तिरुपति बालाजी मन्दिर जैसे बड़े धर्मस्थल भ्रष्टाचार का अड्डा बन रहे हैं, धर्मगुरु चुप क्यों हैं?

टीम डायरी

आन्ध्र प्रदेश के तिरुपति बालाजी मन्दिर में एक और घोटाले का पर्दाफाश हुआ है। इस बार मन्दिर प्रबन्धन की ओर से विशिष्ट अवसरों पर अतिथियों को ओढ़ाए जाने वाले रेशम के शॉल का मामला है। सूचना है कि 2015 से 2015 के बीच 10 सालों में मन्दिर को जिन शॉलों की आपूर्ति की गई वे रेशम के थे ही नहीं, बल्कि पॉलिएस्टर के बने थे। जबकि मन्दिर की ओर से खास मापदण्डों वाले रेशम के शॉल ही वितरित करने का नियम है। यही नहीं, रेशम के शॉल बताकर 350 रुपए की कीमत वाले पॉलिएस्टर के शॉलों की 1300 रुपए में मन्दिर को आपूर्ति की गई। इस तरह से मन्दिर के तत्कालीन पदाधिकारियों और शॉल की आपूर्ति करने वालों ने मन्दिर के खजाने को 54.95 करोड़ रुपए का चूना लगा दिया। मन्दिर के वर्तमान प्रबन्धन की ओर से इस मामले की जाँच के आदेश दिए गए हैं। 

वैसे, यह पहला मौका नहीं है जब तिरुपति मन्दिर में किसी घोटाले का पर्दाफाश हुआ हो। इससे पहले सितम्बर-2024 में तो मौजूदा मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू ने ही ‘घी-घोटाले’ का खुलासा किया था। उन्होंने बताया था कि राज्य की पिछली सरकार के कार्यकाल के दौरान तिरुपति मन्दिर के लड्‌डू प्रसाद के लिए जिसे घी की आपूर्ति का ठेका दिया गया, उसने उसमें गौवंश की चर्बी, सुअर का चर्बी और मछली के तेल की मिलावट की। इस मामले की भी जाँच जारी है। इसमें भी मन्दिर के कोष को, जिसे भगवान श्री वेंकटेश (श्री हरि विष्णु) का खजाना कहा जाता है, भ्रष्टाचारियों ने करोड़ों रुपए की चपत लगाई थी। भक्तों की आस्था तथा उनकी धार्मिक पवित्रता को भी भंग किया था। 

इतना ही नहीं, साल 2024 के दिसम्बर महीने में मध्य प्रदेश के उज्जैन के महाकाल मन्दिर में ‘वीआईपी पर्ची घोटाले’ का खुलासा हुआ था। इसमें पता चला था कि मन्दिर में वीआईपी दर्शन की 200 रुपए की पर्ची को कुछ लोग बाहर 1,100 से लेकर 3,000 रुपए तक में बेच रहे हैं। खुद को भक्त समझने वाले सुविधाभोगी लोग सब कुछ जानते हुए भी इन पर्चियों को बेधड़क ऊँची कीमतों पर खरीदते भी रहे। महज इसलिए कि वे भीड़ से बचते हुए कम से कम समय में सुविधाजनक तरीके से महाकाल के दर्शन का लाभ ले सकें। इस ‘वीआईपी पर्ची घोटाले’ का खुलासा होने के बाद मन्दिर प्रबन्धन के कुछ पदाधिकारियों को भी अन्य आरोपियों के साथ गिरफ्तार किया गया था। 

इस तरह की सूचनाएँ किसी भी सामान्य आस्थावान व्यक्ति को भी विचलित कर देने के लिए काफी मानी जा सकती हैं। ऐसे में धर्मगुरुओं की चुप्पी बेहद आश्चर्यजनक है। वह भी तब जबकि देशभर में इन दिनों धर्म जागरण यात्राएँ निकालने की होड़ लगी हुई है। इसी क्रम में अभी तीन दिन पहले, सात दिसम्बर को बंगाल की राजधानी कोलकाता में एक बड़ा धार्मिक आयोजन हुआ। इसमें में करीब पाँच लाख लोगों ने एक साथ भगवद् गीता के पहले, नौवें ओर 18वें अध्याय का पाठ किया। इसमें कई धर्मगुरु इकट्‌ठे हुए, जिन्होंने हिन्दू जागरण की तमाम बातें कीं। 

बागेश्वर धाम के आचार्य धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री नवम्बर महीने में दिल्ली से वृन्दावन तक ‘सनातन एकता यात्रा’ निकाल चुके हैं। मकसद? सनातन हिन्दु धर्मावलम्बियों को एकजुट करना। वह आगे भी इस तरह यात्राएँ निकालने की घोषणा कर चुके हैं। इसके अलावा, अभी दो दिन पहले उत्तर प्रदेश के अयोध्या से एक ‘धर्म जागरण यात्रा’ शुरू हुई है। साधु संतों की यह यात्रा अगले पाँच साल तक चलने वाली है। देश के विभिन्न स्थलों से गुजरने वाली है। हर जगह जा-जाकर हिन्दु धर्मावलम्बियों को उनके धर्म, उनकी आस्था के प्रति सजग और जागरूक करने वाली है। 

ऐसे में, फिर सवाल वहीं आकर अटक जाता है कि साधु-संत जब धर्म जागरण के नाम पर इतना कुछ करने का जतन कर रहे हैं, तब धर्मस्थलों को अपवित्र करने वालों के प्रति चुप क्यों है? हिन्दु मन्दिरों को भ्रष्टाचार का अड्‌डा बनाने वालों की अनदेखी क्यों कर रहे हैं? उनके खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठाते? उन्हें दण्डित किए जाने का बन्दोबस्त क्यों नहीं करते? आखिर कौन सी चीज है, जो इन धर्मगुरुओं को ऐसा करने से रोक रही है? इन सवालों के जवाब उन्हें खोजने होंगे, देने होंगे, नहीं तो खुद उनकी मान-प्रतिष्ठा, प्रामाणिकता खतरे में पड़नी तय समझिए। 

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Neelesh Dwivedi

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