सम्यक कर्म : सही क्या, गलत क्या, इसका निर्णय कैसे हो?

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 27/7/2021

मेरे मित्र के बॉस नेत्रहीन हैं। उनका मानना है कि उनके द्वारा किए गए सभी कार्य सही ही हैं। चाहे वे कार्य दूसरों की नज़र में ग़लत या अनुचित ही क्यों न हो। हमारी नज़र में हम अक्सर सही ही होते हैं। दुर्योधन अपनी दृष्टि से, कहीं से भी स्वयं को अनुचित कैसे बता सकता है। चाहे दुर्योधन के आदेश से भरी सभा में किसी महिला की गरिमा को ही क्यों न चोट पहुँचाई गई हो। 

यही कर्म हैं, जो व्यक्ति के जीवन को सुन्दर या कष्टकर बना देते हैं। इन कर्मों को सम्यक बनाने का उपदेश भगवान बुद्ध अपने प्रतीत्य समुत्पाद में करते हैं। अंगुत्तर निकाय में ‘सम्यक कर्म’ का उपदेश देते हुए कहते हैं, “शरीर से शुभ कर्म, वाणी से शुभ कर्म और मन से शुभ कर्म स्मपूर्ण रूप से करणीय हैं। उस करणीय के करने से ही सु-परिणाम की आशा करनी चाहिए।” यहाँ बुद्ध यह भी कहते हैं, “दूसरे के दुष्कर्म करने से मैं असन्तुष्ट हुआ, उस असन्तुष्टि के कारण किसी से अपशब्द कहना शुरू कर दिया, इसमें मेरा ही दोष है।”  इसीलिए बुद्ध केवल स्वयं के शुभ कर्म को नहीं कहते, दूसरों या सभी के द्वारा शुभ कर्म हों, ऐसा उपदेश करते हैं। सभी शुभ कार्य करने लगें तो सभी सन्मार्गोन्मुख हो जाएँगे। हालाँकि समान्यत: ऐसा होता नहीं है। जैसे, उक्त बॉस के अनुसार वे सदा सही हैं।

गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं… 

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्‌॥ (गीता – 4.16)

मतलब- “कर्म क्या है और अकर्म क्या है? इस प्रकार का निर्णय करने में बुद्धिमान पुरुष भी मोहित हो जाते हैं। इसलिए हे अर्जुन! वह कर्म-तत्व मैं तुझे भलीभाँति समझाकर कहूँगा, जिसे जानकर तू अशुभ से अर्थात्‌ कर्मबन्धन से मुक्त हो जाएगा।”

अब ज़रा सोचें, भगवान जब स्वयं कह रहे हैं कि कर्म-अकर्म क्या है, इसमें अच्छे-अच्छे बुद्धिमान निर्णय नहीं कर पाते, तो सामान्य-जन के विषय में कहना ही क्या।

हालाँकि यहाँ बड़ी गम्भीर समस्या हो सकती है कि सही क्या, गलत क्या, इसका निर्णय कैसे हो? तो इसके निदान के लिए एक पंक्ति याद आ रही है..

तुलसी हरि गुरु करुणा बिना,
विमल विवेक न होई।

अर्थात्- हरि और गुरु की कृपा के बिना निर्मल विवेक नहीं होता। कर्म-अकर्म, सही-गलत, उचित-अनुचित के निर्णय का विवेक विकसित नहीं होता। इसलिए या तो हम ईश्वर की शरण लें या गुरु की।

अभी हाल ही में गुरु पूर्णिमा थी। गुरु की इसी महिमा को समझाने के लिए सम्भवत: इस उत्सव के मानने सोची गई होगी। गुरु, वह जो हमें अंधकार से प्रकाश के मार्ग पर ले जाकर जीवन को प्रकाशमय बना देता है। चाहे, हमारे पास आँखें न हों, लेकिन वह हमें शास्त्र रूपी आँखें प्रदान कर जीवन ही नहीं, अपितु पारलौकिक जीवन भी ज्ञान से प्रकाशित कर देता है।

वैसे, इसी सन्दर्भ में संस्कृत में एक और बड़ा सुन्दर श्लोक है, “यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा, शास्त्रं तस्य करोति किं। लोचनाभ्याम विहीनस्य, दर्पण:किं करिष्यति।” अर्थात् जिस व्यक्ति के पास स्वयं का विवेक नहीं है। शास्त्र उसका क्या करेगा? जैसे नेत्रहीन व्यक्ति के लिए दर्पण व्यर्थ है। 

अत: विवेकपूर्ण कर्म ही शुभ कर्म हैं। वे सद्धर्म के उत्पादक होते हैं। उनसे मानव का कल्याण होता है। यही बुद्ध के ‘सम्यक कर्म’ हैं।

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(अनुज, मूल रूप से बरेली, उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। दिल्ली में रहते हैं और अध्यापन कार्य से जुड़े हैं। वे #अपनीडिजिटलडायरी के संस्थापक सदस्यों में से हैं। यह लेख, उनकी ‘भारतीय दर्शन’ श्रृंखला की 21वीं कड़ी है।)
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अनुज राज की ‘भारतीय दर्शन’ श्रृंखला की पिछली कड़ियां ये रहीं….

20वीं कड़ी : सम्यक वचन : वाणी के व्यवहार से हर व्यक्ति के स्तर का पता चलता है

19वीं कड़ी : सम्यक ज्ञान, हम जब समाज का हित सोचते हैं, स्वयं का हित स्वत: होने लगता है

18वीं कड़ी : बुद्ध बताते हैं, दु:ख से छुटकारा पाने का सही मार्ग क्या है

17वीं कड़ी : बुद्ध त्याग का तीसरे आर्य-सत्य के रूप में परिचय क्यों कराते हैं?

16वीं कड़ी : प्रश्न है, सदियाँ बीत जाने के बाद भी बुद्ध एक ही क्यों हुए भला?

15वीं कड़ी : धर्म-पालन की तृष्णा भी कैसे दु:ख का कारण बन सकती है?

14वीं कड़ी : “अपने प्रकाशक खुद बनो”, बुद्ध के इस कथन का अर्थ क्या है?

13वीं कड़ी : बुद्ध की दृष्टि में दु:ख क्या है और आर्यसत्य कौन से हैं?

12वीं कड़ी : वैशाख पूर्णिमा, बुद्ध का पुनर्जन्म और धर्मचक्रप्रवर्तन

11वीं कड़ी : सिद्धार्थ के बुद्ध हो जाने की यात्रा की भूमिका कैसे तैयार हुई?

10वीं कड़ी :विवादित होने पर भी चार्वाक दर्शन लोकप्रिय क्यों रहा है?

नौवीं कड़ी : दर्शन हमें परिवर्तन की राह दिखाता है, विश्वरथ से विश्वामित्र हो जाने की!

आठवीं कड़ी : यह वैश्विक महामारी कोरोना हमें किस ‘दर्शन’ से साक्षात् करा रही है? 

सातवीं कड़ी : ज्ञान हमें दुःख से, भय से मुक्ति दिलाता है, जानें कैसे?

छठी कड़ी : स्वयं को जानना है तो वेद को जानें, वे समस्त ज्ञान का स्रोत है

पांचवीं कड़ी : आचार्य चार्वाक के मत का दूसरा नाम ‘लोकायत’ क्यों पड़ा?

चौथी कड़ी : चार्वाक हमें भूत-भविष्य के बोझ से मुक्त करना चाहते हैं, पर क्या हम हो पाए हैं?

तीसरी कड़ी : ‘चारु-वाक्’…औरन को शीतल करे, आपहुँ शीतल होए!

दूसरी कड़ी : परम् ब्रह्म को जानने, प्राप्त करने का क्रम कैसे शुरू हुआ होगा?

पहली कड़ी :भारतीय दर्शन की उत्पत्ति कैसे हुई होगी?

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