिर्फ अपने सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक सरोकार तक सीमित है। इस श्रृंखला में पुस्तक की सामग्री अक्षरश: नहीं, बल्कि संपादित अंश के रूप में प्रकाशित की जा रही है। इसका कॉपीराइट पूरी तरह लेखक विजय मनोहर जी और बेंतेन बुक्स के पास सुरक्षित है। उनकी पूर्व अनुमति के बिना सामग्री का किसी भी रूप में इस्तेमाल कानूनी कार्यवाही का कारण बन सकता है।)
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श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ 
23. गैस हादसा भोपाल के इतिहास में अकेली त्रासदी नहीं है
22. ये जनता के धन पर पलने वाले घृणित परजीवी..
21. कुंवर साहब उस रोज बंगले से निकले, 10 जनपथ गए और फिर चुप हो रहे!
20. आप क्या सोचते हैं? क्या नाइंसाफियां सिर्फ हादसे के वक्त ही हुई?
19. सिफारिशें मानने में क्या है, मान लेते हैं…
18. उन्होंने सीबीआई के साथ गैस पीड़तों को भी बकरा बनाया
17. इन्हें ज़िन्दा रहने की ज़रूरत क्या है?
16. पहले हम जैसे थे, आज भी वैसे ही हैं… गुलाम, ढुलमुल और लापरवाह! 
15. किसी को उम्मीद नहीं थी कि अदालत का फैसला पुराना रायता ऐसा फैला देगा
14. अर्जुन सिंह ने कहा था- उनकी मंशा एंडरसन को तंग करने की नहीं थी
13. एंडरसन की रिहाई ही नहीं, गिरफ्तारी भी ‘बड़ा घोटाला’ थी
12. जो शक्तिशाली हैं, संभवतः उनका यही चरित्र है…दोहरा!
11. भोपाल गैस त्रासदी घृणित विश्वासघात की कहानी है
10. वे निशाने पर आने लगे, वे दामन बचाने लगे!
9. एंडरसन को सरकारी विमान से दिल्ली ले जाने का आदेश अर्जुन सिंह के निवास से मिला था
8.प्लांट की सुरक्षा के लिए सब लापरवाह, बस, एंडरसन के लिए दिखाई परवाह
7.केंद्र के साफ निर्देश थे कि वॉरेन एंडरसन को भारत लाने की कोशिश न की जाए!
6. कानून मंत्री भूल गए…इंसाफ दफन करने के इंतजाम उन्हीं की पार्टी ने किए थे!
5. एंडरसन को जब फैसले की जानकारी मिली होगी तो उसकी प्रतिक्रिया कैसी रही होगी?
4. हादसे के जिम्मेदारों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए थी, जो मिसाल बनती, लेकिन…
3. फैसला आते ही आरोपियों को जमानत और पिछले दरवाज़े से रिहाई
2. फैसला, जिसमें देर भी गजब की और अंधेर भी जबर्दस्त!
1. गैस त्रासदी…जिसने लोकतंत्र के तीनों स्तंभों को सरे बाजार नंगा किया! 

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