सांकेतिक तस्वीर
टीम डायरी
अभी क़रीब एक महीने पहले की बात है। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक बड़े लोकप्रिय कथावाचक श्रीमद्भागवतजी की कथा करने आए हुए थे। दूसरे दिन की कथा चल रही थी। उसमें उन्होंने महाभारत के द्रौपदी चीरहरण के प्रसंग का ज़िक्र किया। इसमें एक नहीं बल्कि चार-पाँच बार, पूरे आत्मविश्वास के साथ अश्वत्थामा को कृपाचार्य का पुत्र बताया। महाभारत युद्ध के दौरान कृपाचार्य का वध हुआ था, यह भी बताया। और यह भी कि भरी सभा में जब द्रौपदी का चीरहरण करने का प्रयास हो रहा था, तो कृपाचार्य ने ही अँगुली उठाकर भगवान श्रीकृष्ण की शरण में जाने का उन्हें संकेत किया था।
जबकि तथ्य ये है कि अश्वत्थामा और कृपाचार्य रिश्ते में मामा-भाँजे हैं। कृपाचार्य की जुड़वाँ बहन कृपी से गुरु द्रोणाचार्य का विवाह हुआ था, जिन्होंने अश्वत्थामा को जन्म दिया। यानि अश्वत्थामा के पिता द्रोणाचार्य थे। दूसरी बात- अश्वत्थामा और कृपाचार्य, दोनों ही चिरंजीवी माने जाते हैं। अर्थात् आज भी सूक्ष्मरूप में वे कहीं न कहीं रहते हैं, ऐसा विश्वास किया जाता है। मतलब कृपाचार्य का महाभारत में वध नहीं हुआ, द्रोणाचार्य का हुआ था।
अब इससे आगे कहानी यूँ है कि इस तथ्यात्मक त्रुटि की तरफ एक जागरूक श्रोता ने सम्बन्धित कथावाचक के प्रचारित फोन नम्बर पर वॉट्सएप सन्देश के माध्यम से ध्यान भी दिलाया। उनसे आग्रह किया कि अगले दिन की कथा में इस त्रुटि का सुधार कर लें तो अतिकृपा होगी। इससे उनके व्यक्तित्त्व के प्रति लोगों के दिलों में सम्मान ही बढ़ेगा। लेकिन महाराजजी ने ऐसा कुछ नहीं किया। वॉट्सएप सन्देश का ज़वाब भी आया, तो सिर्फ इतना कि उनके यूट्यूब चैनल, फेसबुक पेज आदि को अमुक-अमुक लिंक्स के जरिए फॉलो करें।
वैसे, यह कोई ऐसा इक़लौता मामला नहीं है। ऐसे मामले में लगातार सामने आते रहते हैं। सो, इस तरह के मामलों से किसी के भी मन में स्वाभाविक प्रश्न हो सकता है कि कथाव्यास की पीठ पर बैठे कथावाचक इतने आत्मविश्वास के साथ ग़लतियाँ कैसे कर लेते हैं? और फिर अगर भूलवश हो भी गई, तो ध्यान में आने या लाए जाने के बावजूद उन्हें सुधारते क्यों नहीं? तो इन प्रश्नों का ज़वाब नीचे दिए वीडियो में सुना और समझा जा सकता है।
इस वीडियो में देश के जाने-माने कथावाचक इन्द्रेशजी महाराज अपनी पहली कथा के समय का अनुभव बता रहे हैं। कह रहे हैं कि उस दौरान वे जब बहुत घबरा रहे थे तो उन्हें उनके नानाजी ने एक सूत्र दिया था। कहा था, “समझ लो कि सामने बैठे सभी लोग मूर्ख हैं। उन्हें कुछ नहीं आता।”
दरअस्ल, यही वह मूल समस्या भी है जिसकी वज़ह से हिन्दू धर्म के तमाम कथावाचकों को जागरूक वर्ग के लोग व्यवसायी की तरह कहने और मानने लगे हैं। इस तरह के लोगों में इन कथावाचकों के प्रति अधिक श्रद्धा जागृत नहीं होती। जो लोग इनकी कथाओं में जाते हैं, वे कथा-पांडाल में तो भजनों पर नाचते-गाते-थिरकते हैं। लेकिन उन पर भी इनके प्रवचनों का अधिक असर नहीं होता। इसीलिए कुछ ही देर बाद सब के सब कथा में बताई गई बातें भूल-भालकर रोज की तरह नियमित काम-धन्धों में लग जाते हैं।
जबकि दूसरी तरफ क़रीब-क़रीब सभी कथावाचक, कथाओं-प्रवचनों को, भगवन्नाम कीर्तन, आदि को बेहद महत्त्वपूर्ण बताते हैं। कथाव्यास पीठ को तो बेहद पवित्र और गरिमामय स्थान बताया जाता है। साथ में यह भी एहसास कराने की कोशिश की जाती है कि वे लोग एक बहुत ही ज़िम्मेदारीभरा काम कर रहे हैं। सही अर्थों में देखें तो निश्चित रूप से, ये सभी चीजें ऐसी होती भी हैं। लेकिन विरोधाभास तब पैदा होते हैं, जब कथावाचक ख़ुद ही अपनी कही इन तमाम बातों को व्यासपीठ पर बैठे-बैठे ही भूल जाते हैं।
भूल करना मानवस्वभाव है अलबत्ता। लेकिन भूल को जानकर भी सुधार न करना अपराध है। और सामने बैठे हजारों-हजार सुधि श्रोताओं को मूर्ख समझना तो गम्भीर अपराध। कथावाचकों को इसका ध्यान रखना चाहिए। ऐसी चीजों से बचना चाहिए। तभी उनकी गरिमा स्थापित होगी ओर धर्म की भी।
अभी सोमवार, 20 जुलाई को संसद का मॉनसून सत्र शुरू हुआ। इससे कुछ समय पहले… Read More
कलि युग में भक्ति मार्ग पाखण्ड से घिरा रहता है, इसलिए भगवान के भजन-पूजन, नाम… Read More
शिक्षा प्रणाली में मूलभूत सुधार और केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की माँग… Read More
भाषा को लेकर बेवजह की हाय-तौबा मची हुई इन दिनों। वजह वही, पीढ़ियों से भारतीय… Read More
जिन्दगी अपनी है, चुनाव भी अपने ही होते हैं। ऐसा अक्सर कहा जाता है। लेकिन… Read More